300 चीनी सैनिकों का खात्मा कर 72 घंटे तक अकेले लड़ा था ये फौजी / 300 चीनी सैनिकों का खात्मा कर 72 घंटे तक अकेले लड़ा था ये फौजी

दिल्ली HC ने शहीद जसवंत सिंह रावत पर बायोपिक की शूटिंग रोकने की PIL पर विचार करने से इनकार किया।

DainikBhaskar.com

Feb 16, 2018, 05:21 PM IST
Special Story on 1962 indo china war hero Rifleman Jaswant Singh Rawat

दिल्ली. दिल्ली हाईकोर्ट ने 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए राइफलमैन जसवंत सिंह रावत के परिजनों से सवाल किया है कि किसी व्यक्ति, भले ही वो युद्ध का हीरो हो, की जीवन गाथा पर कॉपीराइट कैसे लागू हो सकता है जब वह प्रकाशित ही नहीं हुई हो। शहीद के विजय गाथा पर फिल्म पर बन रही है फिल्म..

बता दें कि मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की विजय गाथा पर एक फिल्म बनाई जा रही है। इस पर जसवंत सिंह के परिजनों आपत्ति जताई है। उनकी दलील है कि फिल्म की कहानी कॉपीराइट और उनकी निजता का उल्लंघन है। हालांकि, कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 फरवरी की तारीख तय की है। इस मौके पर DainikBhaskar.com अपने रिडर्स को चीन से देश को बचाने वाले सैनिक की हैरतअंगेज कहानी बताने जा रहा है।

सेना के 5 जवान करते हैं शहीद की सेवा

- 1962 के भारत-चीन युद्ध में 72 घंटे तक अकेले बॉर्डर पर लड़कर और 300 चीनी सौनिकों को मारकर शहीद होने वाले भारतीय सैनिक जसवंत सिंह रावत आज भी अमर हैं। इस फौजी ने अकेले ही चीन को धूल चटाई और अरुणाचल प्रदेश पर चीन का कब्जा होने से रोक लिया। अरुणाचल प्रदेश के नूरानांग में बने जसवंतगढ़ वॉर मेमोरियल में 24 घंटे उनकी सेवा में सेना के पांच जवान लगे रहते हैं। यही नहीं, रोजाना उनके जूतों पर पॉलिश की जाती है और उनके कपड़े भी प्रेस किए जाते हैं।

बिना मत्था टेके यहां से आगे नहीं बढ़ता कोई फौजी

- बताया जाता है कि शहीद जसवंत सिंह के मंदिर में बिना मत्था टेके कोई फौजी अफसर आगे नहीं बढ़ता। उनके नाम के आगे स्वर्गीय नहीं लगाया जाता और आज भी उनको प्रमोशन मिलते हैं।

आगे की स्लाइड्स में जानें कौन थे शहीद जसवंत सिंह रावत और कैसी थी उनकी वीर गाथा...

जसवंतगढ़ वॉर मेमोरियल में शहीद जसवंत सिंह रावत का कमरा। जसवंतगढ़ वॉर मेमोरियल में शहीद जसवंत सिंह रावत का कमरा।

17 की उम्र में पहुंचे थे सेना में भर्ती होने

 

- दरअसल, उत्तराखंड के पौड़ी-गढ़वाल जिले के बादयूं में 19 अगस्त 1941 को जसवंत सिंह रावत का जन्म हुआ था।

 

- उनके अंदर देशप्रेम इस कदर था कि वे 17 साल की उम्र में ही सेना में भर्ती होने चले गए, लेकिन उन्हें कम उम्र के कारण लिया नहीं गया।

Special Story on 1962 indo china war hero Rifleman Jaswant Singh Rawat

जब चीन ने किया था हमला

 

- हालांकि, वाजिब उम्र होने पर 19 अगस्त 1960 को जसवंत को सेना में राइफल मैन के पद पर शामिल कर लिया गया।

 

