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पुश्तैनी जमीन बेंचकर संवार रही गरीब बच्चों की लाइफ, ऐसे रोशन हो रही जिन्दगी

बेंगलुरु की सरस्वती अपने पति के साथ मिलकर मजदूरी करने वाले लोगों के बच्चों की जिंदगी संवार रही है।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - Feb 12, 2018, 12:11 PM IST

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    दियाघर के बच्चों के साथ सरस्वती

    बेंगलुरू. बेंगलुरु की रहने वाली एक महिला ने अपने पति के साथ मिलकर मजदूरी करने वाले लोगों के बच्चों की जिंदगी संवारने का जिम्मा उठाया है। ये महिला स्लम एरिया में रहने वाले बच्चों को सिलेक्ट करती है जिसके बाद उनकी पढ़ाई से लेकर उनके कपड़े व खाने की व्यवस्था की जा जाती है। इस कपल ने इसके लिए एक स्वयंसेवी संस्था बनाई है जिसका नाम 'दियाघर' रखा है। अब दोनों मिलाकर दियाघर के माध्यम से इन गरीब बच्चों की जिन्दगी रोशन करने में लगे हुए हैं। Dainikbhaskar.com ने दियाघर की फाउंडर सरस्वती पद्मनाभन से बात की। उन्होंने दियाघर की शुरुआत में आये संघर्षों व सफलताओं को शेयर किया।

    ऐसे हुई दियाघर की शुरुआत
    बेंगलुरू में रहने वाली सरस्वती पद्मनाभन और उनके पति साफ्टवेयर इंजीनियर श्यामल कुमार ने इस संस्था दियाघर की शुरुआत की है। सरस्वती और उनके पति मिलकर स्लम एरिया के बच्चों को ढूंढते हैं और उन्हें इस संस्था में लाकर पढ़ाते हैं। संस्था में ही उनके खाने-पीने व कपड़ों की व्यवस्था की जाती है। सरस्वती ने इस संस्था में अब तीन टीचर व दो हेल्पर भी रखे हैं। सभी लोग मिलकर बच्चों की पढ़ाई से लेकर उनके खाने का पूरा ख्याल रखते हैं।

    पैसों के अभाव में बेंच दी पुश्तैनी जमीन
    सरस्वती बताती हैं कि "शुरुआत में जब हम इस संस्था की शुरुआत कर रहे थे तो हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या पैसों की थी। लेकिन दिल में इन बच्चों के लिए कुछ करने का जज्बा था। पैसों का कोई इंतजाम ने होते देख मैंने अपनी एक पुश्तैनी जमीन बेंच दी। उससे मिले पैसों से हमने ये दियाघर की शुरुआत की। शुरुआत में मैं और मेरे पति अकेले ही बच्चों को ढूँढने से लेकर उन्हें पढ़ाने का काम करते थी। लेकिन अब धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ गई जिसके बाद मैंने तीन टीचर व दो सहायकों को रख लिया।"

    बचपन से थी प्रेरणा
    सरस्वती बताती हैं "मेरे पापा और मम्मी दोनों डॉक्टर थे। जब मै छोटी थी तो स्कूल जाते समय स्लम एरिया के बच्चों की बदहाली देखती मुझे उन्हें देखकर बड़ी पीड़ा होती। पेरेंट्स से भी कुछ इसी तरह की सीख मिली। बचपन में मेरा जन्मदिन अनाथआश्रम के बच्चों के बीच मनाया जाता था। जन्मदिन पर पापा मुझे लेकर स्लम एरिया में जाते थे और वहां के बच्चों में मिठाइयां और कपड़े बांटते थे। तो बचपन से ही यहां के बच्चों की हालत से काफी परिचित थी। बचपन से ही उनके लिए कुछ करने की प्रेरणा मिलती थी। यही प्रेरणा आगे चलकर दियाघर बनाने में काम आई।"

    विदेश में भी ऐसे बच्चों के लिए काम कर चुकी हैं सरस्वती
    सरस्वती ने बताया "मैं पहले अमेरिका में जेल में रहने वाले सजायाफ्ता कैदियों के बच्चों के लिए काम करती थी। उसके बाद मैंने मुंबई के स्ट्रीट चिल्ड्रेन के साथ काम किया। लेकिन मुझे लगता था कि हमे कुछ अलग करना चाहिए। शादी के बाद पति से अपनी बात शेयर की तो उनका भी सहयोग मिला। जिसके बाद साल 2016 में हमने 'दियाघर' की नींव रखी। हमारे तीन बच्चे हैं जिनकी उम्र 8, 5 और 4 साल है। उनकी देख-भाल के साथ हम दियाघर के बच्चों की भी देखभाल करते हैं।"

    पूरे शहर के स्लम एरिया के बच्चों को पढ़ाने का है सपना
    सरस्वती बताती हैं " शुरुआत में हम स्लम एरिया में जाते थे। वहां के लोगो से उनके बच्चों को दियाघर में भेजने का अनुरोध करते थे। कुछ लोग तैयार होते तो कुछ नही। लेकिन हमने दो बच्चों से शुरुआत की। आज दियाघर में कुल 30 बच्चे हैं। लेकिन मेरा सपना पूरे शहर के स्लम एरिया के बच्चों की जिन्दगी रोशन करना है। अब मुझे मेरे कुछ दोस्तों व परिचितों से भी आर्थिक सहायता मिलने लगी है। हमारा टारगेट अप्रैल तक 60 बच्चों का है। अकेले बेंगलुरु में लगभग 13 लाख लोग स्लम इलाके में रहते हैं। जनसंख्या के लिहाज से यह शहर का 17 प्रतिशत है। बेंगलुरु में लगभग 40,000 बच्चे ऐसे हैं जिन्हें खाने, खेलने कूदने और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।"

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    सरस्वती की इस मुहीम में उसके पति श्यामल का भी पूरा योगदान होता है
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    बचपन से ही सरस्वती ये काम करना चाहती थी
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    अपने तीन बच्चों की परवरिश के साथ ही सरस्वती दियाघर का संचालन कर रही हैं
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    कुल तीन टीचर मिलकर संस्था के बच्चों को पढ़ाते हैं
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    दियाघर में बच्चों को खेल, कला आदि चीजों की भी ट्रेनिंग दी जाती है
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