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चुनाव-सूचना आयोग के आयुक्तों को रिटायरमेंट के बाद चाहिए बिल जमा करने के लिए कर्मचारी

एक ने प्रस्ताव पारित कर दिया है, दूसरा तैयारी में है। चुनाव आयोग ने 5 जुलाई 2017 को एक अधिसूचना जारी की है।

​अमित कुमार निरंजन | Last Modified - Dec 03, 2017, 05:01 AM IST

चुनाव-सूचना आयोग के आयुक्तों को रिटायरमेंट के बाद चाहिए बिल जमा करने के लिए कर्मचारी

नई दिल्ली.देश के बड़े-बड़े नेताओं पर लगाम लगाने वाले चुनाव आयोग और अहम जानकारियां देने वाले केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के कमिश्नर्स को रिटायरमेंट के बाद घरेलू कामों जैसे- सब्जी लाने और बिल जमा करने के लिए इम्पलॉई चाहिए। ईसी जुलाई में इस प्रपोजल को मंजूरी दे चुका है, वहीं सीआईसी के प्रपोजल पर विचार किया जा रहा है। सूत्र कहते हैं कि अब तो लाइन में लगने जैसे काम बचे भी नहीं है। सब्जी लाने से लेकर सभी तरह के बिल ऑनलाइन ही जमा हो जाते हैं।

कई जगह ऐसा ही VIP सिस्टम

- करीब एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपने लिए ऐसा ही एक प्रपोजल पास किया था। जिसमें कहा गया है कि रिटायर्ड जजों को एक सरकारी घरेलू सहायक मिलेगा। अगर, उनका निधन हो जाता है तो वही सुविधा जज की पत्नी को मिलने लगेगी। इसके लिए तर्क दिया गया था कि रिटायर्ड जज बिजली, पानी के बिल जमा करने के लिए लाइन में खड़ा हो तो अच्छा नहीं लगता।

- दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के लिए काफिले के लिए ट्रैफिक को रोकना। जबकि नियम में ऐसा है ही नहीं। कुछ वक्त पहले जम्मू के दीपक शर्मा ने सड़क पर वीवीआईपी के मूवमेंट से जुड़े मामले में आरटीआई लगाई। पता चला कि सिर्फ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और इनके बराबर के फॉरेन डिप्लोमैट्स ही VVIP कैटेगरी में आते हैं। इनके लिए ट्रैफिक इंतजाम प्रोटोकॉल के हिसाब से होता है। इसके अलावा किसी और के लिए ट्रैफिक नहीं रोका जा सकता है। बाद में दीपक ने इसकी शिकायत जम्मू-कश्मीर के मानवाधिकार आयोग से की थी।

VIP के सफर में ऐशोआराम के लिए लगाई जाती है सैलून

- इसी तरह सुभाषचन्द्र अग्रवाल ने आरटीआई के जरिए पता लगाया था कि वीआईपी के सफर में ऐशोआराम के लिए सैलून बोगी लगाई जाती है। इसमें अर्दली भी इन्हें दिया जाता है। इसमें लाखों का खर्च आ जाता है। अग्रवाल कहते हैं इस मामले को लेकर वे प्रधानमंत्री को भी लेटर लिख चुके हैं। हालांकि कुछ प्रोटोकॉल सुरक्षा के लिहाज से हैं, जो जरूरी हैं। लेकिन कुछ तो सिर्फ सुविधा के लिए हैं जिन्हें कई बार सुरक्षा के नाम पर लागू कर दिया जाता है।

हवाई जहाज में- सबसे आगे की सीट, ताकि बाद में चढ़ें, पहले उतरें

- जब कोई वीआईपी हवाई जहाज में सफर करता है तो उसके लिए हमेशा गेट के पास की सीट रखी जाती है। ताकि वीआईपी को सबसे बाद में जहाज में सवार होना पड़े। और सबसे पहले उतरने का मौका मिले। ताकि उन्हें दिक्कत न हो।
- जिस फ्लाइट से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सफर कर रहे होते हैं उसके टेकऑफ करने के पहले और बाद में आधे से पौन घंटे तक सिविल फ्लाइट्स का कोई मूवमेंट नहीं होता है। हालात के हिसाब से यह टाइम घटाया या बढ़ाया जा सकता है।
- मंत्रियों के लिए अलग से प्रोटाकॉल ऑफिसर की इंतजाम किया गया है, जो उनके ही मंत्रालय से जुड़ा रहता है। वह उनका बोर्डिंग टिकट कराने, समान को रखवाने से लेकर चेक करने तक का काम देखता है। यह सुविधा बड़े एयरपोर्ट पर दी जाती है।

एक्सपर्ट ने क्या कहा?

- संविधान के जानकार सुभा‌ष कश्यप कहते हैं कि किसी वीवीआईपी या वीआईपी की सुरक्षा से जुड़े प्रोटोकॉल नहीं बदल सकते, लेकिन उनकी सुविधा से जुड़े प्रोटोकॉल को जरूर बदला जाना चाहिए। इसके लिए पहल पदों पर बैठे लोगों को भी करनी चाहिए। आजादी के बाद प्रोटोकॉल में काफी परिवर्तन हुए हैं। इसमें प्रधानमंत्री, रा‌ष्ट्रपति और मंत्रियों के लिए अलग से प्रोटोकॉल बनाए गए। आजादी के ठीक बाद चर्चा शुरू हुई थी कि प्रोटोकॉल के मामले में प्रधानमंत्री और रा‌ष्ट्रपति में कौन बड़ा है। तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने खुद आगे आकर कहा था कि प्रोटोकॉल के मामले में राष्ट्रपति बड़ा है।

क्या कहते हैं नेता?

- पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल कहते हैं, प्रोटोकॉल के मामले में दो बातें है। एक है- सुरक्षा और दूसरी है- सुविधा। सुरक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए। लेकिन यह भी तय होना चाहिए कि सुविधा के लिए बनाया गया प्रोटोकॉल सुरक्षा का हवाला देकर लागू तो नहीं कर रहे हैं। अब जैसे ब्रिटेन में आमतौर पर वहां के मंत्री आम आदमी की तरह ट्रेन में सफर करते हैं। लेकिन यह सिस्टम अपने देश में क्यों तैयार नहीं हो पा रहा।

- पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद ने बताया कि वीवीआईपी अगर चाहे तो वह प्रोटोकॉल के कुछ नियम जनता की सुविधा को ध्यान में रखकर बदल सकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब किसी समारोह में जनता के बीच जाते थे तो उन्होंने एसपीजी कमांडो को कह रखा था जनता से मिलते समय से वे थोड़ी सी दूरी बनाकर रखें ताकि आम जनता आसानी से मिल पाए।

देश में 20 हजार से ज्यादा VIPs

- पूरे देश में कुल 20 हजार से ज्यादा वीआईपी हैं। जिनकी सुरक्षा का जिम्मा करीब 57 हजार पुलिसकर्मी संभाल रहे हैं। ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट से ये आंकड़े पता चले थे। वहीं एक अनुमान के मुताबिक, 650 भारतीयों की सुरक्षा के लिए सिर्फ एक पुलिसकर्मी है।

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