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दस साल पहले सिंगूर में जहां से नैनो प्लांट हटा वहां आज खेती भी मुश्किल

पिछल दस सालों में जमीनों के भाव आसमान छूने लगे हैं। एक दशक पहले 5 लाख रुपए प्रति बीघा की जमीन अब 40 से 50 लाख रुपए प्रति

धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया/ पार्थ जानी | Last Modified - Mar 18, 2018, 05:40 AM IST

  • दस साल पहले सिंगूर में जहां से नैनो प्लांट हटा वहां आज खेती भी मुश्किल
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    सिंगूर: खेती की जमीन पर अभी भी पड़ा प्लांट का मलबा।

    सिंगूर(पश्चिम बंगाल). कोलकाता से 44 किमी दूर दुर्गापुर एक्सप्रेस-वे के बाई ओर आता है गोपालनगर गांव। गांव खत्म होते ही खेतों के किनारे छह से आठ फीट ऊंची पक्की बाउंड्रीवॉल शुरू हो जाती है। जर्जर दीवार करीब पांच किमी जॉय मोल्ला गांव के मोड़ तक आती है। टाटा की नैनो कार बनाने का कार्य 10 साल पहले इसी बाउंड्रीवॉल के अंदर शुरू हुआ था। आज निवेश की निशानी के तौर पर हुगली जिले के सिंगूर में ये दीवार ही बची है। जमीन बचाने के लिए जिन किसानों ने लड़ाई लड़ी उनमें से ज्यादातर आज भी खेती नहीं कर पा रहे हैं। कोर्ट में लंबी लड़ाई के बाद 2016 में फिर जमीन के कागज मिले, लेकिन प्लांट की 997 एकड़ जमीन से जुड़े अधिकतर किसानों की जिंदगी अभी भी ठहरी हुई है। बमुश्किल 30-35 फीसदी हिस्से पर खेती हो रही है। आंदाेलन में किसानों का साथ देने वाली ममता बनर्जी अब मुख्यमंत्री हैं। उनकी सरकार किसानों-खेतीहर मजदूरों को हर माह 2000 रु. कंपनसेशन और 2 रु. प्रतिकिलो पर 16 किलो चावल दे रही है। प्लांट तो लगा नहीं वहीं किसान अभी भी पूरी जमीन पर खेती नहीं कर पा रहे हैं। छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं।

    - किसानों का कहना है कि सीमेंट-कॉन्क्रीट के भारी-भारी पत्थर, गिट्‌टी, ड्रेनेज-पानी की लाइन के लिए बिछाए गए सीमेंट के पाइप, गड्‌डे, सड़क और पक्का स्ट्रक्चर ऐसी जमीन पर खेती हो कैसे।

    -गोपालनगर के किसान सुकुमार साहू कहते हैं कि हमने प्रशासन को लिखकर दिया है कि हमें जो 6 बीघा जमीन मिल रही है वह खराब है, हम ऐसी जमीन नहीं लेंगे। साहू और यहां के अन्य किसानों का मानना है कि ऐसी जमीन पर खेती की लागत बहुत अधिक आएगी और इसकी तुलना में उपज नहीं आ पाएगी। जमीन के अंदर से पत्थर, गिट्‌टी आदि निकालने का काम मनरेगा के तहत अभी भी जारी है।

    अब जमीन दे भी सकती हैं

    - ममता बनर्जी के साथ आंदोलन में शामिल रहीं, जेल गईं गोपालनगर की मायारानी कोले कहती हैं कि हमारे परिवार की पांच बीघा जमीन थी, हमने प्लांट के लिए जमीन देने की सहमति नहीं दी थी। हमसे जबरदस्ती जमीन ली गई थी। जिसका मुआवजा भी हमने सरकार से नहीं लिया था। अभी हमें मुआवजा मिल गया है। कागज भी मिल गए हैं। लेकिन, जमीन पर कब्जा नहीं मिला। हमने विरोध आंदोलन के दौरान कभी नहीं चाहा था कि टाटा कारखाना हटाए, हमने कहा था कि चार सौ एकड़ भूमि हमें दे दें और बाकी की 600 एकड़ में टाटा प्लांट लगाए। यह पूछने पर कि अब कोई कंपनी आए तो जमीन दे देंगी। इस पर वे कहती हैं कि जमीन दे भी सकती हैं।

