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राज्यपालों के राजसी ठाठ, यूपी-उत्तराखंड में मच्छर मारने वाले और पॉलिशर तैनात

12 ‘लाटसाहबों’ पर जनता की कमाई के सालाना 130 करोड़ खर्च, अाज भी राजस्थान में दीये जलाने वाल

Danik Bhaskar

Jan 26, 2018, 08:16 AM IST

नई दिल्ली. देश में राज्यपालों के राजसी ठाठ-बाट पर भारी-भरकम खर्च हो रहा है। जनता की गाढ़ी कमाई के 130 करोड़ रुपये देश के 12 राज्यपालों के राजभवनों पर खर्च हो रहे हैं। खास बात ये है कि इन राजभवनों में आज भी ऐसे पदों पर स्टाफ नियुक्त हैं जो कभी अंग्रेजों के समय बनाए गए थे। दैनिक भास्कर ने इस संबंध में देश के 28 प्रदेशों और 7 केन्द्र शासित प्रदेशों में आरटीआई के जरिए राजभवनों पर खर्च और स्टाफ का ब्योरा मांगा। इसमें कई चौंकाने वाले तथ्य मिले। इसके मुताबिक, राजस्थान में नौ फर्राश (दीपक जलाने वाले) नियुक्त हैं तो झारखंड के राजभवन में चार मसालची की तैनाती है। वहीं, यूपी और उत्तराखंड में दो मलेरिया से बचाने की दवा छिड़कने वाले और पॉलिशर (बूट पॉलिश के लिए) और बेलदार नियुक्त हैं। गेस्ट के बूट पॉलिश करने का काम भी पॉलिशर करते हैं।

#सिर्फ किचन पर 16 लाख खर्च

- राजभवनों में अलग-अलग मदों में होने वाले खर्च की बात करें तो गुजरात राजभवन में सिर्फ किचन पर सालाना करीब 16 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। जबकि हरियाणा राजभवन में त्योहारों पर हर साल 20 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है।

- वहीं, राजभवनों में फोन का भी लाखों का बिल बन रहा है जबकि कॉल दरें मुफ्त या बेहद सस्ती हो गई हैं।

- इसके अलावा, तमिलनाडु में बागवानी में सालाना औसत खर्च 13 लाख रुपए और किचन पर करीब 23 लाख रुपए का है।
- वहीं, दिल्ली में लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यालय के रंगाई-पुताई पर सालाना पर करीब नौ लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

- दूसरी ओर, देश के 18 राजभवनों में 2171 लोगों का स्टाफ तैनात है। इनमें सुरक्षाकर्मी शामिल नहीं है।

- महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में 200 से ऊपर स्टाफ तैनात है। जबकि आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में यह संख्या 150 से ऊपर है।

#154 दिन तक मिले जवाब, 800 से ज्यादा दस्तावेज

- 21 अगस्त 2017 को अलग-अलग आरटीआई आवेदन लगाए गए थे। यहां से 22 जनवरी 2018 तक राज्यों से जवाब आते रहे। ये सभी आरटीआई राजभवन में लगाई गई थीं जिसमें राजभवन में होने वाले धोबी, बागीचे, रंगाई-पुताई, वाहनों, चिकित्सा आदि से संबंधित खर्चों और कार्यरत स्टाफ संख्या के बारे में जानकारी मांगी थी।

- 154 दिन तक दैनिक भास्कर को करीब 800 से ज्यादा दस्तावेज मिले। इसमें से सिर्फ 18 राज्यों के राजभवनों ने जवाब दिया। 11 राज्यों ने कोई जवाब नहीं दिया।

#सुप्रीम कोर्ट में मामला इसलिए जवाब नहीं दे सकते

- गोवा, कर्नाटक, मणिपुर, चंडीगढ़ ने आरटीआई के तहत जानकारी देने से मना कर दिया। कहा, सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन होने के कारण हम आरटीआई के दायरे में नहीं।

एक्सपर्ट व्यू: गवर्नर का पद एक पॉलिटिकल टूल और राजनीतिक पुनर्वास का माध्यम बनता जा रहा है। साथ ही इस पर हो रही फिजूलखर्ची बड़ा सवाल बनकर खड़ी हो गई है। इस विषय पर दैनिक भास्कर ने संविधान विशेषज्ञों से सुधार और सुझावों को लेकर बात की। पेश है अंश :

क्लस्टर सिस्टम बनाकर कम की जा सकती है फिजूलखर्ची

- संविधान के जानकार सुभाष कश्यप बताते हैं- संविधान में साफ प्रावधान है कि एक से ज्यादा राज्यों का एक ही राज्यपाल हो सकता है। संविधान के तहत अभी भी संभावना है कि एक राज्यपाल को कई राज्यों की जिम्मेदारी दी जाए। इसमें नए प्रावधान की जरूरत नहीं है। इसलिए क्लस्टर सिस्टम बनाकर फिजूलखर्ची को कम किया जा सकता है। यानी कई राज्यों पर सिर्फ एक ही राज्यपाल को रखा जाए। हालांकि इसका निर्णय सरकार करती है।

- ''रा‌ष्ट्रपति यानी भारत सरकार की ये जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या अन्य मंत्रियों के साथ तय कर सकते हैं कि यह जिम्मेदारी एक राज्यपाल को दी जाए या कईयों को दी जाए। ऐसा नहीं है कि राजभवनों या राज्यपालों पर ही करदाताओं का पैसा फिजूलखर्च होता है और भी कई चीजें हैं जिन पर फिजूलखर्ची की जाती है। यह राजनैतिक और प्रशासनिक सुधार का भी विषय है। भारत में अभी राजनैतिक सुधारों की आवश्यकता है, इन्हें हम टुकड़ों में नहीं देख सकते हैं।''

