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15 साल तक हाउस अरेस्ट रही थी ये लीडर, दिल्ली से है खास कनेक्शन

म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची गणतंत्र दिवस समारोह में शिरकत करने भारत आईं हैं।

Danik Bhaskar | Jan 25, 2018, 01:01 PM IST
आंग सान सू ची दिल्ली के 24 अकबर रोड में रहा करती थीं। आंग सान सू ची दिल्ली के 24 अकबर रोड में रहा करती थीं।

दिल्ली. इस बार गणतंत्र दिवस समारोह एक नया इतिहास लिखने जा रहा है क्योंकि इसमें पहली बार 10 आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होने जा रहे हैं। इनमें से एक म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची भी होंगी, जो समारोह में शिरकत करने के लिए भारत पहुंच चुकी हैं। लेकिन क्या आपको पता है जिस दिल्ली में सू ची मौजूद हैं, पहले कभी वो इसी शहर में आम लोगों की तरह सड़कों पर घूमा करती थीं। वो यहीं पली-बढ़ी भी हैं। ऐसा है इंडियन कनेक्शन..

- Dainikbhaskar.com आपको बताने जा रहा है वर्ल्ड फेमस लीडर आंग सान सू ची के इंडियन कनेक्शन और उनके अचीवमेंट्स के बारे में कि कैसे दिल्ली में पली बढ़ी ये लीडर आज नोबेल शांति पुरस्कार विजेता के तौर पर जानी जाती है।

24 अकबर रोड में रहती थीं सू ची

- बता दें कि सू ची 15 साल की थीं जब वो अपनी मां डॉ. खिन की के साथ 24 अकबर रोड आई थीं, जो अब कांग्रेस का मुख्यालय है। उनकी मां को भारत में म्यांमार का राजदूत नियुक्त किया गया था।

पिता थे स्वतंत्रता सेनानी

- सू की के पिता महान स्वतंत्रता सेनानी और म्यांमार सेना के संस्थापक आंग सान थे, जो पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के बहुत अच्छे मित्र भी थे।

पं नेहरू ने गिफ्ट किया था बंगला

- बताया जाता है कि आंग सान से दोस्ती की वजह से जवाहरलाल नेहरू ने डॉ खिन को 24 अकबर रोड पर एक बंगला गिफ्ट दिया था, जिसका नाम बर्मा हाउस रखा गया। ये बंगला आधुनिकता और ब्रिटिश कोलोनियल आर्किटेक्चर का अद्भुत नमूना माना जाता था।

आगे की स्लाइड्स में जानें दिल्ली में पली-बढ़ी इस लीडर के बारे में कुछ इंटरेस्टिंग फैक्ट्स...

लेडी श्रीराम कॉलेज से किया ग्रैजुएशन

 

- सू की ने नई दिल्ली के जीसस एंड मैरी स्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा ली, इसके बाद 1964 में लेडी श्रीराम कॉलेज से राजनीति में ग्रैजुएशन की डिग्री हासिल की।

 

- माना जाता है कि भारत में बिताए समय ने सू ची को एक राजनीतिज्ञ के रूप में खुद को तैयार करने में मदद की, जिसके कारण 1991 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला।

 

- बताया जाता है कि कांग्रेस मुख्यालय का आज जो कमरा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अलॉट है, कभी उसमें सू ची रहा करती थीं।

संजय और राजीव गांधी के साथ खेलती थीं

 

- 24 अकबर रोड के बगीचे में सू ची संजय और राजीव गांधी के साथ खेला करती थीं। दोनों उनके समकालीन थे, एक उनसे एक साल बड़ा था और दूसरा उनसे एक साल छोटा। तीनों को अक्सर राष्ट्रपति भवन में देखा जाता था, जहां वो राष्ट्रपति के अंगरक्षकों से घुड़सवारी सीखते थे।

 

- 1987 में सू ची ने कुछ समय शिमला के इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी में फेलो के तौर पर भी बिताया। सू की ने अपनी पढ़ाई सेंट ह्यूग कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में जारी रखते हुए दर्शन शास्त्र, राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र में 1969 में डिग्री हासिल की।

माइकल ऐरिस से की थी शादी

 

- स्नातक करने के बाद न्यूयॉर्क शहर में परिवार के एक दोस्त के साथ रहते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में तीन साल तक काम किया।

 

- 1972 में आंग सान सू की ने तिब्बती संस्कृति के विद्वान और भूटान में रह रहे डॉ. माइकल ऐरिस से शादी की। अगले साल लंदन में उन्होंने अपने पहले बेटे, अलेक्जेंडर ऐरिस, को जन्म दिया।

 

- उनका दूसरा बेटा किम 1988 में पैदा हुआ। इसके बाद उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ओरिएंटल और अफ्रीकन स्टडीज से 1985 में पीएच.डी. हासिल की।

1995 में पति से हुई थी आखिरी मुलाकात

 

- 1988 में सू ची अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए लौट आईं, लेकिन बाद में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। 1995 में क्रिसमस के दौरान माइकल की म्यांमार में सू ची से आखिरी मुलाकात साबित हुई, क्योंकि इसके बाद म्यांमार सरकार ने माइकल को प्रवेश के लिए वीजा देने से इंकार कर दिया।

 

- 1998 में माइकल को प्रोस्टेट कैंसर हुआ तो भी म्यांमार सरकार ने म्यांमार में प्रवेश के लिए वीजा नहीं दिया, हालांकि सू ची को विदेश जाने की अनुमति दे दी। लेकिन सू की ने देश में दोबारा प्रवेश पर पाबंदी लगाए जाने की आशंका के मद्देनजर म्यांमार नहीं छोड़ा। माइकल का उनके 53वें जन्मदिन पर देहांत हो गया।

चक्रवात में घर हो गया था तबाह

 

- 2 मई 2008 को चक्रवात नरगिस के म्यांमार में आए कहर की वजह से सू ची का घर तबाह हो गया था। इसके बाद कई दिनों तक सू ची को बिजली के अभाव में मोमबत्ती जलाकर रहना पड़ा था।

 

- कहा जाता है कि सू ची को दो दशक तक सैन्य शासन के खिलाफ आवाज बुलंद करने की वजह से म्‍यांमार सरकार ने 15 साल तक नजरबंद रखा। उस समय दुनिया के लाखों लोग उनकी रिहाई की दुआ मांगते थे।

 

- 1988 में काफी संघर्ष के बाद म्यांमार चुनावों में उनकी अगुवाई वाली नैशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) को जीत मिली। 1991 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।