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कश्मीरी पंडितों के जर्जर मकानों में चल रहे हैं सुरक्षा बलों के कैंप

घनी आबादी की वजह से सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के सभी इंतजाम कर पाना मुश्किल

अनूप कुमार मिश्र | Last Modified - Feb 15, 2018, 08:00 AM IST

  • कश्मीरी पंडितों के जर्जर मकानों में चल रहे हैं सुरक्षा बलों के कैंप
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    नई दिल्ली. कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के पलायन से खाली और जर्जर हो चुके मकानों में बने सैन्य कैंप ही सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। दरअसल राज्य सरकार ने 90 के दशक में पलायन के बाद खाली हुई इन इमारतों को थोड़ी-बहुत मरम्मत के बाद केंद्रीय सुरक्षा बलों की गतिविधियों के लिए आवंटित कर दिया। ये सभी इमारतें बेहद घनी आबादी के बीच बनी हैं। नतीजतन, सुरक्षा बल न ही अपनी हिफाजत के लिए निर्धारित मानकों के तहत इंतजाम कर सकते हैं और न ही हमले की स्थिति में आतंकियों को खुल कर मुंहतोड़ जवाब ही दे सकते हैं। सुरक्षा बलों को हमेशा डर सताता रहता है कि बचाव में उनके तरफ से की गई फायरिंग में स्थानीय नागरिक न हताहत हो जाएं। आलम यह है कि सुरक्षा बलों को अब ऐसा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है, जिससे वह अपने कैंपस की सुरक्षा को पुख्ता बना सकें।

    घनी आबादी की वजह से सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के सभी इंतजाम कर पाना मुश्किल
    1. घनी आबादी में होने के चलते परिसर के बाहर आम लोगों की आवाजाही नहीं रोकी जा सकती है। आम लोगों की आड़ में आतंकी सुरक्षा बलों के परिसर की रैकी करने और उन तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं।
    2. सुरक्षा के लिहाज से इमारत के बाहर एक मोर्चा, सीसीटीवी और छतों पर अलार्म वायर लगाने का विकल्प मौजूद होता है। सीसीटीवी कैमरे यहां ज्यादा मददगार साबित नहीं हो पाते हैं। दरअसल, कश्मीर में आमतौर पर सभी लोग बड़े लबादे पहनते हैं। ऐसे में यह पता लगना मुश्किल है कि लबादे में कुछ छिपा रखा है या नहीं।
    3. घना रिहायशी इलाका होने की वजह से सड़क पर इतनी जगह नहीं मिलती की बैरिकेंडिंग कर तीन स्तरीय सुरक्षा चक्र बनाया जा सके।
    4. हमला होने पर खुल कर फायरिंग नहीं कर सकते हैं, इसमें स्थानीय लोगों और उनके घरों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है।


    सोमवार को सीआरपीएफ के जिस कैंप में हमला हुआ वह भी कश्मीरी पंडित का घर सोमवार तड़के दो आतंकियों ने श्रीनगर के करन नगर स्थित जिस सीआरपीएफ कैंपस को अपना निशाना बनाने की कोशिश की थी, वह कैंपस भी किसी कश्मीरी पंडित द्वारा छोड़ी गई इमारत में बनाया गया था। इस इमारत में सीआरपीएफ के करीब दो सौ जवान रहते हैं।

    सिर्फ 8 फीसदी जवान ही सुरक्षित ठिकानों में रह रहे हैं
    केंद्रीय सुरक्षा बल के वरिष्ठ अधिकारी ने सीआरपीएफ का उदाहरण देते हुए बताया कि जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के 78 हजार जवान तैनात हैं। इनके लिए कश्मीरी पंडितों द्वारा छोड़ी गई 65 इमारतों को बटालियन हेडक्वाटर्स में बदला गया है। सीआरपीएफ ने अपने खर्च से बानाता (जम्मू), नगरौटा (जम्मू), रामबाग (श्रीनगर), लेखपुरा (श्रीनगर) और हुमामा (श्रीनगर) में कैंपसों का निर्माण किया है। वर्तमान समय में इन परिसरों में सिर्फ छह हजार जवान और अधिकारी रह रहे हैं। बाकी 72 हजार जवान (करीब 92 फीसदी) अभी भी असुरक्षित ठिकानों में रहने के लिए मजबूर हैं।

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