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माइनस 20 डिग्री में बच्चे 4 साल की उम्र से अपनाते हैं कठोर जीवन, फिर भी खुश हैं ये लोग

रोज शाम बच्चों को अच्छा सोचो, अच्छा करो, अच्छा बनो की शिक्षा दी जाती है। 6 से 7 बजे तक होमवर्क करते हैं।

Danik Bhaskar | Jan 22, 2018, 06:22 AM IST
काजा शहर में 1000 साल पुराना बौद्ध मठ है। इसमें आसपास के इलाकों से बच्चे पढ़ने आते हैं। परिवार के पहले बच्चे को लांबा बनाने की परंपरा है। काजा शहर में 1000 साल पुराना बौद्ध मठ है। इसमें आसपास के इलाकों से बच्चे पढ़ने आते हैं। परिवार के पहले बच्चे को लांबा बनाने की परंपरा है।

नई दिल्ली. हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी के काजा शहर में 1000 साल पुरानी की-मोनेस्ट्री (बौद्ध मठ) है। सर्दियों में इस शहर में तापमान माइनस 20 डिग्री तक पहुंच जाता है। आस-पास के गांवों के ज्यादातर परिवार अपने पहले बच्चे को लामा बनाते हैं। यानी वह कभी गृहस्थ जीवन में नहीं जाएगा। पूरा जीवन बुद्ध अाराधना में लगा देगा। बड़े होकर ये बच्चे देश-दुनिया के बौद्ध मठों में जाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे और वहां का मैनेजमेंट देखेंगे। दैनिक भास्कर रिपोर्टर गौरव भाटिया और फोटो जर्नलिस्ट अश्वनी राणा को इस बौद्ध मठ तक पहुंचने में भारी परेशानियां उठानी पड़ीं।

सर्दी कितनी भी हो स्कूल जाते हैं

- इन बच्चों की पूरी जिम्मेदारी मठ की होती है। 10वीं पास करने तक ये यहीं रहते हैं। सर्दी चाहे जितनी हो, बच्चे स्कूल जाते ही हैं।

- सुबह 8 से शाम 4 बजे तक स्कूल होता है। 1 घंटे के लंच ब्रेक में वे मठ में आकर खाना खाते हैं। इसके बाद वे खुद बर्तन साफ करते हैं।

- रोज शाम बच्चों को अच्छा सोचो, अच्छा करो, अच्छा बनो की शिक्षा दी जाती है। 6 से 7 बजे तक होमवर्क करते हैं। खास बात यह भी है कि रात का खाना बच्चे खुद बनाते हैं।

बेहद दुर्गम इलाका, जहां पहुंचना आम आदमी के लिए मुश्किल

- चंडीगढ़ से लाहौल स्पीति के काजा शहर जाने वाला रास्ता इतना दुर्गम है कि 520 किलोमीटर का सफर तय करने में 2 दिन का समय लग गया। इस मौसम में वहां कोई बाहरी व्यक्ति नहीं जाता।

- इन दिनों वहां इतनी बर्फ है कि वाहन करीब 2 किलोमीटर पहले ही छोड़ना पड़ा। फिर पैदल ही मठ तक पहुंचे, लेकिन इन मुश्किल परिस्थितियों में बर्फ से ढंके पहाड़ों के बीच उन्होंने भावी पीढ़ी को तैयार होते देखा। और यह फोटो सामने आया।

