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अमेरिका को मिल सकती है भारत की डिफेंस फैक्ट्रियों में एंट्री

मिलिट्री सूचनाओं की गोपनीयता के समझौते में संशोधन को लेकर अगले माह रक्षा मंत्रियों के बीच पहली बार होगी बातचीत

Danik Bhaskar

Mar 14, 2018, 03:07 AM IST
भारत सरकार ने संसद में लिखित रूप से बताया चल रही है वार्ता प्रक्रिया। - फाइल भारत सरकार ने संसद में लिखित रूप से बताया चल रही है वार्ता प्रक्रिया। - फाइल

नई दिल्ली. भारत के रक्षा प्रतिष्ठानों में आने वाले समय में अमेरिकी पहुंच हो सकती है। सरकार ने संसद में पहली बार लिखित रूप से बताया है कि दोनों देश इस बारे में बातचीत कर रहे हैं। हालांकि वार्ता प्रक्रिया पहले से चल रही है मगर अब यह मुद्दा अगले माह दोनों देशों के रक्षा एवं विदेश मंत्रियों के बीच पहले संयुक्त डायलॉग में टेबल पर होगा।


- रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका अपनी उन्नत टेक्नोलॉजी भारत को देने के लिए राजी है। मगर उसकी शर्त है कि टेक्नोलॉजी की सुरक्षा गारंटी के साथ वह खुद धरातल पर देखेगा कि टेक्नोलॉजी जिस मकसद के लिए आई थी उसका इस्तेमाल वैसे ही हो रहा है। अगले माह संयुक्त डायलॉग में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और अमेरिका की ओर से रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस एवं विदेश मंत्री रैक्स टिलरसन मौजूद होंगे। बातचीत की इस महत्वपूर्ण पहल को ‘2 प्लस 2 डायलॉग’ कहा जा रहा है।
- इस संबंध में पिछले हफ्ते बुधवार को रक्षा मंत्रालय ने लोकसभा को सूचित किया कि भारत और अमेरिका 2002 के मौजूदा समझौते में ‘इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी एनेक्स’ पर बातचीत कर रहे हैं जिससे दोनों देशों की कंपनियों के बीच टेक्नोलॉजी का अधिक साझा हो सकेगा और औद्योगिक साझेदारी बढे़गी।

क्या है ‘इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी एनेक्स’

- अमेरिका ने ऐसा समझौता इजरायल के साथ किया हुआ है। उसके अनुसार दोनों देश इस बात पर राजी हैं कि रक्षा प्रतिष्ठानों में एक-दूसरे के प्रतिनिधि जा सकेंगे। ये दौरे जीएसओएमआईए समझौते के तहत होंगे।

- वे एक-दूसरे को सरकारी प्रतिष्ठानों, एजेंसियों और प्रयोगशालाओं तथा अनुबंध में शामिल औद्योगिक सुविधाओं में आने देंगे। हालांकि इन दौरों के लिए दोनों पक्षों की पूर्व अनुमति लेनी होगी और सिक्योरिटी क्लियरेंस ली जाएगी।

2002 का समझौता अमेरिका के लिए नाकाफी

- जनवरी 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय ‘जनरल सिक्योरिटी मेजर्स फॉर प्रोटेक्शन ऑफ क्लासीफाइड मिलिट्री इन्फॉरमेशन’ (जीएसओएमआईए) समझौता किया गया था।

- इसके तहत दोनों देशों की रक्षा कंपनियों और सरकारों के बीच मिलिट्री सूचनाओं को गोपनीय रखने का क्लॉज था। मगर अब अमेरिकी सरकार अपनी टेक्नोलॉजी के प्रोटेक्शन के लिहाज से इसे नकाफी मानती है। वह इसमें संशोधन कर निगरानी की शर्त जोड़ना चाह रही है।

अमेरिकी बाजार में भारत की नजर

- दस साल में भारत का अमेरिका से डिफेंस इंपोर्ट 15 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। भारत अगले पांच साल में अपने रक्षा क्षेत्र पर 30 अरब डॉलर खर्च करेगा जिस पर अमेरिका की नजर है।

मिलिट्री सूचनाओं की गोपनीयता के समझौते में संशोधन को लेकर अगले माह रक्षा मंत्रियों के बीच पहली बार होगी बातचीत। - फाइल मिलिट्री सूचनाओं की गोपनीयता के समझौते में संशोधन को लेकर अगले माह रक्षा मंत्रियों के बीच पहली बार होगी बातचीत। - फाइल
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