--Advertisement--

Bhaskar Analysis : जीत कितनी बड़ी, इससे तय होगा CM की कुर्सी पर रूपाला बैठेंगे या रूपाणी

बीजेपी के लिए अहम गुजरात चुनाव से जुड़ी है नरेंद्र मोदी और अमित शाह की निजी प्रतिष्ठा, बदले जा सकते हैं सीएम।

Danik Bhaskar | Dec 16, 2017, 07:34 AM IST
बीजेपी के लिए गुजरात चुनाव इसल बीजेपी के लिए गुजरात चुनाव इसल

नई दिल्ली. लोकसभा चुनाव के बाद 18 राज्यों में चुनाव हुए, लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव सबसे दिलचस्प रहा। अब निगाहें 18 दिसंबर को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं। एक ओर जहां बीजेपी की साख दांव पर है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस राहुल गांधी की लीडरशिप में नए युग की शुरुआत करने जा रही है। राज्य में बीजेपी की जीत का मार्जिन बहुत कुछ तय करेगा। अगर बीजेपी सामान्य जीत दर्ज करती है, तो विजय रूपाणी से सीएम की कुर्सी छिन सकती है और किसी पटेल को सीएम बनाया जा सकता है। इसके लिए केंद्रीय राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रूपाला का नाम सबसे आगे है। रूपाला का पटेलों में काफी असर है। वहीं, कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वला का भी नाम चर्चा में है, लेकिन वे सामाजिक समीकरण में फिट नहीं बैठते।

क्या होगा अगर बीजेपी जीतती है?

- गुजरात चुनाव में बीजेपी की जीत का भी आकलन दो स्तर पर होगा। बीजेपी बड़े मार्जिन वाली जीत दर्ज करते हुए मिशन 150 का लक्ष्य हासिल करती है या कम से कम 130 प्लस सीटें हासिल करती है या फिर किसी तरह से अपने पुराने प्रदर्शन को कायम करते हुए सामान्य जीत दर्ज कर सत्ता हासिल करती है।

1. बीजेपी की बड़ी जीत की स्थिति में:

कड़े आर्थिक सुधार की राह आसान

बड़ा असर - विपक्ष के तमाम प्रयास विफल साबित होंगे, जीएसटी-नोटबंदी के फैसले पर मुहर लगेगी, क्योंकि जीएसटी को लेकर गुजरात के व्यापारियों में सर्वाधिक नाराजगी दिख रही थी। इस जीत के साथ ही सरकार आर्थिक मोर्चे पर और तीखे फैसले लेने की स्थिति में आएगी और बड़े आर्थिक सुधारों की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाएगी।

1977 जैसी विपक्षी एकता

- प्रचंड जीत की स्थिति में विपक्ष भी मान लेगा कि बीजेपी का मुकाबला करना है तो 1977 जैसी विपक्षी एकता तैयार करनी होगी। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "गुजरात मिशन सौ फीसदी पूरा हुआ तो 2019 में हमारी चुनौती और बढ़ जाएगी, क्योंकि करीब 80-90 फीसदी विपक्षी दल एक मंच पर आ सकते हैं।"

ईवीएम का मामला फिर गरमाएगा

- बीजेपी की जीत पर ईवीएम में गड़बड़ी का मामला गरमाएगा। यूपी के बाद गुजरात की भी जीत को पचा पाना विपक्ष के लिए संभव नहीं होगा और यह तय है कि विपक्षी एकता का बड़ा आधार बनेगा। लोकसभा चुनाव में सभी विपक्षी दल मिलकर ईवीएम का बहिष्कार करने और आम चुनाव बैलेट से कराने की मांग पर अड़ सकते हैं।

हिंदू वोट बैंक का मुद्दा मजबूत

सांप्रदायिक विभाजन की डोर मजबूत होगी, क्योंकि गुजरात चुनाव विकास के मुद्दे से भटककर सांप्रदायिकता पर सिमट गया था। उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात में भी प्रचंड जीत मिलती है तो हिंदू वोट बैंक का मुद्दा स्थापित हो जाएगा। मुस्लिमों में यह भावना पनपेगी कि राजनैतिक लड़ाई के उनके रास्ते बीजेपी के सामने बंद हो गए हैं।

संगठन और संघ स्तर पर

- बड़ी जीत से बीजेपी पर संघ का प्रभाव और घटेगा। मोदी-शाह का रुतबा बढ़ेगा। संगठन-सरकार में मनमुताबिक बदलाव आसान होंगे। लेकिन जिस तरह से बीजेपी को कड़ी चुनौती मिली है, उससे रणनीति और टीम में बदलाव के कदम उठेंगे। बदलाव कैसा होगा, इसके संकेत मुख्यमंत्री के लिए विजय रूपाणी या किसी और चेहरे के चयन से तय होगा।

