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बोफोर्स दलाली: आरोपी बरी होने के 13 साल बाद सुप्रीम कोर्ट में केस को चुनौती

उद्योगपतियों हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को 64 करोड़ रु. की दलाली सहित सभी आरोपों से बरी कर दिया था।

Dainik Bhaskar

Feb 03, 2018, 04:54 AM IST
Bofors scandal case Challenge in Supreme Court after 13 years

नई दिल्ली. राजनीतिक तौर पर संवेदनशील बोफोर्स तोप दलाली कांड में शुक्रवार को 13 साल बाद नया मोड़ आ गया। हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को आरोप मुक्त करने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट के साल 2005 के फैसले को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी है। जांच एजेंसी ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की राय भी नहीं मानी। उन्होंने सलाह दी थी कि सीबीआई इतने लंबे गैप के बाद सुप्रीम कोर्ट न जाए।


हालांकि, सूत्रों का दावा है कि नए दस्तावेजों और सबूतों पर चर्चा के बाद वह हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने पर सहमत हो गए थे। सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट के 31 मई, 2005 के फैसले को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने यूरोप में रह रहे उद्योगपतियों हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को 64 करोड़ रु. की दलाली सहित सभी आरोपों से बरी कर दिया था।


उल्लेखनीय है कि 24 मार्च, 1986 को भारत और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 155 एमएम की 400 होवित्जर तोपों की सप्लाई के लिए 1437 करोड़ रुपए में सौदा हुआ था। इस सौदे में भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को 64 करोड़ रुपए घूस देने के आरोप लगे थे। सीबीआई ने 22 जनवरी, 1990 को एफआईआर दर्ज कर इसकी जांच शुरू की थी।

सोनिया के खिलाफ लड़ चुके भाजपा नेता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है केस
सीबीआई ने भले ही हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देेने में 13 साल लगा दिए हों, लेकिन भाजपा नेता अजय अग्रवाल 2005 में ही केस सुप्रीम कोर्ट में ले आए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्तूबर, 2005 को उनकी याचिका सुनवाई के लिए मंजूर कर ली थी। वह रायबरेली से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके हैं। उनकी याचिका पर सीबीआई से भी जवाब मांगा गया था।

सूत्रों का दावा- याचिका में नए सबूत और तथ्य हैं, इन्हें देख अटॉर्नी जनरल ने भी इजाजत दी
सूत्रों ने बताया कि हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सीबीआई ने विधि अधिकारियों को कुछ अहम दस्तावेज और सबूत दिखाए। इनके आधार पर वह भी अपील के पक्ष में थे। अटॉर्नी जनरल ने भी मौखिक इजाजत दे दी। सूत्रों ने कहा कि याचिका में इन्हीं नए तथ्यों काे चुनौती का आधार बनाया गया है।

बड़ी चुनौती: सीबीआई को कोर्ट को संतुष्ट करना होगा कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल करने में इतनी देरी क्यों हुई।

सीबीआई ने नहीं मानी अटॉर्नी जनरल की राय
अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि सीबीआई को 13 साल बाद स्पेशल लीव पिटीशन दायर नहीं करनी चाहिए। इतने वर्ष के बाद दायर की जाने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो सकती है। फैसले के 90 दिन के अंदर अपील नहीं करने के पक्ष में सीबीआई के पास कोई ठोस तर्क नहीं है। मोदी सरकार को सत्ता में आए हुए भी 3 साल से अधिक वक्त हो चुका है।

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Bofors scandal case Challenge in Supreme Court after 13 years
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