नो निगेटिव मंडे की तीसरी सालगिरह, पूरा एडिशन पॉजिटिव

प्रिय पाठको,

'नो निगेटिव मंडे' को आपके योगदान और सहयोग से आज तीन साल पूरे हो गए हैं। आज का पूरा अंक नो निगेटिव खबरों से।
बीते तीन वर्षों में हमारे हजारों रिपोर्टर्स की नजर में बदलाव की कई खबरें आईं- कि किस तरह देशभर में समूह और लोग अपने संकल्प और काम से सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं। इनमें ऐसे जुझारू लोग भी हैं, जो न मदद के लिए सरकार की ओर देख रहे हैं और न ही इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कोई हाथ बंटाने आएगा। बस खुद को झोंक रहे हैं। अभाव और संकट के बीच खुद के लिए, अपने परिवार और अपने गांव-शहर के लिए कुछ कर गुजरने का ख्याल इन्हें लगातार आगे बढ़ा रहा है। इन खबरों ने सशक्त होते भारत की नई तस्वीर पेश की है। पत्रकारिता की इस क्रांतिकारी पहल को लोगों ने सराहा और सशक्त बनाया है।
इसी श्रृंखला में नो निगेटिव की इस सालगिरह पर हम 'भारी मुश्किलों में भी खुश रहने वाले' लोगों की प्रेरक जानकारी; उन्हीं के बीच जाकर लाए हैं।
ये देश के सर्वाधिक गरीब, बीमार, अशांत और बाढ़ग्रस्त इलाकों की ही कहानियां नहीं हैं। ये हमें बहुत बड़ा संदेश देती हैं- कि कैसे हम छोटी-छोटी मुसीबतों से ही त्रस्त हो जाते हैं, हिम्मत खोने लगते हैं- जबकि जिनका समूचा जीवन ही भारी कष्टों में बीतता है- वे कितने प्रसन्न हैं। हौसला बनाए हुए हैं।
आशा है, नो निगेटिव मंडे को शुरू हुआ अापका नववर्ष पूर्णत: प्रोग्रेसिव होगा। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।
नो निगेटिव वर्ष 2018 की शुभकामनाओं के साथ

भास्कर परिवार।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें: अक्षय कुमार का स्पेशल आर्टिकल और जानें अमिताभ का स्ट्रगल...

आज बसंत पंचमी पर ये पॉजिटिव खबरें भी पढ़ें

- देश का सबसे अशांत गांव, लोगों ने बनाए बंकर; बुलेट प्रूफ स्कूल

- ये है देश का सबसे ज्यादा बाढ़ झेलने वाला गांव, चार महीने तक रहता है डूबा

- ये है देश का सबसे अलग-थलग इलाका, 10 किमी दूर स्कूल, पैदल जाकर भी पढ़ रहे हैं बच्चे

- देश का सबसे बीमार जिला, यहां एंबुलेंस लाने के लिए पहाड़ काट रहे हैं लोग

- ये है देश का सबसे गरीब गांव, अब यहां काजू की खेती ने बदल दी लोगों की जिंदगी

अक्षय कुमार ने सिर्फ दैनिक भास्कर के रीडर्स के लिए स्पेशल आर्टिकल लिखा है। अक्षय कुमार ने सिर्फ दैनिक भास्कर के रीडर्स के लिए स्पेशल आर्टिकल लिखा है।

मुद्दे मुझे तब तक बेचैन करते हैं, जब तक उन पर कोई कदम न उठा लूं


अक्षय कुमार कहते हैं कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किन परिस्थितियों में हैं। बस उस काम के प्रति जुनून बनाए रखें, जो करना चाहते हैं। मैं अपने कॅरिअर की शुरुआत से ही समाज के लिए कुछ करना चाहता था। यह हमेशा से मेरे जेहन में था। मुझे लगता है कि सिनेमा एक बेहद ताकतवर माध्यम है और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद कर सकता है। आप इसकी लोगों को प्रभावित करने की क्षमता का अंदाजा लगा सकते हैं।

- मुझे याद है कि जब मेरा परिवार दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हुआ था, तब हम शनिवार को लन्च के पैसे बचाकर शाम को फिल्म देखने जाते थे। इन्हीं पैसों में समोसा और स्टिक वाली ऑरेंज आइसक्रीम भी खरीदते थे।
- मेरा मानना है अगर फिल्में मेरे परिवार को हर शनिवार खुशी-खुशी भूखा रख सकती थीं, तो कल्पना करें कि सही इस्तेमाल से ये क्या कुछ नहीं कर सकतीं। यही वजह रही कि एक्टिंग के बीच मैंने प्रोड्यूसर के तौर पर फिल्म खट्‌टा-मीठा (2010) बनाई। इसमें भारत में सड़कों की स्थिति और भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया। हालांकि ये फ्लॉप रही और मैं निराश हो गया।
- दोबारा फिल्मों में लौटा और सिंह इज किंग, नमस्ते लंदन और वक्त जैसी फिल्में कीं। मगर मैं फिर अपने उद्देश्य की तरफ लौटा, क्योंकि कोई मुद्दा तब तक मेरी अंतरात्मा को कचोटता रहता है, जब तक कि मैं उसके लिए कुछ कर न दूं। पिछले दिनों मैं नासिक में एक किसान से मिला, जिसने दिल को छू लेने वाली अपनी कहानी मुझे बताई। मैंने उनसे दोबारा मिलने की बात कही है।

