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देश में ये तय नहीं गरीब कौन और सरकार इनके लिए योजनाओं पर कर रही माथापच्ची

कागजों पर गरीबों को कम करने के लिए आंकड़ों की बाजीगरी में उलझी सरकार

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 03:50 AM IST

नई दिल्ली. केंद्र सरकार गरीब और गरीबी की परिभाषा तय करने में माथापच्ची कर रही है। इसे लेकर वह लगातार बैठकें भी कर रही है। पीएम की अध्यक्षता में बुधवार रात 19 प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में गरीबों को लेकर चल रही योजनाओं पर मंथन किया गया। यह कवायद ऐसे वक्त हो रही है जब यही तय नहीं है कि भारत में गरीब कौन है। छह दशकों में सभी केन्द्र सरकारें यह बताने में नाकाम रही हैं। तेंदुलकर कमेटी के हिसाब से देश में गरीब वह है जो रोज 33 रुपए भी खर्च नहीं कर सकता।


सरकार को संयुक्त राष्ट्र के मापदंडों पर खरा उतरने के लिए खर्च करने के इस स्तर को 2030 तक ऊंचा करना है। यह लक्ष्य 1.25 डॉलर (आज के हिसाब से 90 रुपए) का है। यानी 2030 में गरीब वह व्यक्ति माना जाएगा जो रोज 1.25 डॉलर से कम खर्च करता हो। अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि विश्व बैंक द्वारा तय की गई इस परिभाषा के हिसाब से रिपोर्ट बनाई जाएगी तो गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की संख्या कई गुना बढ़ जाएगी। ऐसे में वह आंकड़ों की बाजीगर कर गरीबों की संख्या थामने की तैयारी कर रही है।


नीति आयोग के सूत्रों का कहना है कि एसडीजी (सस्टेनेबल डेवलेपमेंट गोल-2030) का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार प्रतिव्यक्ति कैलोरी खपत के साथ, बैंक, हेल्थ, घर, सफाई जैसी सुविधाओं को भी जोड़ेगी। इन पर होने वाले औसत खर्च को जोड़कर एसडीजी में तय 1.25 डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश होगी। इसी के आधार पर सरकार आने वाले समय में गरीबी की नई परिभाषा गढ़ सकती है।

गौरतलब है कि अभी कैलोरी और न्यूनतम खर्च के हिसाब से गरीबी परिभाषित की जाती है। वहीं 2016 में संयुक्त राष्ट्र के एसडीजी प्रोग्राम का 150 से ज्यादा देश हिस्सा बने थे। जिसमें 17 क्षेत्रों में सुधार का लक्ष्य 2030 तक हासिल करने की बात कही गई थी। इसमें से एक गरीबी भी है। विश्व के सभी देशों में समानता रहे इसलिए राशि डॉलर में दी गई है।

कैलोरी और प्रति व्यक्ति खर्च के आधार पर रिपोर्ट
गरीबी रेखा तय करने के लिए भारत सरकार ने करीब आधा दर्जन कमेटियां बनाईं। लेकिन हर कमेटी की रिपोर्ट से कोई न कोई विवाद खड़ा हो जाता था। जिस कारण फिर से नए सिरे कमेटी बनाई जाती थी। लेकिन इन सभी कमेटियों ने अपनी रिपोर्ट में कैलोरी और प्रति व्यक्ति खर्च के आधार पर तैयारी की थी। गांव में 2400 और शहर में 2100 कैलोरी से कम खपत करने वाला इंसान गरीब माना जाएगा।

गरीबी की नई परिभाषा के लिए एक और समिति
नीति आयोग सस्टेनेबल डेवलेपमेंट गोल-2030 को ध्यान में रखते हुए जनवरी 2017 में गरीबी को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए समिति का गठन किया था। जिसके सदस्य बिबेक दोबरॉय हैं।

तेंदुलकर समिति

इस समिति के आंकड़े इकट्‌ठे करने के तरीके की भी आलोचना हुई। तेंदुलकर फॉर्मूले के मुताबिक भारत में गरीबों की संख्या 27 करोड़ हो गई थी।

रंगराजन समिति

रंगराजन फॉर्मूले के हिसाब से 47 रुपए से कम कम खर्च करने वाला आदमी गरीबी रेखा में आएगा। इससे देश में गरीबों की संख्या 36 करोड़ हो गई थी।

इसलिए की जा रही नई परिभाषा गढ़ने की कवायद
...ताकि यूएन के सामने न हो बदनामी

- गरीबी उन्मूलन पर हर सरकार ने योजना बनाई लेकिन छह दशकों से हर कोई गरीबी परिभाषित करने में रहा नाकाम

- अब संयुक्त राष्ट्र के मापदंडों पर खरा उतरने के लिए सरकार के पास हैं सिर्फ 12 साल, इसलिए सरकार की नई परिभाषा गढ़ने की कवायद जारी।

प्रोफेसर लकड़ावाला कमेटी

वर्ष 2004-05 में शहरों में 33 रुपए और गांवों में प्रतिदिन 27 रुपए खर्च करने वालों को गरीब नहीं माना गया।

गरीबी रेखा को नए सिरे से परिभाषित करने पर कमेटी काम कर रही है। उम्मीद है इसकी रिपोर्ट जल्द आ जाए। हमारी पूरी कोशिश है कि हम 2030 तक इसके अधिकांश लक्ष्यों को प्राप्त कर लें।
- राजीव सिंह, उपाध्यक्ष, नीति आयोग

सरकार अभी सिर्फ कैलोरी पर ध्यान केंद्रित करके गरीबी रेखा तय करती है। जबकि असलियत यह है कि गरीबी रेखा को भुखमरी रेखा कहना चाहिए। क्योंकि उन्हें भरपेट खाना नहीं मिल पता है।
- देवेन्द्र शर्मा, खाद्य एवं कृषि नीतियों के विश्लेषक