    ईंट-पत्थर से भरी जमीन मिली

    - वहीं गांव के ही अन्य किसान बासुदेब साहू, श्रीचरण साहू, गणेश बंगाल कहते हैं कि सोचा था कि फैक्ट्री लगेगी तो रोज़गार मिलेगा लेकिन, रोजगार की जगह हमें ईंट-पत्थर से भरी जमीन मिली। कोई भी कंपनी आए हम अपनी जमीन देने को फिर से तैयार हैं। कारखाना आएगा तो रोजगार होगा। अब तो इस जमीन पर खेती करना बहुत मुश्किल है। खेती करने पर लागत भी नहीं निकल पाएगी,ऐसे में कैसे खेती हो? जमीन पर अभी भी हजारों सीमेंट के पाइप रखे हैं। खेतों में काम करने वाले किसान मनरेगा के तहत मजदूरी करने को मजबूर हैं। वे कहते हैं कि पहले जहां तीन-चार फसलें लेकर आलू आैर अन्य फसलों से साल में 60 से 70 हजार रुपए बीघा तक कमा लेते थे वहीं अब खेती करना ही मुश्किल हो गया है।

    2008 में प्लांट बंद
    - इधर कोलकाता के कारोबारी संजीव शर्मा बताते हैं कि जब नैनो प्लांट आ रहा था तब प्लांट के आस-पास बहुत सारे होटल आ गए थे, जिनमें से अब ज्यादातर बंद हो गए हैं। कई बैंकों की ब्रांच भी खुल गई थीं। उस समय करीब तीन लाख रुपए बीघा के हिसाब से किसानों को पैसा मिला था। लेकिन प्लांट शुरू होने के बाद कारोबारियों, नेताओं और अन्य लोगों ने यहां महंगे दामों पर जमीनें खरीदीं, उस समय 25 से 30 लाख रुपए बीघा का भाव हो गया था। जबकि10 वर्ष बाद आज भी 30 लाख रुपए बीघा का भाव चल रहा है। कई कंपनियों के शोरूम आ गए थे, जो टाटा के जाने के बाद बंद हो गए। प्लांट की जमीन पर मनरेगा के तहत काम की सूचना के पत्थर आसानी से देखे जा सकते हैं। क्षेत्र के ज्यादातर किसान और खेतीहर मजदूर छोटे-मोटे काम से ही अपना गुजारा कर रहे हैं।

    - अब किसान (प्लांट के लिए सहमति से जमीन देने वाले और असहमति से जमीन देने वाले दोनों) कहते हैं कि अगर कोई कंपनी फैक्ट्री आदि के लिए जमीन लेगी तो वे दे देंगे।भारी विरोध के बाद टाटा कंपनी ने अक्टूबर 2008 में प्लांट बंद कर बंगाल छोड़ने की घोषणा की थी। प्लांट बंद होने के बाद यहां के लोगों की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई।

    - जॉय मोल्ला गांव के मोड पर मामा-भगना के नाम से छोटा-सा ढ़ाबा चलाने वाले 42 वर्षीय विद्युत सादरा कहते हैं कि जब प्लांट लग रहा था उसी समय सरकार व टाटा कंपनी ने आठ महीने का पुणे में कोर्स करवाया और मैकेनिकल की ट्रेनिंग दी। उस दौरान 2300 रुपए का स्टायफंड मिलता था। कोर्स के बाद 22 से 23 हजार रुपए प्रति माह की नैनो प्लांट में नौकरी का कांट्रेक्ट हुआ था। टाटा के प्लांट हटाने के बाद सादरा ने दो साल पहले तक 10 से 12 हजार रुपए महीने में कोलकाता में अन्य कंपनी में नौकरी की।

    उस जमीन पर खेती करना संभव नहीं

    - वे कहते हैं कि हमने भी चार कट्‌ठा (बिसवा) जमीन 80 हजार रुपए में प्लांट के लिए दी थी। हमारी जहां जमीन है वहां लोहा और सीमेंट है, इसलिए वहां अभी खेती करना संभव नहीं है। सरकार ने भी सीमांकन के बाद जमीन देने काे कहा है।

    - टाटा के नैनो प्लांट के लिए जो जमीन ली थी उनमें सिंगूर के गोपालनगर, सिंघेरभेरी, बेराबेरी, खासेरभेरी और बाजेमेतिया मौजा (गांव) के किसानों की जमीन थी। पूर्व में टाटा का जहां मुख्य स्ट्रक्चर था, वहीं पास में गाय चरा रहे खासेरभेरी गांव के खेतीहर मजदूर बेचराम पात्र कहते हैं कि यह जमीन बहुत उपजाऊ थी, आलू, जूट, धान की खेती होती थी। साल में तीन फसल ले लेते थे। पहले यहीं घर के पास खेतों पर काम करता था, लेकिन अभी मजदूरी के लिए दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।