देश में ऐसी कई कहानियां
- इसी तरह असल कहानियां लोगों के बीच जाने से पता चलती हैं, न कि दफ्तर में सोफे पर बैठकर। ये ऐसी कहानियां होती हैं, जिससे आम व्यक्ति खुद को जोड़कर देखता है। आज हमारे देश में ऐसी कई कहानियां हैं, जिनका लोगों तक पहुंचना बाकी है। ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाना बाकी है। जैसे कि मेरी अगली फिल्म पैडमैन का मुद्दा।
- मुझे लगता है कि अब लोग सैनिटरी पैड्स पर खुलकर बात कर रहे हैं। इससे यह भी समझ आता है कि लोग बदलाव के लिए तैयार हैं। हमें बस इन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है, क्योंकि हमारे पास माध्यम (सिनेमा) है। ऐसा ही कुछ संदेश टॉयलेट एक प्रेम कथा में भी था। 
- मैं बस उन सकारात्मक बदलावों का एक छोटा-सा हिस्सा बनने की उम्मीद करता हूं, जिनकी हमारे देश को जरूरत है। और मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि सिनेमा में इस बदलाव की ताकत है।

 

आगे की स्लाइड्स में उन लोगों के बारे में पढ़ें जो अभाव और संघर्ष से निकले और दुनिया के लिए मिसाल बने। 

अमिताभ ने यह फोटो फिल्मफेयर माधुरी कॉन्टेस्ट में भेजी थी। पर रिजेक्ट कर दिए गए। 2016 में इसे ट्विटर पर डाला था। अमिताभ ने यह फोटो फिल्मफेयर माधुरी कॉन्टेस्ट में भेजी थी। पर रिजेक्ट कर दिए गए। 2016 में इसे ट्विटर पर डाला था।

वे लोग जो अभाव और संघर्ष से निकले और दुनिया के लिए मिसाल बने

 

दीवालिया हुए, 3 साल में कर्ज चुकाया, अब संपत्ति 700 करोड़

- बात 1969 की है। अमिताभ मुंबई में स्ट्रगल कर रहे थे। तब एक दोस्त जलाल आगा ने उनकी आवाज का इस्तेमाल कुछ विज्ञापनों में किया। जलाल की कंपनी विविध भारती के लिए विज्ञापन बनाती थी। अमिताभ को हर प्रोग्राम के 50 रुपए मिलते थे।
- इसी दौर में ऑल इंडिया रेडियो ने उनकी आवाज को रिजेक्ट कर दिया था। अमिताभ को कई बार टोस्ट खाकर दिन गुजारने पड़े थे। उनकी कई रातें मरीन ड्राइव पर बीतीं। फिर जब वे करीब-करीब हार मान चुके थे, अचानक सात हिन्दुस्तानी फिल्म में ब्रेक मिल गया।
- इस फिल्म के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड भी मिला, लेकिन अगले बड़े रोल के लिए उन्हें फिर दो साल इंतजार करना पड़ा। इस बीच वे अभिनेता महमूद के भाई अनवर के साथ रहे। महमूद ने अमिताभ को बॉम्बे टू गोवा के लिए साइन कर लिया था।
- उन्होंने अमिताभ को एक फिल्मकार मित्र जीएम रोशन से मिलवाया। रोशन ने अमिताभ को फिल्म ‘दुनिया का मेला’ के लिए साइन किया और 30 हजार रुपए का साइनिंग अमाउंट भी दिया। लेकिन बाद में उन पर भरोसा न कर कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया।
- करीब एक दर्जन फ्लॉप फिल्में देने के बाद उन्हें ‘जंजीर’ मिली, जिसने उन्हें एंग्री यंग मैन के रूप में स्थापित कर दिया।


