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घूस का मामला संस्थान को बदनाम करने के लिए दायर किया: जस्टिस अरुण मिश्रा

जजों के नाम पर घूस मांगने का मामला, सुनवाई होगी या नहीं, फैसला आज

Bhaskar News | Last Modified - Nov 14, 2017, 04:47 AM IST

  • घूस का मामला संस्थान को बदनाम करने के लिए दायर किया: जस्टिस अरुण मिश्रा
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    नई दिल्ली. जजों के नाम पर घूस मांगने के आरोपों की जांच एसआईटी से करवाने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई होगी या नहीं, इस पर तीन जजों की बेंच मंगलवार को फैसला सुनाएगी। कोर्ट यह भी तय करेगा कि चीफ जस्टिस (सीजेआई) दीपक मिश्रा पर लगाए आरोपों को लेकर याचिकाकर्ता पर अवमानना का केस बनता है या नहीं?
    सोमवार को फैसला सुरक्षित रखने से पहले जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि यह मामला संस्थान को बदनाम करने के लिए सोच-समझकर दायर किया गया है, क्योंकि सीजेआई भी संस्थान का ही हिस्सा हैं। जस्टिस आरके अग्रवाल, अरुण मिश्रा और एएम खानविलकर की बेंच ने 90 मिनट सुनवाई की। दोपहर साढ़े तीन बजे सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस अरुण मिश्रा ने याचिकाकर्ता से पूछा कि जब पहली याचिका जस्टिस एके सिकरी की कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई के लिए लिस्ट थी तो दूसरी याचिका दाखिल करने की जल्दी क्या थी?

    याचिकाकर्ता कामिनी जायसवाल की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इसमें प्रशासनिक या न्यायिक आदेश जारी नहीं किया जा सकता था। इसलिए जस्टिस जे चेलमेश्वर की बेंच के सामने मेंशन किया। उन्होंने उसी दिन सुनवाई कर बिल्कुल सही फैसला दिया था। उन्होंने कहा कि जस्टिस खानविलकर को यह केस नहीं सुनना चाहिए।

    मेडिकल कॉलेज से जुड़े जिस केस में जजों के नाम पर रिश्वत मांगी गई थी, उसे सुनने वाली बेंच में जस्टिस खानविलकर भी थे। हालांकि, उन्होंने सुनवाई से अलग होने से इनकार कर दिया।
    याचिकाकर्ता की तरफ से सीनियर एडवोकेट शांति भूषण ने कहा कि इस केस में जजों के नाम पर रिश्वत ली गई थी। संविधान के अनुच्छेद-144 के तहत सुप्रीम कोर्ट की किसी भी बेंच से जारी आदेश सीजेआई को भी मानना होता है। फैसले पर असहमति होने पर वह कोई अन्य आदेश जारी नहीं कर सकते।

    इसी दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील ने सीजेआई पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इन्हें देखते हुए अवमानना की कार्रवाई करनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि वकील कामिनी जायसवाल ने एक याचिका दाखिल कर पूरे मामले की जांच एसआईटी से करवाने की मांग की थी। जस्टिस जे चेलमेश्वर की बेंच ने यह केस संविधान पीठ को भेज दिया था। लेकिन सीजेआई की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने अगले ही दिन वह आदेश रद्द कर दिया था।
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