    - बेचाराम बताते हैं कि पहले मजदूरी करके तीन से साढ़े तीन हजार रुपए हर महीने कमा लेते थे अब 10 साल बाद भी चार हजार रुपए ही कमा पाते हैं। क्योंकि अब लगातार काम नहीं मिलता। वहीं मुख्यमंत्री के कृषि सलाहकार प्रदीप मजूमदार कहते हैं कि हम वहां पहले ही 700 एकड़ तक जमीन सही कर चुके थे। जहां तक खाली पड़ी जमीन का सवाल है तो किसानों को खुद आगे आना पड़ेगा। हमने वहां प्लांट को पूरी तरह से हटाकर जमीन समतल की है और ट्यूबवैल की व्यवस्था की है। जमीन में पाइप पड़े होने और कॉन्क्रीट पड़ा होने के संबंध में बोले कि थोड़ा बहुत कहीं रह गया होगा तो संभव है। लेकिन पूरी जमीन पर खेती की जा सकती है। इस जमीन को फिर खेती लायक बनाने के मामले में एक और चुनौती थी इस पर करीब एक दशक से जमी वीड (जंगली घास) को हटाना।

    जमीन में सीमेंट पत्थर

    - पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से गठित समिति के विशेष सदस्य व कृषि वैज्ञानिक व बिधानचंद्र कृषि विवि के प्रोफेसर रतीकांत घोष कहते हैं कि हमने कैमिकल के प्रयोग से वीड को हटा दिया था। घोष के दावे के बावजूद जमीन पर कहीं-कहीं जंगली घास दिख जाती है।

    - प्रो. घोष कहते हैं कि सिंगूर की भूमि पर खेती की जा सकती है। उस 33 एकड़ भूमि पर भी जहां टाटा प्लांट की इमारत, ठोस निर्माण और सड़क थी। लेकिन पैदावार अधिक नहीं हो पाएगी। बमुश्किल 10 फीसदी पैदावार हो सकती है। पैदावार सामान्य होने में कम से कम चार वर्ष का समय लगेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन को 12 सप्ताह के अंदर सभी किसानों को जमीन देना और टाटा के ठोस निर्माण को हटाना एक चुनौती था। सरकार ने ज्यादातर किसानों को जमीन के कागज दे दिए हैं।

    - प्रशासनिक अधिकारी कहते हैं कि टाटा का जहां मैन प्लांट था उसमें पिलर आदि नौ मीटर तक गहरे और मोटी-मोटी सीमेंट की दीवारें थी जिसे हटाने के लिए डायनामाइट व क्रेन का प्रयोग किया गया। यही कारण है कि अभी भी जमीन में सीमेंट पत्थर या अन्य चीजें हो सकती हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक 650 एकड़ खेती लायक जमीन नवंबर 2016 में ही हो गई थी।

    इनका कहना
    - हुगली के कलेक्टर संजय बंसल कहते हैं कि हमने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का अक्षरश: पालन किया है। जमीन में करीब सौ एकड़ भूमि सरकारी शामिल है, जिसमें पहले से ही रास्ता, मंदिर और कुछ निर्माण था। 25 से 30 एकड़ ऐसी भूमि है जिसे विवाद के कारण नहीं बांटा जा सका है। वहीं 23 से 24 एकड़ ऐसी भूमि भी है जिसको लेने काेई सामने नहीं आया, जबकि हमने चार बार अखबारों में विज्ञापन दिए और संबंधितों के पतों पर भी पत्र भेजे।

    - बंसल कहते हैं कि 3,619 किसान और खेतीहर मजदूरों को प्रति माह दो हजार रुपए का कंपनसेशन और दो रुपए प्रति किलो की दर से 16 किलो चावल दे रहे हैं। जमीन को खेती योग्य बनाने के लिए चार से पांच लाख क्यूबिक फुट मिट्‌टी डाली गई है। पहले जहां जमीन पर 12-13 ही ट्यूवैल थे वहीं अब 54इट्यूवैल लगाए गए हैं जिससे खेती आसानी से की जा सके। कलेक्टर के दावे के विपरीत सिंगूर की हकीकत लेकिन यही है कि ममता बनर्जी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तेजी से अमल करते हुए ज्यादातर किसानों को तय समय सीमा में जमीन के कागज तो सौंपे। लेकिन जमीन पर सभी किसानों को कब्जा मिलना और खेती होना अभी भी बाकी है।

    और जिस साणंद में पहुंचा वहां- 450 इंडस्ट्री लगीं

    - कभी उनींदे-से नजर आने वाले गुजरात के साणंद का दिन अब तेज गति से चलता है। 2008 में जब से नैनो का प्लांट यहां लगा है औद्योगिक गतिविधियों ने इसकी सूरत बदल दी है। पिछले दस सालों में जमीनों के भाव आसमान छूने लगे हैं। एक दशक पहले 5 लाख रुपए प्रति बीघा की जमीन अब 40 से 50 लाख रुपए प्रति बीघा की हो गई है। मकान एवं फ्लैट के भाव भी बढ़ गए हैं। जैसे ही कोई नई रहवासी स्कीम शुरू होती है, चंद दिनों में पूरी बुकिंग हो जाती है।