संघर्ष का दूसरा दौर आया 52 की उम्र के बाद
- अमिताभ बड़े वित्तीय संकट में फंस चुके थे। 1995 में उन्होंने अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड शुरू की।
- हॉलीवुड स्टूडियोज़ की तर्ज पर कॉर्पोरेट तरीके से काम करने के इरादे से इसे बनाया। कंपनी ने 15 फिल्में भी लॉन्च कीं। हर फिल्म का बजट 3 से 8 करोड़ रुपए के बीच था। कंपनी ने बड़ा धमाका 1996 में किया।
- एबीसीएल ने पहली बार मिस वर्ल्ड ब्यूटी पेजेंट भारत में कराया। बिना किसी प्लानिंग और मैनेजमेंट के चल रही कंपनी दूसरे ही साल घाटे में चली गई। चार साल में तो दीवालिया होने की कगार पर पहुंच गई। एबीसीएल को बीमारू घोषित कर दिया गया, जिस पर 90 करोड़ का कर्ज था।
- बाद में एक इंटरव्यू में अमिताभ ने कहा - "सभी की सलाह थी कि मुझे एबीसीएल छोड़ देना चाहिए। लेकिन लोगों ने एबीसीएल में पैसा इसलिए लगाया था कि इसमें मेरा नाम जुड़ा था। इसलिए मैं इसे यूं ही जाने नहीं दे सकता था। फिर एक दिन मैं सुबह जल्दी उठा। सीधे यश चोपड़ाजी के पास पहुंचा।
- उन्होंने मुझे 58 की उम्र में मोहब्बतें से वापसी का मौका दिया। मैंने कमर्शियल, टेलीविजन करना शुरू किया। साल 2000 में स्टार प्लस ने कौन बनेगा करोड़पति शो के लिए साइन किया।
- इसने मुझे कर्ज चुकानेे में मदद की।'2003 में अमिताभ ने अपने 61वें जन्मदिन की पार्टी में नई कंपनी एबी कॉर्प शुरू करने की घोषणा की। इस पार्टी में उन्होंने कहा कि जब वे गहरे संकट में थे तो अमर सिंह उनकी ताकत बने।
- उन्होंने अनिल अंबानी और सहारा ग्रुप के सुब्रत रॉय से मुलाकात करवाई। वे पैसे से नहीं, मॉरल सपोर्ट देकर ताकत बने। अनुमान के अनुसार आज अमिताभ की कुल संपत्ति करीब 700 करोड़ रुपए है।

2013 में ओपरा को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया। उन्हें एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में कॉन्ट्रीब्यूशन के लिए ये सम्मान मिला। 2013 में ओपरा को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया। उन्हें एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में कॉन्ट्रीब्यूशन के लिए ये सम्मान मिला।

14 की उम्र में सुसाइड का ख्याल, आज सबसे असरदार महिलाओं में

 

