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आदिवासी क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगा रहा है ये आईएएस , पहली पोस्टिंग में ही कर रहा ये काम

आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने का जिम्मा एक आईएएस ने उठाया है।

Danik Bhaskar | Feb 13, 2018, 11:05 PM IST

दिल्ली . आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने का जिम्मा एक आईएएस ने उठाया है। आईएएस सुहास शिवन्ना खुद आदिवासी क्षेत्रों में जाकर वहां के लोगों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। वह स्कूलों से जानकारी जुटा रहे हैं कि कितने प्रतिशत आदिवासी बच्चे स्कूल आते हैं और कितने बीच में पढाई छोड़ कर चले जाते हैं। इसके लिए सुहास ने विभागीय अधिकारियों की टीम बनाकर इसका सर्वे भी करा रहे हैं। Dainikbhaskar.com ने आईएएस सुहास शिवन्ना से बात की इस दौरान उन्होंने अपनी मुहिम के बारे में कई बातें शेयर कीं।

2012 बैच के आईएएस अधिकारी सुहास शिवन्ना बेंगलुरू के रहने वाले हैं। उनके पिता सीके शिवन्ना भी रिटायर्ड आईएएस हैं। सुहास की पत्नी वैष्णवी डॉक्टर हैं और कोच्चि के एक अस्पताल में तैनात हैं। सुहास इन दिनों केरल के वायनाड जिले में बतौर डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर तैनात हैं। वह वायनाड में आदिवासी बच्चों की शिक्षा को लेकर एक मुहिम चला रहे हैं।

तैनाती के तुरन्त बाद शुरू किया सरकारी स्कूलों का दौरा
सुहास बताते हैं "मैंने वायनाड में तैनाती के तुरंत बाद ही वहां के सरकारी स्कूलों का दौरा शुरू किया। इन स्कूलों में मैंने ये पता करना शुरू किया कि वहां कितने बच्चे पढ़ने रेगुलर आते है और वह किस समुदाय से हैं। वायनाड में आदिवासियों की जनसंख्या काफी अधिक है। वहां मैंने पाया कि स्कूलों में आदिवासी बच्चों का परसेंट न के बराबर है।"

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आर्थिक समस्या से नही हो पाती थी पढ़ाई
सुहास बताते हैं "जांच रिपोर्ट में सामने आया कि आदिवासी बच्चों का स्कूल न आने और उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाने का प्रमुख कारण उनके परिवार की आर्थिक स्थिति है। काफी गरीब परिवार से आने की वजह से बच्चों के ऊपर घर की जिम्मेदारियों को संभालने का दबाव आ जाता है। अधिकतर बच्चे खेती के काम में लग जाते हैं। आसपास के लोगों को भी कम दाम पर लेबर मिल जाते हैं इसलिए वे बच्चों को काम में लगा देते हैं। "

 

पत्नी डॉ वैष्णवी के साथ सुहास पत्नी डॉ वैष्णवी के साथ सुहास

खुद उठाया समस्याओं के निदान का बीड़ा
सुहास बताते हैं कि "मुझे काफी पीड़ा हुई कि पढ़ने की उम्र में बच्चों को परिवार चलाने के लिए काम करना पड़ रहा है। मैंने कई आदिवासी क्षेत्रों का विजिट शुरू किया। मैंने आदिवासी लोगों को ये समझना शुरू किया कि पढ़ाई कितनी महत्वपूर्ण होती है। मैंने बाल मजदूरी पर भी अंकुश लगाने के लिए अभियान चलाया।"

समस्या को समझने के लिए गठित की टीम
सुहास बताते हैं "सबसे पहले मैंने इसे जानने का प्रयास किया कि आखिर आदिवासियों की संख्या स्कूल में इतनी कम क्यों है। इसके लिए मैंने  शिक्षा विभाग और आदिवासी कल्याण विभाग के अधिकारियों को बुलाकर एक जांच टीम गठित की। अधिकारियों को इन स्कूलों का दौरा करने और समय पर रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए। रिपोर्ट में पता चला कि बच्चे स्कूल में एडमिशन तो लेते हैं, लेकिन 7वीं से 10वीं के बीच में ही उनकी पढ़ाई छूट जाती है।"

बच्चों के साथ बिताते हैं दिन
सुहास बताते हैं कि" बच्चों का मनोबल बढ़ाने के लिए मै उन्हें घुमाने ले जाता हूं। कुछ दिन पहले ही मैंने इन बच्चों को मेट्रो की सैर कराई थी। इनके रहन सहन को प्रमोट करने के लिए भी मै काम कर रहा हूं। इनके साथ दिन गुजारने से उनकी समस्याओं को करीब से समझने का मौक़ा मिल जाता है। जिससे मैं प्रभावी रूप से उनकी मदद कर पाता हूं।"

 

स्कूल में बच्चों के साथ मिड-डे- मील खाना है पसंद
सुहास बताते हैं "मै अक्सर किसी स्कूल में पहुँच जाता हूं और वहां के बच्चों के साथ मैं भी मिडडे मील खाता हूं। इससे खाने की गुणवत्ता बनी रहती है।  इसके साथ ही मै कई सारी प्रतियोगिताएं भी करवाता हूं।  जिनमें बच्चों को कलेक्टर के साथ एक दिन बिताने काम मौका भी मिलता है। मैं स्कूलों में बच्चों और शिक्षकों से उनकी समस्याएं सुनता हूं और उन्हें दूर करने का प्रयास भी करता हूं। स्कूल में संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जाए इसके लिए भी मैंने कई कदम उठाए हैं। अब ये सब करके खुशी मिल रही है क्योंकि इलाके में शिक्षा की स्थिति में काफी सुधार आया है और बच्चों के ड्रॉपआउट रेट में भी काफी गिरावट आई है।"