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ये महिला पक्षियों के अंडे देने से पहले करती है गोद भराई की रस्म, ऐसी है इनकी स्टोरी

सिर्फ असम, बिहार और कंबोडिया में पाए जातेे हैं ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क पक्षी

Bhaskar news | Last Modified - Mar 08, 2018, 07:13 AM IST

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    विदेशी पक्षी के साथ पूर्णिमा बर्मन

    नई दिल्ली.प्रकृति से लुप्त हो रहे जीव जंतुओं को बचाने की बात हो या खेती-किसानी को सुधारने के मुद्दे अक्सर ही इन पर बड़े-बड़े दावे और बातें की जाती हैं लेकिन धरातल पर बहुत कम ही लोग हकीकत में बदलाव ला पाते हैं। असम की रहने वाली पूर्णिमा बर्मन भी एक ऐसी ही महिला हैं। इन्होंने न केवल स्टॉर्क प्रजाति के पक्षी को विलुप्त होने से बचाने की दिशा में काम किया बल्कि रीत रिवाजों के माध्यम से लोगों की भ्रांतियों को भी दूर किया। यही वजह है कि आज असम के कमरूप जिले में स्टॉर्क की संख्या 50 से 558 हो गई। ये है इसके पीछे का कारण...

    पूर्णिमा ने इस पक्षी की संख्या को बढ़ाने के लिए दादरा, पचरिया और हिंगीमारी नामक गांव में लोगों को साथ लिया और इनके अंडे देने के समय (नेस्टिंग) को गोद भराई की रस्म से जोड़ा। अब इन तीनों गांव में इनके नेस्टिंग के समय गोद भराई की रस्म धूम धाम से मनाई जाती है। इस काम के लिए जहां उन्हें ग्रीन ऑस्कर अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। अब आठ मार्च को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पूर्णिमा बर्मन को नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित करेंगे।

    विलुप्त होने की कगार पर थे ये पक्षी
    पूर्णिमा ने बताया कि इस दिशा में काम करना इतना आसान नहीं था। स्टॉर्क को लोग अपशगुन से जोड़ कर देखते थे। इसलिए जहां भी ये पक्षी घोंसला बनाते थे, गांव के लोग पेड़ ही काट डालते थे। इसी कारण असम में यह विल्ुप्त होने के कगार पर पहुंच गया। वे बताती हैं कि ये दुर्लभ पक्षी अब सिर्फ कंबोडिया, असम के कुछ गांव, बिहार तक सिमट कर रह गए हैं। इसलिए दस साल पहले इस दिशा में काम करना शुरू किया। शुरुआत में तो लोग पागल ही समझते थे, लेकिन जब उन्हें इसके महत्व के बारे में पता चला तो साथ देने लगे। 38 साल की पूर्णिमा बताती हैं कि शहरों में से झींगुर, जुगनू, टिड्‌डे जैसे न जाने कितने जीव जंतु वक्त की रफ्तार में पीछे छूटते चले गए, लेकिन इन सबके जाने से पर्यावरण में बढ़ रहे असंतुलन के खतरे से लोग अनजान हैं। इसलिए इन्हें अपने आसपास दोबारा लाने की जरुरत है।

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    Baby casts before completing the eggs

    90 एकड़ बंजर जमीन पर उगाया जंगल, धान की 452 किस्में खोजीं

    नारी शक्ति पुरस्कार पाने वाली 40 महिलाओं में ओडिशा के रोहीबंका गांव की साबरमती टिकी भी हैं। पुणे में एक निजी कंपनी में जनरल मैनेजर थीं। साल 1993 में नौकरी छोड़ ऑर्गोनिक फार्मिंग शुरु की। बंजर जमीन को भी हरा-भरा बना दिया। साबरमती के मुताबिक तीस साल पहले ऑर्गेनिक खेती की तरफ लोगों का ध्यान नहीं था। मैंने 90 एकड़ बंजर जमीन से शुरुआत की थी, जोे 10 साल में उपजाऊ हो गई। इसके अलावा कई लुप्त फसलों को भी तलाशा और उन्हें बचाया। वे बताती हैं कि गांव में भी इसके महत्व के बारे में जागरूक करना शुरू किया। अब दूर दूर से शोधकर्ता रिसर्च करने आते हैं। अब तक धान की 452 ऐसी किस्मों को खोजा है, जिनमें कैमिकल फर्टिलाइजर की जरूरत नहीं होती।

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Web Title: Baby Casts Before Completing The Eggs
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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