- ओपरा जब 14 साल की थीं, तब उन्हें पता चला कि वे प्रेग्नेंट हैं। इस बात को वे किसी तरह माता-पिता से छिपाए रखना चाहती थीं। वे घबराई हुई थीं और आत्महत्या तक के तरीके खोजने लगीं। (एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था -यदि उन दिनों मेरे पास इंटरनेट होता, तो आज मैं जीवित नहीं होती, क्योंकि अब आप गूगल से किसी भी काम का तरीका पूछ सकते हो।)
- गनीमत थी, उन्हें अहसास हो गया कि आत्महत्या जैसे किसी कदम से तो पिता को सबकुछ बता देना ही अच्छा। आखिर जब वे दिन-ब-दिन ज्यादा असहज महसूस करने लगीं, तब उन्होंने हिम्मत जुटा ली। पिता को बता दिया। पिता उन्हें तत्काल अस्पताल ले गए। उसी दिन ओपरा ने बेटे को जन्म दिया। मगर वह दो ही सप्ताह जिंदा रह सका। 
- इन तमाम हालातों से जूझने के बाद छोटी- सी उम्र में ही ओपरा यह समझ गईं कि जिसे वे प्रताड़ना समझती रहीं, वह दुष्कर्म था।
- वह घिनौना काम, जिसका शिकार वे 9 साल की उम्र से हो रही थीं। यह सब ओपरा के साथ तब हुआ जब वे अपनी अविवाहित मां के साथ मिलवॉकी में रहती थीं।
- इस बीच एक कजिन, एक कजिन सिस्टर के प्रेमी और फिर पिता के भाई ने उनका शोषण किया। खैर अब वे पिता वेर्नोन के साथ नैशविले (टेनेसी) में थीं। मगर बीते कल की छाप दिमाग से जा नहीं पा रही थी। 
- तब सेना में रहे पिता ने ओपरा की हिम्मत बढ़ाई। कहा- ‘तुमने जो अब तक किया वह अतीत था, लेकिन अब तुम्हें तय करना है कि तुम्हारा भविष्य क्या होगा।’
- पिता के इन शब्दों को सुनने के बाद ओपरा ने कभी मुड़कर नहीं देखा। दोबारा स्कूल जाने लगीं। स्पीच कॉम्पीटिशन्स में हिस्सा लेने लगीं।
- दो साल बाद ओपरा ने एक स्थानीय क्लब की ओर से आयोजित प्रतियोगिता जीत ली। इसका इनाम कॉलेज की चार साल की स्कॉलरशिप था। कॉलेज में प्रवेश लेने से ठीक पहले मिस ब्लैक टेनेसी का खिताब भी अपने नाम कर लिया।
- इसके बाद एक लोकल टीवी चैनल द्वारा चौथी बार भेजा गया ऑफर स्वीकार लिया और मशहूर शो की को-एंकर बन गईं। फिर कुछ अन्य शो और एक फिल्म करते हुए वहां जा पहुंचीं, जो उनकी पहचान बना। यह था एक कम चर्चित शो ‘एएम शिकागो’।
- ओपरा के आने के बाद यह इस कदर लोकप्रिय हुआ कि इसे आधिकारिक तौर पर ‘द ओपरा विनफ्रे शो’ नाम दे दिया गया। इतना लोकप्रिय कि सन् 2000 में ओपरा ने डे-टाइम एमी अवॉर्ड के लिए नाम भेजना ही बंद कर दिया, क्योंकि तब तक 16 साल में शो 47 बार यह पुरस्कार जीत चुका था।
- ओपरा की शख्सियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हॉलीवुड का शायद ही कोई मशहूर सितारा ऐसा होगा, जो उनके बुलावे पर शो का हिस्सा न बना हो। इनमें से अधिकांश उनके अच्छे दोस्त भी हैं।
- मगर अब तक की सबसे सफल ये 63 वर्षीय टीवी होस्ट एक सच्चाई कभी भुलाना नहीं चाहती। यही कि बचपन में उनके दोस्त सिर्फ जानवर हुआ करते थे, क्योंकि छह साल का होने तक ओपरा दादी के मिसिसिपी स्थिति फार्म हाउस में पली-बढ़ी थीं।

जैक मा ने कूंग-फू आधारित एक फिल्म में भी कुछ सीन दिए हैं।‘गोंग शोऊ दाओ’ नाम की ये फिल्म नवंबर में रिलीज हुई है। जैक मा ने कूंग-फू आधारित एक फिल्म में भी कुछ सीन दिए हैं।‘गोंग शोऊ दाओ’ नाम की ये फिल्म नवंबर में रिलीज हुई है।

24 बार फेल हुए, अाज शीर्ष ई-कॉमर्स कंपनी के मालिक

 

