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असम : 66 साल में 7 प्रयासों के बाद NRC लिस्ट जारी, 3 करोड़ लोगों में से 1.9 करोड़ वैध, दूसरी लिस्ट का इंतजार

Bhaskar News | Last Modified - Jan 02, 2018, 05:23 AM IST

31 दिसंबर की रात दुनिया नए साल के जश्न में थी, असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) का पहला ड्राफ्ट जारी किया गया।
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    एनआरसी लिस्ट ऑनलाइन अपडेट है। 4200 एनआरसी केंद्र भी बने हैं। यहां सुबह से ही लंबी कतारें लगी रहीं।

    गुवाहाटी/नई दिल्ली.31 दिसंबर की रात दुनिया नए साल के जश्न में थी, असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) का पहला ड्राफ्ट जारी किया गया। इसमें राज्य के 3.29 करोड़ में से 1.9 करोड़ लोगों के नाम हैं। यानी, ये कानूनी तौर पर नागरिक हो गए हैं।
    सोमवार सुबह से ही एनआरसी सेवा केंद्रों पर भीड़ लग गई। पहली लिस्ट में 42.25% लोगों का नाम न होने के कारण कुछ इलाकों में तनावपूर्ण माहौल रहा। इसे देखते हुए 50 हजार जवानों को स्टैंड बाई में रखा गया। सेना भी सतर्क है। पड़ोसी राज्यों में भी सतर्कता बरती जा रही है। यह लिस्ट सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जारी हुई है। इस मामले में तीन साल में 40 बार सुनवाई हुई है।

    साल के अंत तक पूरी लिस्ट आने का अनुमान है। असम इकलौता राज्य है जिसने आजादी के बाद दोनों तरफ से पलायन को देखते हुए 1951 में एनआरसी तैयार किया था। तब से 7 बार इसे जारी करने की कोशिशें हुईं।

    एनआरसी की जरूरत क्यों?

    - असम में अवैध बांग्लादेशियों के मुद्दे पर कई हिंसक आंदोलन हुए हैं। 80 के दशक में असम गण परिषद और राजीव गांधी सरकार के बीच करार हुआ था।

    - 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अंत में अदालती आदेश के बाद लिस्ट जारी हुई है।

    पति का नाम है, तो पत्नी का नदारद, सांसद-विधायक भी लिस्ट में नहीं

    - गुवाहाटी में आधी रात में लिस्ट आई, सुबह लोग एनआरसी केंद्रों पर थे। कई परिवार ऐसे हैं जिनके आधे लोगों के नाम लिस्ट मेंं नहीं हैं। पति का है तो पत्नी का नहीं। पति-पत्नी का है तो बच्चों का नहीं।

    - एनआरसी के स्टेट कन्वेनर प्रतीक हजेला का नाम भी नदारद है। निचले असम में हालात ज्यादा खराब है। वहां बांग्लादेश से आए लोगों की संख्या भी अधिक है।

    - धुबरी के सांसद बदरुद्दीन अजमल समेत कई विधायकों के नाम सूची में नहीं हैं। वहीं उल्फा प्रमुख परेश बरुवा का नाम में है। जबकि वह दो दशक के ज्यादा समय से असम से गायब हैं।

    असम में घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए चल रहा सबसे बड़ा अभियान
    - असम में गैरकानूनी तरीके से रह रहे लोगों को निकालने का अभियान दुनिया के सबसे बड़े अभियानों में से एक है।

    - एक अनुमान के मुताबिक असम में करीब 50 लाख बांग्लादेशी गैरकानूनी तरीके से रह रहे हैं। - यह किसी भी देश में गैरकानूनी तरीके से रह रहे एक देश के प्रवासियों की सबसे बड़ी संख्या है। पर राजनीतिक दांवपेच में उलझने की वजह से एनआरसी की अपडेट लिस्ट नहीं आ पाई। भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया।

    - 2016 में पहली सरकार बनाई। सीएम सर्वानंद सोनोवाल ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए एनआरसी से अलग डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट कार्यक्रम शुरू किया।

    - इसमें एक लाख से ज्यादा सरकारी कर्मचारी लगाए गए। इस अभियान पर करीब 900 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इस लिहाज से यह यह किसी देश में गैरकानूनी तरीके से रहे दूसरे देश के लोगों को वापस भेजने का सबसे बड़ा अभियान भी है।

    500 ट्रक के वजन के बराबर दस्तावेज जमा हुए

    -3 साल में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों ने नागरिकता साबित करने के 6.5 करोड़ दस्तावेज भेजे।
    -ये दस्तावेज करीब 500 ट्रकों के वजन के बराबर है। इसमें 14 तरह के प्रमाणपत्र हैं।
    -इन दस्तावेजों से साबित करना है कि वो या उनका परिवार 1971 से पहले राज्य का मूल निवासी है।
    -50,000 से अधिक राज्य सरकार के कर्मचारियों-अधिकारियों ने घर-घर के सत्यापन की रिकॉर्डिंग की।
    -वंशावली को मुख्य आधार बनाया गया है। यानी असम में, आप वंश द्वारा नागरिक हैं। बाकी देश में जन्म से नागरिकता है।