- 14 सितंबर 1961 को जसवंत की ट्रेनिंग पूरी हुई, उसी के बाद यानी 17 नवंबर 1962 को चीन की सेना ने अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के उद्देश्य से हमला कर दिया।

शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की राइफल शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की राइफल

3 सैनिक वापस नहीं लौटे

 

- इस दौरान सेना की एक बटालियन की एक कंपनी नूरानांग ब्रिज की सेफ्टी के लिए तैनात की गई, जिसमें जसवंत सिंह रावत भी शामिल थे।
 
- चीन की सेना हावी होती जा रही थी, इसलिए भारतीय सेना ने गढ़वाल यूनिट की चौथी बटालियन को वापस बुला लिया।

 

- मगर इसमें शामिल जसवंत सिंह, लांस नायक त्रिलोकी सिंह नेगी और गोपाल गुसाई नहीं लौटे। ये तीनों सैनिक एक बंकर से गोलीबारी कर रही चीनी मशीनगन को ध्वस्त करना चाहते थे।

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ऐसे दुश्मनों से छीनी थी मशीनगन

 

- तीनों जवान चट्टानों और झाड़ियों में छिपकर भारी गोलीबारी से बचते हुए चीनी सेना के बंकर के करीब जा पहुंचे और महज 15 यार्ड की दूरी से हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए दुश्मन सेना के कई सैनिकों को मारकर मशीनगन छीन लाए।

 

- इससे पूरी लड़ाई की दिशा ही बदल गई और चीन का अरुणाचल प्रदेश को जीतने का सपना पूरा नहीं हो सका।

 

- हालांकि, इस गोलीबारी में त्रिलोकी और गोपाल मारे गए। वहीं, जसवंत 72 घंटे तक अकेले लड़ते रहे और 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया। इसके बाद को दुश्मन सेना ने उन्हें घेर लिया और उनका सिर काटकर ले गए। इसके बाद 20 नवंबर 1962 को चीन ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी।

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आज भी रहती है जसवंत की आत्मा

 

- वहां रहने वाले जवानों और स्थानीय लोगों का मानना है कि जसवंत सिंह रावत की आत्मा आज भी भारत की पूर्वी सीमा की रक्षा कर रही है। जसवंतगढ़ वॉर मेमोरियल में उनका बड़ा स्मारक बनाया गया है। यहां शहीद के हर सामान को संभालकर रखा गया है।

 

- यही नहीं, रोज सुबह और रात की पहली थाली जसवंत की प्रतिमा के सामने परोसी जाती है।

 

- बताया जाता है कि सुबह-सुबह जब चादर और अन्य कपड़ों को देखा जाता है तो उनमें सिलवटें नजर आती हैं। वहीं, पॉलिश के बावजूद जूते बदरंग हो जाते हैं।

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आज भी मिलते हैं प्रमोशन और छुट्टियां

 

- जसवंत सिंह रावत भारतीय सेना के अकेले सैनिक हैं, जिन्हें मौत के बाद प्रमोशन मिलना शुरू हुआ था। पहले नायक फिर कैप्टन और अब वह मेजर जनरल के पद पर पहुंच चुके हैं।

 

- उनके परिवार वालों को पूरी सैलरी पहुंचाई जाती है।

 

- घर में शादी या धार्मिक कार्यक्रमों के अवसरों पर परिवार वालों को जब जरूरत होती है, तब उनकी तरफ से छुट्टी की एप्लिकेशन दी जाती है और मंजूरी मिलते ही सेना के जवान उनके तस्वीर को पूरे सैनिक सम्मान के साथ उनके उत्तराखंड के पुश्तैनी गांव ले जाते हैं।
 
- वहीं, छुट्टी समाप्त होते ही उस तस्वीर को ससम्मान वापस उसी स्थान पर ले जाया जाता है।

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जसवंतगढ़ वॉर मेमोरियल में शहीद जसवंत सिंह रावत का कमरा।जसवंतगढ़ वॉर मेमोरियल में शहीद जसवंत सिंह रावत का कमरा।
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शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की राइफलशहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की राइफल
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