राज्य सरकारें खर्च कम करने के लिए गवर्नर से ही सलाह लें

- लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी बताते हैं- गवर्नर जैसा संवैधानिक पद राज्य में होना चाहिए। जब संविधान के आर्टिकिल 356 के तक राज्य में सरकार विफल होती है तो राष्ट्रपति राज्य के गवर्नर के हाथ में सरकार की बागडोर सौंपते हैं। इसलिए यह पद संवैधानिक तौर पर बेहद जरूरी है। फिजूलखर्ची के बारे में कहना चाहूंगा कि अंग्रेजों के समय से चली आ रही कुछ व्यवस्थाओं को बदलने की जरूरत है।

- ''अंग्रेजों के समय में गवर्नर बेहद शक्तिशाली होता था। उसकी शान-ओ-शौकत में उसके पास ढेर सारे चपरासी होते थे। मगर आज के समय दीया जलाने, मसालची या मलेरिया की दवा छिड़कने जैसे कामों के लिए कर्मचारी रखने की कोई प्रासंगिकता नहीं है।''

- ''सरकार को गवर्नर पद के खर्चों की समीक्षा कर इसे कम करना चाहिए। गवर्नर के खर्चों पर अंकुश होना चाहिए। गवर्नर के लिए काम करने वाले सभी कर्मचारियों का खर्च राज्य सरकार वहन करती है। अगर वह चाहे तो फिजूलखर्ची को गवर्नर की सलाह से कम कर सकती है। इसके लिए गवर्नर्स को भी समझाना होगा कि राजभवन में कैसे खर्चों को कम किया जा सकता है।''

पूर्व राज्यपाल बोले-सुधार की जरूरत तो है
राज्यपालों पर हो रहे खर्च का जहां तक सवाल है तो हर राज्य की अपनी जरूरत है। हालांकि, खर्च और इस पद पर उठ रहे राजनैतिक सवालों के मद्देनजर सुधार की जरूरत तो है।

- शेखर दत्त, पूर्व राज्यपाल, छत्तीसगढ़

#ये चार सुझाव भी...ताकि बनी रहे गरिमा

संजय कुमार, निदेशक, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी​

1. कार्यकाल पर
- राष्ट्रपति की तरह ही राज्यपाल पद का एक तय कार्यकाल निर्धारित किया जाना चाहिए।

2. हटाने पर
- केंद्र की सत्ता में बदलाव मात्र से उसे पद से नहीं हटाना चाहिए। इनको नियुक्त करने वाला प्राधिकरण अलग और हटाने वाला अलग होना चाहिए। मसलन- अगर राष्ट्रपति नियुक्त करता है तो हटाने के लिए विस में महाभियोग का प्रावधान किया जा सकता है।


3. नियुक्ति पर
- पूर्व चीफ जस्टिस या नौकरशाहों की ऐसे पदों पर तैनाती के कड़े नियम बनाए जाने चाहिए। इसमें कुछ साल तक नियुक्ति नहीं देेने का नियम बनाया जा सकता है।

4. शाह खर्च पर
- राजभवन न्यूनतम 15 एकड़ जमीन पर बनता है। गवर्नर एक या दो एकड़ जमीन पर बने बंगले में भी रह सकता है। अन्य जमीन का उपयोग किसी कल्याणकारी कार्य के लिए किया जा सकता है।

#आजादी 68 साल बाद भी...कैसे-कैसे पद

झारखंड- मसालची (4), खितमदगार (3)
राजस्थान- फर्राश (दीपक जलाने वाले-9), बटलर (4), देसी कुक (4), अंग्रेजी कुक (2), भिश्ती, मसालची (3), बेलदार, शेफ
यूपी- यूनानी, होम्योपैथ, आयुर्वेद, एलोपैथ सभी तरह के डॉक्टर, मलेरिया परिचारक (मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले-2), परिचार (मेल नर्स-2), भिश्ती (पानी लाने वाले-3), डिस्पेंसरी आया (1), कुक (4), रिसेस्पशनिस्ट (7)
उत्तराखंड- वेटर (4), मसालची (2), दफ्तरी (1), हेड खितमदगार (1), पॉलीशर (1), बेलदार (3)
असम- मैसेंजर (2), दफ्तरी (1), लिफ्ट मैन (1), मसालची (2)

#बागवानी पर सालाना 15 लाख तक खर्च

हरियाणा- 16 शपथ ग्रहण समारोह में 24.61 लाख खर्च
झारखंड- करीब 31 लाख रुपये सालाना बिजली बिल
महाराष्ट्र- पांच साल में कल्चरल एक्टिविटी पर 64 लाख खर्च
असम- 2016 में कपड़ों की धुलाई पर 12 लाख रुपए खर्च
तमिलनाडु- 2016-17 में बागवानी पर 15 लाख रुपए खर्च किए गए।

यूपी- 2016-17 में टेलीफोन पर 5 लाख खर्चे
उत्तराखंड- पिछले साल 13 लाख रुपये का फोन बिल भुगतान

#राजभवनों में 25 से लेकर 286 लोगों तक का स्टाफ

महाराष्ट्र- 286

पश्चिम बंगाल- 215

पुडुचेरी- 41

अंडमान निकोबार- 25

हरियाणा - 115

छत्तीसगढ़ - 178

असम -83

गुजरात - 45

राजस्थान - 183

राजस्थान - 183

तमिलनाडु - 30

जम्मू कश्मीर- 102

दिल्ली- 60

उत्तराखंड - 98

झारखंड - 145

अरुणाचल - 63

झारखंड - 145

मणिपुर - 136

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