चंडीगढ़ समाचार

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डेरा सच्चा सौदा में तो मेरा माइक ही छीन लिया था, कंवर ग्रेवाल ने की ये बातें

कुर्ता पजामा,एक चादर,और पांव में चप्पल। यही है कंवर ग्रेवाल की स्टाइल स्टेटमेंट जो उन्हें सारी चकाचौंध मंे अलग बनाती है।

Dainik Bhaskar

Nov 18, 2017, 04:21 AM IST
kambal greawal talks about dera sachcha souda

चंडीगढ़. दरगाह हो या डेरा या फिर कोई दूसरी गैदरिंग। कंवर ग्रेवाल हमेशा सादे लिबास में सादगी भरे अंदाज में गाते हैं। तब इनका गायन सत्संग बन जाता है और सामने बैठे लोग भूल जाते हैं कि उन्हें घर लौटना भी है। न सिर्फ पंजाब बल्कि विदेशों में रहने वाले पंजाबी भी इनकी सादगी के कायल हैं। यही वजह है कि गैर पंजाबी राज्यों में भी इनके चाहने वालों की कमी नहीं है। अपने इस स्टाइल के बारे में वे कहते हैं-मैं सादा बंदा हूं।

कॉलेज के जमाने से ही इसी तरह रहा। अब काम करता हूं तो भी मेरा रहन-सहन ज्यादा नहीं बदला। मेरा एक ही उसूल है कि किसी शो या किसी और काम के लिए कुटिया से निकलकर गाड़ी में बैठता हूं तो आंख और कान खुले रखता हूं और अपनी जुबान का सोच-समझकर इस्तेमाल करता हूं। अपने काम पर पूरा ध्यान देता हूं। बाकी बातों के बारे में नहीं सोचता।


कंवर ने एक बार कहा था कि उनके जीवन का मकसद गाना नहीं, कुछ और है। उसके बाद से कंवर लगातार स्टेज पर परफॉर्म कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने फोक व वेस्टर्न इंस्ट्रूमेंट्स के साथ 27 मिनट के पांच गीतों का एपिसोड रिकॉर्ड किया है। बॉलीवुड फिल्मों में भी इनके गीत आ रहे हैं। अब उनसे उनका मकसद पूछा गया तो वे बोले-मेरे जैसा कोई


बंदा रब को पाने निकला और अपने उस्ताद से
बोला कि मैं सब कुछ छोड़कर चौकड़ी मारकर बंदगी करना चाहता हूं। उस्ताद ने कहा चौकड़ी मारकर बंदगी नहीं होती। बंदगी तो जिंदगी को काम करते हुए गुजारने से होती है। तो बस मैं भी उसी राह पर हूं।

मुझे डेरा बुलाए या कोई और मैं गाने जरूर जाऊंगा
इसी साल अगस्त में संत बाबा राम रहीम के जन्मदिन पर कंवर डेरा सच्चा सौदा सिरसा में परफॉर्म करने गए। इन्होंने वहां वाहेगुरु और मियां मीर का नाम लिया। फिर संगत को भी वाहेगुरु कहने को कहा। इससे राम रहीम को गुस्सा आ गया और डेरा प्रशासन ने कंवर से माइक ले लिया। शो दो घंटे के लिए बुक हुआ था और 15 मिनट में ही बंद हो गया। तीन साल पहले नकोदर मेले में हुई कन्ट्रोवर्सी के बाद उन्हें वहां दोबारा परफॉर्मेंस के लिए नहीं बुलाया गया। इस पर कंवर बोले- धार्मिक जगहों पर गाना सबसे मुश्किल है। एक बार नहीं, मेरे सामने से 5-6 बार माइक छीना जा चुका है। उन्होंने कहा कि कोई भी डेरा या संगत मेरे बारे में क्या सोचती है। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां जाकर मैं क्या कर रहा हूं, मेरे लिए यही मायने रखता है। इसलिए आज भी नकोदर डेरा या डेरा सच्चा मुझे बुलाएगा तो मैं जरूर जाऊंगा।

दान करना यानी अपनी ही ईगो को चारा डालना है
मैंने हर धार्मिक जगह पर जाकर महसूस किया है कि दान-वान कुछ नहीं होता। अपनी वाह-वाही करने के लिए लोग दान करते हैं। दान करना अपनी ईगो को चारा डालना है। अजीब है इस दिखावे को कुबूल भी करते हैं लोग। देखा जाए तो दान हमेशा गुप्त ही होता है।

कमाना चाहता हूं ताकि साथ वालों की जिम्मेदारी उठा सकूं
मेरे साथ मां-बाप, बीवी, बेटी और जितने भी म्यूजिशियंस शुरुआत से जुड़े हैं मुझे उन सबके लिए काम करना है। मेरे साथ तूंबी बजाने वाले बाबा तुरिया 60 से अधिक की उम्र के हैं। वह कब तक काम करेंगे। इसलिए मैं चाहता हूं कि इतना तो कमा लूं कि जो मेरे साथ काम करने वाले लोग हैं, उन्हें 15 से 20 हजार पेंशन के तौर पर दे सकूं जब उनके पास कोई काम न हो।

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