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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बोले- चीफ जस्टिस को संविधान ने दी है केस आवंटन की शक्ति

चीफ जस्टिस की शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई शुरू कर दी।

Bhaskar News | Last Modified - Apr 14, 2018, 08:56 AM IST

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    सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई की शक्तियों के खिलाफ पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने याचिका दायर की है।

    नई दिल्ली. जजों के बीच मुकदमों के आवंटन संबंधी चीफ जस्टिस की शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई शुरू कर दी। जस्टिस एके सिकरी और अशोक भूषण की बेंच ने कहा कि संविधान की रक्षा के लिए खुद संविधान ने सीजेआई को यह शक्ति दी हैं। इस पर याचिकाकर्ता शांति भूषण की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने कहा, "14 मामलों में चीफ जस्टिस के इस अधिकार का इस्तेमाल कई गंभीर सवाल खड़े करता है।"

    अगली सुनवाई 27 अप्रैल को
    - एडवोकेट दुष्यंत दवे ने कहा कि गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना की सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक के तौर पर नियुक्ति से जुड़ा केस पहले जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच के सामने सुनवाई के लिए अाया था। बाद में बेंच का हिस्सा रहे जस्टिस नवीन सिन्हा सुनवाई से हट गए। नियमानुसार यह मामला जस्टिस गोगोई की बेंच के सामने ही लिस्ट करना चाहिए था, लेकिन इसे कोर्ट नंबर आठ में भेजा गया।

    - इस पर बेंच ने कहा कि जब कोई जज सुनवाई से हटता है तो केस सीजेआई के समक्ष आता है। उन्होंने जजों के नाम पर घूस मांगने के आरोपों जस्टिस जे चेलमेश्वर की बेंच के आदेशों का भी जिक्र किया।

    - उन्होंने कहा कि सीजेआई उस वक्त संविधान पीठ में सुनवाई कर रहे थे। ऐसे में जस्टिस चेलमेश्वर का आदेश वैध था।

    - सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि सीजेआई मास्टर ऑफ रोस्टर है और पहले भी कई फैसलों में यह कहा जा चुका है।

    - इस मुद्दे पर बेंच ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से राय मांगी है। अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।

    शक्तियां कॉलेजियम को देने का सुझाव खारिज
    - मुकदमे आवंटित करने की शक्तियां कॉलेजियम को सौंपने के सुझाव से सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्ट्या असहमति जताई।

    - कोर्ट ने कहा कि कॉलेजियम में पांच सबसे सीनियर जज होते हैं। ऐसे में उन्हें रोज या हफ्ते में दो-तीन दिन सिर्फ मुकदमे आवंटित करने के लिए ही बैठना पड़ेगा। यह संभव नहीं है। - जस्टिस सिकरी ने याचिकाकर्ता के वकील से कुछ और सुझाव मांगे। इस पर दुष्यंत दवे ने कहा कि कम से कम संवेदनशील मामले तो कॉलेजियम के ही जरिए देने चाहिए। लोकतंत्र में संपूर्ण अधिकार जैसी कोई चीज नहीं होती। राष्ट्र और लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए कई मामले संवेदनशील होते हैं।

    प्रधानमंत्री ने भी कभी नहीं कहा कि वह संपूर्ण शक्ति हैं
    - दवे ने कहा कि संविधान में सीजेआई की शक्तियों की बात कही गई है, लेकिन उन्हें एक व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को नियमों का पालन करना चाहिए। कल को प्रधानमंत्री भी कह देंगे कि मैं देश का शासक हूं और मुझे कोई चुनौती नहीं दे सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कभी यह नहीं कहा है कि वह देश की संपूर्ण शक्ति हैं। अगर वह ऐसा कहते हैं और कुछ ऐसा प्रचलन में आता है तो उस पर कोर्ट में सवाल उठाया जा सकता है।

    पूर्व सीजेआई बालाकृष्णन बोले- न्यायिक आदेश ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे लोगों के बीच हिंसा हो
    एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अब पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन ने सवाल उठाए हैं। जस्टिस बालाकृष्णन ने कहा है कि एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मूलरूप से गलत था। उन्होंने कहा कि न्यायिक आदेश ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे लोगों के बीच हिंसा हो। 14 जनवरी 2007 से 12 मई 2010 तक देश के चीफ जस्टिस रहे बालाकृष्णन ने एक कार्यक्रम में कहा, 'संभवत: पहली बार सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को लेकर लोगों में हिंसा भड़की है। सामान्यत: जब हिंसा होती है, तब सुप्रीम कोर्ट दखल देता है। लोग आदेश को मंजूर करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस तरह से फैसले देने चाहिए, जो अधिकांश लोगों को स्वीकार्य हो। यह समाज में हिंसा उकसाने वाला नहीं होना चाहिए।'

    पूर्व सीजेआई बालाकृष्णन बोले- सुप्रीम कोर्ट का फैसला मूलरूप से गलत

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    जजों के बीच मुकदमों के आवंटन संबंधी चीफ जस्टिस की शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू कर दी। (फाइल)
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