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मुद्दे मुझे तब तक बेचैन करते हैं, जब तक उन पर कोई कदम न उठा लूं

नो निगेटिव मंडे: वे लोग जो अभाव व संघर्ष से निकले और दुनिया के लिए मिसाल बने।

Danik Bhaskar

Jan 22, 2018, 07:56 AM IST
अक्षय कुमार का विशेष लेख सिर्फ अक्षय कुमार का विशेष लेख सिर्फ

स बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किन परिस्थितियों में हैं। बस उस काम के प्रति जुनून बनाए रखें, जो करना चाहते हैं। मैं अपने कॅरिअर की शुरुआत से ही समाज के लिए कुछ करना चाहता था। यह हमेशा से मेरे जेहन में था। मुझे लगता है कि सिनेमा एक बेहद ताकतवर माध्यम है और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद कर सकता है। आप इसकी लोगों को प्रभावित करने की क्षमता का अंदाजा लगा सकते हैं।

- मुझे याद है कि जब मेरा परिवार दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हुआ था, तब हम शनिवार को लन्च के पैसे बचाकर शाम को फिल्म देखने जाते थे। इन्हीं पैसों में समोसा और स्टिक वाली ऑरेंज आइसक्रीम भी खरीदते थे।

- मेरा मानना है अगर फिल्में मेरे परिवार को हर शनिवार खुशी-खुशी भूखा रख सकती थीं, तो कल्पना करें कि सही इस्तेमाल से ये क्या कुछ नहीं कर सकतीं। यही वजह रही कि एक्टिंग के बीच मैंने प्रोड्यूसर के तौर पर फिल्म खट्‌टा-मीठा (2010) बनाई। इसमें भारत में सड़कों की स्थिति और भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया। हालांकि ये फ्लॉप रही और मैं निराश हो गया।

- दोबारा फिल्मों में लौटा और सिंह इज किंग, नमस्ते लंदन और वक्त जैसी फिल्में कीं। मगर मैं फिर अपने उद्देश्य की तरफ लौटा, क्योंकि कोई मुद्दा तब तक मेरी अंतरात्मा को कचोटता रहता है, जब तक कि मैं उसके लिए कुछ कर न दूं। पिछले दिनों मैं नासिक में एक किसान से मिला, जिसने दिल को छू लेने वाली अपनी कहानी मुझे बताई। मैंने उनसे दोबारा मिलने की बात कही है।

देश में ऐसी कई कहानियां
- इसी तरह असल कहानियां लोगों के बीच जाने से पता चलती हैं, न कि दफ्तर में सोफे पर बैठकर। ये ऐसी कहानियां होती हैं, जिससे आम व्यक्ति खुद को जोड़कर देखता है। आज हमारे देश में ऐसी कई कहानियां हैं, जिनका लोगों तक पहुंचना बाकी है। ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाना बाकी है। जैसे कि मेरी अगली फिल्म पैडमैन का मुद्दा।

- मुझे लगता है कि अब लोग सैनिटरी पैड्स पर खुलकर बात कर रहे हैं। इससे यह भी समझ आता है कि लोग बदलाव के लिए तैयार हैं। हमें बस इन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है, क्योंकि हमारे पास माध्यम (सिनेमा) है। ऐसा ही कुछ संदेश टॉयलेट एक प्रेम कथा में भी था।
- मैं बस उन सकारात्मक बदलावों का एक छोटा-सा हिस्सा बनने की उम्मीद करता हूं, जिनकी हमारे देश को जरूरत है। और मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि सिनेमा में इस बदलाव की ताकत है।

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