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शहीद की बेटी बोली- तीन घंटे बेड के नीचे छिपे रहे, सांस की आवाज तक नहीं आने दी

3 आतंकी मारे गए। आर्मी चीफ ऑपरेशन की कमान संभाल रहे थे।

गोविंद चौहान | Last Modified - Feb 13, 2018, 11:44 PM IST

  • शहीद की बेटी बोली- तीन घंटे बेड के नीचे छिपे रहे, सांस की आवाज तक नहीं आने दी
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    सुंजवान अटैक के बाद लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाते जवान।

    जम्मू-कश्मीर. सुंजवान आर्मी कैंप पर 15 साल बाद सबसे बड़ा हमला हुआ। 55 घंटे चली मुठभेड़ में 6 जवान शहीद हो गए। इस दौरान एक जवान के पिता की भी मौत हो गई। 3 आतंकी मारे गए। आर्मी चीफ ऑपरेशन की कमान संभाल रहे थे। रक्षा मंत्री ने सोमवार शाम ऑपरेशन खत्म होने का एलान किया। इस पर दैनिक भास्कर की स्पेशल रिपोर्ट...

    चारों और चीख-पुकार मची थी

    - शहीद सूबेदार मदनलाल चौधरी की बेटी नेहा 20 साल की हैं। उन्हेंं पैरों में गोली लगी है। मिलिट्री हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है।

    - उन्होंने बताया, "उस सुबह मैं, मम्मी-पापा, मौसी और मौसेरा भाई क्वार्टर में सो रहे थे। तभी दरवाजे को किसी ने खटखटाया। इतनी जोर से कि सबकी नींद खुल गई। भाई ने दरवाजा खोलना चाहा तो पापा ने रोक दिया। पापा कुछ समझते उससे पहले गोलियां चलने लगीं। मेरे पैरों में गोली लगी।"

    - "पिताजी ने हम सबको अंदर के कमरे में भेजा और खुद दरवाजे की ओर लपके। वह जोर-जोर से बोल रहे थे- आतंकी हैं। चारों ओर चीख-पुकार मची थी।"

    - "गोलियों की आवाजें आ रही थीं और हम सब बेड के नीचे छिपे थे। खून बह रहा था।"

    किसी ने फोन रिसीव नहीं किया

    - नेहा ने आगे बताया, "उसी हाल में अपने फोन से कई लोगों को फोन किया, पर किसी ने रिसीव नहीं किया। उसके बाद पिताजी का फोन निकालकर उसमेंं जिन अफसरों के नंबर थे, उन्हें डायल किया। पर वहां से भी कोई जवाब नहीं आया।"

    - "करीब तीन घंटे तक मैं, मां, मौसी और भाई कमरे में छिपे रहे। पापा बाहरी कमरे में थे। उन्हें क्या हुआ पता नहीं चल रहा था। फिर भी अफसरों को एसएमएस करते रहे।"

    पापा हमें बचाते हुए शहीद हो गए

    - नेहा ने कहा, "बाद में कमरे के पास किसी ने पापा का नाम पुकारा, तो समझ में आया कि कोई अपना आया है। बाहर आई तो देखा कि दूसरे कमरे में खून पसरा था। पर पापा नहीं थे। फिर रेस्क्यू के लिए आए जवान मुझे और मौसी को बख्तरबंद गाड़ी में डालकर अस्पताल ले आए। उन तीन घंटाें में हमने कमरे के बाहर अपनी सांस की आवाजे तक नहीं जाने दी। हॉस्पिटल में पता चला कि पापा हमें बचाते हुए शहीद हो गए।"

    आतंकियों की गोली मेरे हाथ में लगी: लांस नायक बहादुर सिंह

    - लांस नायक बहादुर सिंह ने बताया, "उस रात मेरी संतरी की ड्यूटी थी। पोस्ट पर बैठा था। सुबह रोशनी लगने के बाद ड्यूटी खत्म होनी थी। फैमली क्वार्टर से थोड़ा पहले ही मेरी पोस्ट है। करीब सवा पांच बजे देखा कि दो लोग दौड़ते हुए क्वार्टर्स की ओर जा रहे हैं।"

    - "इससे पहले फायर की आवाज आई थी। तो मैं समझ गया दोनों आतंकी हैं। मैंने उन पर फायर झोंका तो आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। मेरे हाथ में गोली लग गई।

    अब मैं हथियार नहीं चला पा रहा था।"

    फोन पर आतंकियों की लोकेशन बताई

    - बहादुर सिंह ने कहा, "फौरन मैंने फोन निकाला और दूसरी पोस्ट पर तैनात जवान को आतंकियों की लोकेशन बताई। जवान ने कहा कि उसके पास स्नाइपर राइफल है। वह आतंकियों को निशाने पर ले लेगा। उसके बाद अपने सूबेदार और क्वार्टर्स में रहने वाले साथियों को फोन करके अलर्ट किया। सभी को अंदर ही रहने की ताकीद की।"

    - "काफी देर तक पोस्ट पर ही रहा, लेकिन इस बीच आतंकी गायब हो गए थे। बाद में और जवान आए तो घेरेबंदी करके मुझे पोस्ट से उतारा गया।"

    आगे की स्लाइड में पढ़ें, हर क्वार्टर के बाहर जवान तैनाती के बाद हुई कार्रवाई...

