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प्रॉपर्टी का ब्यौरा दे यूनिटेक, इन्हें नीलाम कर लोगाें का पैसा चुकाएंगे: सुप्रीम कोर्ट

9 हजार से ज्यादा फ्लैट खरीददारों के हक में सुप्रीम कोर्ट की कंपनी को कड़ी फटकार

Bhaskar News | Last Modified - Mar 13, 2018, 04:05 AM IST

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    नई दिल्ली. रीयल एस्टेट कंपनी यूनिटेक को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केस की सुनवाई के दौरान कहा कि यूनिटेक की गैर-विवादित सम्पत्ति की नीलामी का आदेश देंगे ताकि फ्लैट खरीदारों को पैसा वापस किया जा सके। चीफ जस्टिस दीपक कोर्ट के नेतृत्व वाली बेंच ने कहा कि यूनिटेक ने खरीदारों को धोखा दिया है। कोर्ट ने यूनिटेक को अपनी गैर-विवादित संपत्ति के साथ डायरेक्टर की निजी संपत्तियों की लिस्ट देने का आदेश दिया है।


    कोर्ट ने जेएम फाइनेंस लिमिटेड पर 25 लाख का जुर्माना भी लगाया है। जेएम फाइलेंस लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वो यूनिटेक का लोन चुकाएगा और लंबित प्रोजेक्ट को पूरा करेगा। सुप्रीम कोर्ट जल्द ही प्रॉपर्टी को बेचने को लेकर एक्सपर्ट नियुक्त कर सकता है।

    ऐसे बिगड़ी हालत

    - 2003 से 2008 के दौरान कंपनी हाई ग्रोथ पर थी, लेकि‍न 2जी मामले में नाम आने आैर मंदी के चलते कंपनी की हालत बिगड़ती चली गई।
    - 2008 के अंत में आई मंदी के चलते रि‍यल्टी डेवलपर्स को पैसे की कमी होने लगी। यूनि‍टेक फ्लैट खरीददारों को न तो घर दे सकी और न पैसा वापस किया।
    अधिग्रहण अधिसूचना निरस्त कर सरकार ने शक्ति का दुरुपयोग किया
    मानेसर जमीन घोटला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला आया है। सोमवार को इस मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने मानेसर के साथ ही नौरंगपुर और लखनौला में बिल्डरों को दिए गए लाइसेंस निरस्त कर दिए। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिसूचना निरस्त करके हरियाणा सरकार ने शक्ति का दुरुपयोग किया है। साथ ही, इससे बिल्डरों को लाभ भी पहुंचाया। सोमवार को आए शीर्ष कोर्ट के फैसले से लगभग 200 किसान परिवारों को मुआवजा मिलने का रास्ता साफ हुआ है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 27 अगस्त 2004 से लेकर 29 जनवरी 2010 के बीच खरीदी गई जमीन हरियाणा सरकार के हुडा और एचएसआईआईडीसी के अधीन रहेगी।
    इसलिए महत्वपूर्ण है मामला
    मामला इन गांवों की सैकड़ों एकड़ जमीन का है। तत्कालीन भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार ने दो बार भूमि अधिग्रहण की सूचना जारी की। दोनों बार अधिग्रहण के डर से किसानों ने बिल्डरों को औने-पौने भाव मे ज़मीन बेच दी। 2007 और 2010 में दोनों बार आखिरी मौके पर अधिग्रहण की प्रक्रिया रोक दी गई। इसकी जांच के लिए बनाए जस्टिस ढींगरा आयोग ने पिछले साल खट्टर सरकार को रिपोर्ट सौंपी, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। इस मामले में रॉबर्ट वाड्रा की लैंड डील की भी जांच की गई थी।
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