    राजनीतिक
    बांग्ला-हिन्दू और मुस्लिम में बंटी राजनीति

    भाजपा के लिए यह बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है, लेकिन पार्टी इस पर आक्रामक रुख से आगे नहीं बढ़ सकती। क्योंकि इसमें मुस्लिमों के अलावा बड़ी तादाद में बांग्ला-हिंदू भी हैं। इस स्थिति में केंद्र नागरिकता संशोधन बिल पास कराना चाहता है। क्योंकि उसमें मुस्लिम को छोड़कर बाकी धर्म के लोगों को नागरिकता लेने की प्रक्रिया में रियायत दी गई है। लेकिन मामला कोर्ट में है। यहां धर्म के आधार पर फैसला संभव नहीं है। उसके लिए सब बराबर हैं।

    सामाजिक
    हिन्दू और मुस्लिमों में सामाजिक खाई बढ़ेगी

    मोदी ने चुनाव के दौरान देश में रह रहे हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा किया था। इसलिए सरकार नागरिकता संशोधन बिल पास कराना चाहती है। अगर सरकार मुस्लिम घुसपैठियों पर सख्ती करेगी तो इससे सामाजिक खाई बढ़ेगी। एनआरसी अपडेट होने के बाद भी विवाद थमने के आसार कम ही हैं। दस्तावेजों की गैरमौजूदगी में यह साबित करना मुश्किल है कि कौन 1971 से पहले असम में आया था और कौन उसके बाद।

    छह दशक में 80 हजार बांग्लादेशियों की ही पहचान हुई

    -1971 के बाद से 80,000 से कम की पहचान हो पाई। यानी हर साल 1740 घुसपैठियों की शिनाख्त हुई।

    -सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 51 साल में अगस्त 2017 तक 29,738 बांग्लादेशियों को वापस भेजा गया है।

    -बांग्लादेश एक ऐसा राष्ट्र है, जिसके साथ असम का 4,096 किलोमीटर की सीमा का हिस्सा लगता है।

    आधी रात में लिस्ट आई, सुबह-सुबह एनआरसी केंद्र पहुंचने लगे लोग

    रविशंकर रवि, संपादक, पूर्वोदय टाइम्स
    आधी रात में लिस्ट आई। सुबह से लोग एनआरसी सूचना केंद्रों पर पहुंचने लगे। ज्यादातर लोग निराश होकर ही लौट रहे थे। किसी के परिवार के आधे लोगों के नाम थे, आधे के गायब। पति का नाम है तो पत्नी का नहीं। पिता का नाम है तो बच्चों के नाम नहीं। ऊपरी असम की तुलना में निचले असम में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जिनके नाम आवेदन करने के बाद भी सूची में नहीं हैं। जबकि उन्होंने सारे दस्तावेज सौंप दिए थे। निचले असम में बांग्लादेश से आए लोगों की संख्या भी ज्यादा है। एनआरसी के प्रदेश समन्वयक प्रतीक हजेला का खुद का नाम लिस्ट में नहीं है। प्रतीक कहते हैं कि-"जिनके नाम पहली सूची में नहीं हैं, उनके नाम दूसरी में आ सकते हैं। दस्तावेज की जांच चल रही है। मेरा खुद का नाम पहली सूची में नहीं है।' प्रमुख मुस्लिम नेता और धुबड़ी के सांसद बदरुद्दीन अजमल समेत कई विधायकों के नाम भी इस सूची में नहीं हैं। वहीं उल्फा के मुख्य सेनाध्यक्ष परेश बरुवा का नाम सूची में है, जबकि वो दो दशक के ज्यादा समय से असम से गायब हैं। जबकि मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भरोसा दिला रहे हैं। वो कहते हैं- "किसी भी भारतीय का नाम काटा नहीं जाएगा। उन्हें नागरिकता साबित करने का पूरा मौका दिया जाएगा।'
    लोगों का कहना है कि 1966 की मतदाता सूची को लीगेसी डेटा के रूप में जमा करने के बाद भी उनका नाम नहीं आया। ये स्थिति पूरे राज्य की है। उदाहरण के लिए मंगलदै जिले के दलगांव के विधायक इलियास अली ने 1951 की मतदाता सूची को लीगेसी डाटा के रूप में जमा किया। इसके बाद भी उनका नाम मसौदे में नहीं है। बिहूदिया गांव के अमिरुल इस्लाम ने भी अपने लीगेसी डाटा के रूप में अपने पिता के नाम वाली 1966 की मतदाता सूची जमा की थी। साथ में प्रपत्र के साथ परिवार के अन्य सदस्यों के भी जरूरी प्रमाण-पत्र जमा किए। सभी प्रमाण-पत्र असम के थे। इसके बावजूद उनका नाम मसौदे में नहीं है।

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    असम में फिलहाल करीब 50 लाख बांग्लादेशी गैर-कानूनी तरीके से रह रहे हैं।
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    सोमवार सुबह से ही एनआरसी सेवा केंद्रों पर भीड़ लग गई।
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Web Title: Assam National Register Of Citizens List Issued
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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