- हमने सिर्फ कहानियों में सुना है कि कैसे ‘खुल जा सिम-सिम’ बोलकर मुख्य पात्र अलीबाबा अकूत धन-दौलत हासिल कर लेता है, लेकिन जैक मा के पास ऐसा कोई फॉर्मूला नहीं है। उनका एक ही फॉर्मूला है जुनून और कभी हार न मानने का जज़्बा।
- इसी के दम पर अलीबाबा ग्रुप के प्रमुख जैक मा आज दुनिया के 23वें और चीन के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं। उनकी संपत्ति करीब 2.56 लाख करोड़ रुपए है।
- मा यून से जैक मा बनने का उनका यह सफ़र कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। पढ़ाई की बारी आई, तो नाकामियां जैसे मा यून (जैक मा) का इंतज़ार ही कर रही थीं।
- शुरुआत प्राइमरी स्कूल से हुई। पांचवीं में दो बार फेल हुए। मिडिल स्कूल में पहुंचे तो आठवीं में तीन बार फेल हुए। कॉलेज के एंट्रेंस एग्ज़ाम में तीन बार फेल हुए। इसके बावजूद हार्वर्ड जाने की कोशिश की।
- एक बार या दो बार नहीं, बल्कि पूरे 10 बार। हर बार रिजेक्ट कर दिए गए। इसके बाद 6 बार कॉलेज एंट्रेंस में फेल हुए। ऐसे 24 बार उन्हें नाकामियों का सामना करना पड़ा।


गणित में 120 में से सिर्फ एक मार्क
जैक मा की कॉलेज के एंट्रेंस टेस्ट में फेल होने की कहानी भी रोचक है। पहली बार उन्हें गणित में 120 में से सिर्फ़ एक अंक मिला। वे फिर तैयारी में जुट गए और इस बार 19 अंक मिले, लेकिन पर्याप्त नहीं थे। ऐसे में जैक मा झेजियांग यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में जाकर फॉर्मूले याद करने लगे। तीसरे प्रयास में उन्होंने 89 अंक हासिल किए, लेकिन हांगझू टीचर्स कॉलेज जैसे छोटे संस्थान में ही एडमिशन मिल सका।

 

केएफसी के इंटरव्यू में 24 में से 23 सिलेक्ट, सिर्फ जैक मा रिजेक्ट
जैक मा ने अपने जीवन में करीब 30 बार नौकरी के लिए अप्लाई किया, लेकिन हर बार रिजेक्ट हुए। सबसे पहले उन्होंने पुलिस की नौकरी के लिए कोशिश की। इसमें 5 में से 4 लोग सिलेक्ट हुए, लेकिन जैक मा नहीं। कद-काठी देखकर उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। इससे ज़्यादा निराशाजनक वाकया तो 1986 में उनके साथ फूड चेन केएफसी के मामले में हुआ। केएफसी पहली बार उनके शहर में आई थी। उसमें नौकरी के लिए इंटरव्यू चल रहे थे। 24 उम्मीदवारों में से 23 सिलेक्ट हो गए और जैक मा रिजेक्ट। सितंबर 2016 में जैक मा ने उसी केएफसी की सब्सिडियरी यम चाइना में बड़ी हिस्सेदारी ख़रीदी। आज यम चाइना का मार्केट कैप करीब 1.77 लाख करोड़ रुपए है।

 

‘जैक’ नाम विदेशी मित्र ने दिया 
जैक मा का जन्म 10 सितंबर 1964 को चीन के हांगजोउ में हुआ था। थोड़े बड़े हुए तो अंग्रेज़ी सीखने की कोशिश की। इसके लिए 9 साल गाइड का काम किया। इससे उन्हें विदेशी संस्कृति, तौर-तरीकों की जानकारी हुई। इस दौरान एक विदेशी से मित्रता हो गई। उसी दोस्त ने इन्हें जैक मा नाम दिया, क्योंकि विदेशियोंं के लिए उनका असली नाम मा यून बोलना और लिखना बड़ा कठिन था।

इस मठ में शाम का खाना बच्चे ही बनाते हैं। बर्तन भी वे खुद ही साफ करते हैं। इस मठ में शाम का खाना बच्चे ही बनाते हैं। बर्तन भी वे खुद ही साफ करते हैं।