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समलैंगिकता अपराध है या नहीं, दोबारा विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिकता को अपराध माना जाए या नहीं? सुप्रीम कोर्ट इस पर एक बार फिर सुनवाई को तैयार हो गया है।

Bhaskar News | Last Modified - Jan 09, 2018, 04:53 AM IST

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    सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में समलैंगिकता को अपराध माना था।

    नई दिल्ली. समलैंगिकता को अपराध माना जाए या नहीं? सुप्रीम कोर्ट इस पर एक बार फिर सुनवाई को तैयार हो गया है। दो वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध नहीं मानने की मांग से जुड़ी पिटिशन कोर्ट ने संविधान पीठ को भेज दी है। केंद्र सरकार से भी रुख पूछा गया है।

    चीफ जस्टिस बोले- सामाजिक नैतिकता, कानून वक्त के साथ बदलते हैं, इन पर बहस जरूरी

    - 5 समलैंगिकों ने सुप्रीम कोर्ट से साल 2013 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी, जिसमें आईपीसी की धारा 377 की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी गई थी।

    इस धारा के तहत अप्राकृतिक संबंध अपराध हैं।

    - चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने सोमवार को कहा कि सामाजिक नैतिकता वक्त के साथ बदलती है। कानून भी वक्त के साथ बदलता है।’

    यह अधिकारों का हनन

    कोर्ट में कपिल सिब्बल और अरविंद दातार ने दलील दी कि संविधान के भाग-3 में नागरिकों को कई मूलभूत अधिकार मिले हैं। इनमें लैंगिक समानता और समानता के अधिकार शामिल हैं। धारा 377 इनका हनन करती है।

    ब्रिटेन में भी अब लागू नहीं

    समलैंगिकता अपराध है। इसके लिए 10 साल तक की सजा हो सकती है। इस कानून की प्रस्तावना 1860 में मैकाले की सिफारिशों पर तैयार हुई थी, जो आज धारा 377 के रूप में है। इंग्लैंड में यह कानून खत्म हो चुका है।

    हाईकोर्ट ने धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया था

    2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन टाइटल से दिए फैसले में हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए इसे अपराध करार दे दिया था।

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    5 समलैंगिकों ने सुप्रीम कोर्ट से साल 2013 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी।
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Web Title: Supreme Court Re Examine Lgbt Crime Or Not
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