    - 1995 से नैनो संयत्र के आने तक 12-13 वर्षों में यहां 40 से 50 औद्योगिक इकाइयां काम कर रही थीं। लेकिन पिछले 10 साल में 450 से अधिक औद्योगिक इकाइयां साणंद और समीपवर्ती क्षेत्र में शुरू हो चुकी हैं। इनमें 50 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं। टाटा के अलावा किनबीस, कोकाकोला, फोर्ड, मैक्सिस रबर, पार्ले एवं कोलगेट जैसी बड़ी नामी कंपनियों ने यहां इकाइयां लगाई हैं।

    - साणंद इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अजीत शाह बताते हैं कि पहले यहां छोटे-छोटे उद्योग थे, लेकिन इनके लिए भी प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं मिल पाते थे। नैनो के आने के बाद यह परिवर्तन हुआ है कि आसपास के गांवों के लोगों ने जरूरत के अनुसार खुद को प्रशिक्षित किया है। परिवर्तन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नैनो से पहले साणंद ग्राम पंचायत को राज्य सरकार ग्रांट देती थी। अब साणंद ही नहीं अपितु समीपवर्ती बोर, हीरापुर, चरल शियावाडी एवं छारोडी ग्राम पंचायतों ने यह सरकारी ग्रांट छोड़ दी है।

    - इसके उलट अब ये निकाय प्रोफेशनल टैक्स और पैमाइश से करोड़ों का राजस्व पा रही हैं। इस आवक से 80 प्रतिशत सरकार को जाता है। जबकि शेष 20 प्रतिशत राशि ग्राम पंचायतें अपने विकास कार्यों में उपयोग में लेती हैं। बोरगाम ग्राम पंचायत की कर की मद में आवक 1.75 करोड़ रुपए हो गई है। अहमदाबाद यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर है, लेकिन अब साणंद की सीमाएं वहां तक जा पहुंची हैं।

    600 लोगों की नौकरी

    - अहमदाबाद जिले की दस्क्रोई तहसील के बोपल, साउथ बोपल, घुमा और गोधावी तक साणंद का विस्तार हो गया है। सड़कें भी ज्यादा हो गई हैं। फलत: साणंद से इन इलाकों की दूरी अब मिनटों में सिमट गई है। एक दशक पहले के मुकाबले राज्य पथपरिवहन की बस सेवा में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। पहले एक दो-बस गुजरती थी। अब औसत हर 30 मिनट के अंतराल पर एक बस की कनैक्टिविटी है। प्राइवेट वाहन भी चलने लगे हैं।सिर्फ नैनो के संयत्र में ही 600 से अधिक स्थायी गुजराती कर्मचारी काम करते हैं। इसके अलावा कॉन्ट्रेक्ट पर काम करने वालों की तादद तो हजारों में हैं।

    लाइफस्टाइल बदल गई

    - हाई कोर्ट वकील दिलीप सिंह बारड़ कहते हैं कि नैनो संयत्र में काम करने वाले अधिकांश लोग भले ही बाहर के हैं, लेकिन औद्योगिक विकास ने यहां लोगों की आय बढ़ाने के अन्य कई रास्त खोले हैं। यहां बाहर से काम करने वाले कर्मचारियों और मजदूरों को सबसे पहले जरूरत होती है किराए पर मकान, खानपान-ट्रांसपोर्ट जैसी सुविधाओं की।

    - इन जरूरतों को स्थानीय लोग और आसपास के ग्रामीण ही पूरा कर सकते हैं। यही उनकी आय बढ़ाने का आधार बन रहा है। जैसे मकानों के किराए को ही देखें तो साणंद में प्रति माह मकान किराया 4000 से 5000 रुपए तक पहुंच गया है। जबकि दस साल पहले तो यहां मकान किराए पर देने जैसी कोई बात ही नहीं थी। इन वर्षों में यहां लोगों की जीवनशैली उन्नत हुई है। इसका एक उदाहरण यहां अच्छे स्कूलों का खुल जाना भी है। बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाने का चलन शुरू हुआ है। यही कारण है कि एक दशक में सात से अधिक बड़े स्कूल यहां खुले हैं। हालांकि ओद्योगीकरण के साथ आने वाली समस्याओं ने भी शहर को घेरा है।

    - वडनगर निवासी हर गोविंद प्रजापति बताते हैं कि सुबह-शाम के समय इस कस्बे में ट्राफिक की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। साणंद से नैनो संयत्र तक ट्रैफिक ज्यादा रहता है, जिससे अन्य लोगों को भी परेशान होना पड़ता है।

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    साणंद: पार्किंग भी रोजगार बन गया है। लोगों ने अपनी जमीन को बड़े वाहनों के लिए पार्किंग के रूप में बदल दिया है।
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