2. अगर सामान्य जीत मिली तो

बड़ा असर- मोदी पार लगाएंगे नैया

- अगर गुजरात में बीजेपी अपनी लाज बचाने में सफल रहती है तो देश की राजनीति से ज्यादा गहरा असर पार्टी के अंदर पड़ेगा। बीजेपी में संघ का दखल बढ़ेगा। संगठन-सरकार की नीति और टीम में बदलाव होगा। अमित शाह की चाणक्य वाली छवि पर प्रश्न चिह्न लगेगा।

आगामी चुनाव में चुनौती बढ़ेगी

- आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी की लड़ाई कठिन हो जाएगी, क्योंकि 2019 से पहले जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां बीजेपी का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है। मई 2018 में कर्नाटक में बीजेपी का सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ कांग्रेस से होगा, जहां मुख्यमंत्री सिद्धारमैया लोकप्रिय हैं और इसी की काट के लिए बीजेपी ने 75 साल के मापदंड के बावजूद बी.एस. येदियुरप्पा को अपना सीएम उम्मीदवार बना रखा है। इसके बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में कांग्रेस गुजरात की तरह कमजोर नहीं है।

आर्थिक मोर्चे पर

- लोकसभा चुनाव में महज सवा साल बचे हैं और फरवरी में आने वाला आम बजट मोदी सरकार का आखिरी बजट होगा। ऐसे में, आर्थिक नीतियों पर व्यावहारिक होकर निर्णय लेने को बाध्य होगी। चूंकि लोकसभा से पहले ही मई 2018 में कर्नाटक और फिर अक्टूबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्यों में चुनाव हैं, इसलिए जीएसटी पर भारी छूट दी जा सकती है।

3. अगर बीजेपी चुनाव हारती है तो

- बड़ा असर : एग्जिट पोल में इसकी संभावना कम दिखती है। राहुल गांधी के आक्रामक अंदाज, पाटीदार आंदोलन से उभरे हार्दिक, ओबीसी का चेहरा बनने की कोशिश कर रहे अल्पेश ठाकोर और दलित नेता के तौर पर उभर रहे जिग्णेश मेवानी ऐसा करने में सफल हो जाते हैं तो यह सरकार की नीतियों पर पहला प्रतिकूल जनमत संग्रह माना जाएगा।

आगामी चुनाव में चुनौती बढ़ेगी

- आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी की लड़ाई कठिन हो जाएगी, क्योंकि 2019 से पहले जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां बीजेपी का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है। मई 2018 में कर्नाटक में बीजेपी का सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ कांग्रेस से होगा, जहां मुख्यमंत्री सिद्धारमैया लोकप्रिय हैं और इसी की काट के लिए बीजेपी ने 75 साल के मापदंड के बावजूद बी.एस. येदियुरप्पा को अपना सीएम उम्मीदवार बना रखा है। इसके बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में कांग्रेस गुजरात की तरह कमजोर नहीं है।

आर्थिक मोर्चे पर

- लोकसभा चुनाव में महज सवा साल बचे हैं और फरवरी में आने वाला आम बजट मोदी सरकार का आखिरी बजट होगा। ऐसे में, जनता के हितों को देखते हुए फैसले लिए जा सकते हैं। चूंकि, लोकसभा से पहले ही मई 2018 में कर्नाटक और फिर अक्टूबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्यों में चुनाव हैं, इसलिए जीएसटी पर भारी छूट दी जा सकती है।

शाह को आघात, संघ दबदबा बढ़ाएगा

- गुजरात चुनाव हारने की स्थिति में अमित शाह की चाणक्य की छवि पर असर पड़ेगा। शाह पर इस्तीफे का दबाव भी बढ़ सकता है। बीजेपी पर पकड़ बनाने में कमजोर संघ अपना दबदबा बढ़ाएगा।

मोदी सबको साथ लेने की कोशिश करेंगे

- मोदी संघ-संगठन की नब्ज को जानते हैं। हार के दूरगामी असर होंगे। मोदी नए सिरे से रणनीति बनाकर आम चुनाव में ज्यादा गंभीरता के साथ संघ और संगठन को साथ में लाने का प्रयास करेंगे। लेकिन इसके एवज में मोदी को अपने खास शाह को रुखसत करने की सहमति देनी पड़ सकती है।