  • शहीद की बेटी बोली- तीन घंटे बेड के नीचे छिपे रहे, सांस की आवाज तक नहीं आने दी
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    हर क्वार्टर के बाहर जवान तैनात करने के बाद हुई कार्रवाई।

    हर क्वार्टर के बाहर जवान तैनाती के बाद हुई कार्रवाई

    - ऑपरेशन में शामिल सेना के मेजर रैंक के एक अफसर ने बताया, "सुबह फायरिंग होने के बाद पूरा कैंप अलर्ट हो गया। मैं अपने साथी जवानों के साथ मौके पर पहुंचा। हमारे पास जानकारी आ चुकी थी कि आतंकी फैमिली क्वार्टर्स की तरफ गए हैं। इसलिए हमने उस इलाके में रोशनी कर दी। चारों ओर से लाइट्स का फोकस उस इलाके में रखा गया, जहां आतंकी के मूवमेंट की खबर थी। फिर एक-एक करके क्वार्टर्स में टीम लगाई गई।"

    पूरी टीम बख्तरबंद गाड़ियों में गई

    - अफसर ने बताया, "जवानों को क्वार्टर्स तक पहुंचाने के लिए बख्तरबंद गाड़ियों का इस्तेमाल किया गया। ये गाड़ियां जवानों की टीम को अंदर डालती और क्वार्टर्स के बाहर उतारतीं। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि हमें आतंकियों की लोकेशन नहीं पता थी। ऐसे में और नुकसान न हो, इसलिए पूरी टीम को बख्तरबंद गाड़ियों में ले जाया गया। जिस क्वाटर में फैमिली होती, उसके बाहर जवानों को तैनात करते जाते। ताकि इस तरह से क्वार्टर्स को सुरक्षित किया जाए।"

    दोपहर बाद शुरू किया ऑपरेशन

    - उन्होंने बताया, "तब तक दोपहर हो चुकी थी। फिर ग्राउंड में आपरेशन शुरू किया गया। क्योंकि हमें पता लग गया था कि आतंकी ग्राउंड में कहीं छिपे हुए हैं। इस तरह से एक-एक करके पहले दिन ही दो आतंकियों को मार गिराया गया। उसके बाद उसी इलाके में टीम को रखा गया। दूसरे दिन तीसरा आतंकी भी मारा गया। तीसरे दिन इसलिए आॅपरेशन जारी रखा गया, ताकि देखा जा सके कि कोई और आतंकी तो नहीं छिपा हुआ है।"

    जंगल की वजह से ऑपरेशन में देरी हुई: एसपी विनय कुमार
    - आतंकियों के खिलाफ आॅपरेशन में जुड़े पुलिस के स्पेशल ग्रुप के एसपी विनय कुमार ने बताया, "शनिवार सुबह पीसीआर से आर्मी कैंप पर आतंकी हमला होने का मैसेज आया। फौरन हम मौके पर पहुंचे। सेना के कैंप में घुसे। अंदर हमारे जवानों ने पोजीशन ले ली थी। हमारे जवान मुठभेड़ में माहिर हैं, लेकिन अंदर इतना जंगली इलाका था कि ऑपरेशन पूरा करने में देर हुई।"

    घायल सूबेदार राजेंद्र सिंह ने सबसे पहले बताया कि कैंप में 3 अातंकी घुसे हैं

    - सूबेदार राजेंद्र सिंह ने बताया, "रोज की तरह सुबह 5 बजे सैर के लिए बाहर निकला। ग्राउंड में देखा तीन लोग सेना की वर्दी में दौड़ रहे हैं। उनके चलने के तरीके से समझ गया कि जवान नहीं, आतंकी हैं। उन्हें ललकारा तो उन्होंने फायरिंग कर दी। गोली लगने पर मैंने पास के नाले में छलांग लगा दी। काफी देर तक ऐसे पड़ा रहा जैसे मेरी मौत हो गई हो। आतंकी पास आए और क्वार्टर्स की ओर चले गए। जब वहां से फायर की आवाज आई तो बाहर निकला और दूसरी तरफ के जवानों को आतंकी हमले की जानकारी दी। यह भी बता दिया कि वह तीन हैं। हथियारों से लैस हैं और क्वार्टर्स की ओर गए हैं।"

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    घायल सूबेदार राजेंद्र सिंह ने सबसे पहले बताया कि कैंप में 3 अातंकी घुस आए हैं।
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