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चीफ जस्टिस ने विवेकानंद का जिक्र किया, बोले- जीवन दिव्य ज्योति, उसका सम्मान हो

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने इच्छा मृत्यु पर फैसला सुनाते समय कई दार्शनिक बातें कीं

Dainik Bhaskar

Mar 10, 2018, 06:43 AM IST
मुंबई की दंपती मांग रही इच्छा मृत्यु मुंबई की दंपती मांग रही इच्छा मृत्यु

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने गंभीर रूप से बीमार मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथनेशिया) के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को कानूनी मान्यता दे दी है। कोर्ट ने कहा कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले। कोर्ट ने कहा कि लोगों को सम्मान से मरने का पूरा हक है। संविधान पीठ ने इसमें सुरक्षा उपायों के लिए गाइडलाइन भी जारी की है। कोर्ट ने कहा कि ये गाइडलान तब तक जारी रहेंगी, जब तक कानून नहीं आता। फैसला सुनाते वक्त 5 सदस्यीय बेंच ने कई दार्शनिक बातें भी कीं। इसमें स्वामी विवेकानंद के कथनों के साथ ही मशहूर कवियों की कविताओं का भी जिक्र किया गया।

- चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने स्वामी विवेकानंद की उक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन एक ज्योति की तरह है। इस दिव्य ज्योति का सम्मान होना चाहिए।

- बेंच ने कहा- स्वाभिमान के साथ जीना हमारे जीवन जीने के अधिकार का अभिन्न अंग है। जीवन और मृत्यु को अलग नहीं किया जा सकता। हर क्षण हमारे शरीर में बदलाव होता है। बदलाव एक नियम है। मृत्यु जीने की प्रक्रिया का ही हिस्सा है।

क्या है इच्छा मृत्यु
इच्छा मृत्यु यानी यूथनेशिया। यह ग्रीक शब्द है। यूथनेशिया, इच्छा-मृत्यु या मर्सी किलिंग(दया मृत्यु) पर दुनियाभर में लंबे समय से बहस चल रही है। कई देशों में इसे इजाजत देने की मांग बढ़ी है। इस मुद्दे में कानूनी, मेडिकल और सामाजिक पहलू भी जुड़े हुए हैं। मेडिकल साइंस में इच्छा-मृत्यु कई तरीके से होती है।

इच्छा मृत्यु के 5 तरीके

वॉलंटरी एक्टिव यूथनेशिया: मरीज की मंजूरी के बाद जानबूझकर ऐसी दवाइयां देना, जिससे उसकी मौत हो जाए। यह केवल नीदरलैंड और बेल्जियम में वैध है।
इनवॉलंटरी एक्टिव यूथनेशिया : मरीज खुद अपनी मौत की मंजूरी देने में असमर्थ हो, तब उसे मारने के लिए जानबूझकर दवाइयां देना। यह दुनिया में गैरकानूनी है।
पैसिव यूथनेिशया: मरीज की मृत्यु के लिए इलाज बंद करना या जीवनरक्षक प्रणालियों को हटाना। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने इसी का अधिकार दिया है।
एक्टिव यूथनेिशया : ऐसी दवा देना, ताकी मरीज को राहत मिले। पर बाद में मौत हो जाए। यह कुछ देशों में वैध है।
असिस्टेड सुसाइड: सहमति के आधार पर डॉक्टर मरीज को ऐसी दवा देते हैं, जिन्हें खाकर आत्महत्या की जा सकती है।

इन देशों में है अधिकार
स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड्स, लक्समबर्ग, अलबानिया, कोलंबिया, जर्मनी, जापान, कनाडा, बेल्जियम, ब्रिटेन, आयरलैंड, चीन, न्यूजीलैंड, इटली, स्पेन, डेनमार्क, फ्रांस, रोमानिया, फिनलैंड में इच्छा मृत्यु का अधिकार है। इसके अलावा अमेरिका के 7 और ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य में भी इसका कानून है। कई देशों में मामला कोर्ट में चल रहा है।

मुंबई की दंपती मांग रही इच्छा मृत्यु

मुंबई की 86 साल के नारायण लवाते और 78 साल की इरावती लावते पति-पत्नी हैंं। इस दंपती ने कुछ समय पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिख कर इच्छा मृत्यु की मांग की थी। पर राष्ट्रपति ने कोई जवाब नहीं दिया। नारायण और इरावती रिटायर्ड कर्मचारी हैं। दंपती ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कहा था कि हम निःसंतान हैं, किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित भी नहीं हैं। वे अपनी देखभाल करने में भी सक्षम नहीं हैं। अब दंपती ने खुदकुशी की योजना बनाई है। इरावती ने पति से कहा है कि वो उन्हें 31 मार्च के बाद गला दबाकर मुक्त कर दें।

जनहित याचिका पर 13 साल बाद आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला

11 मई, 2005: एनजीओ कॉमन कॉज ने गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को इच्छा मुत्यु का अधिकार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कहा- गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को ‘लिविंग विल’ बनाने का हक मिलना चाहिए।

16 जनवरी, 2006: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली मेडिकल काउंसिल को केस में शामिल किया। साथ ही पैसिव यूथनेशिया पर डॉक्यूमेंट्स उपलब्ध कराने को कहा।

31 जनवरी: 2007: सुप्रीम कोर्ट केस में शामिल सभी पक्षों से डॉक्यूमेंट्स जमा करने का कहा।

7 मार्च 2011: सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के हॉस्पिटल में कोमा में जी रहीं अरुणा शानबाग की ओर से दायर याचिका स्वीकार की। जर्नलिस्ट पिंकी वीरानी याचिका पर कोर्ट ने कहा कि परिवार की इजाजत पर ही अरुणा को इच्छा मृत्यु दी जा सकती है।

13 जनवरी 2014: चीफ जस्टिस पी सदाशिवम के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की।
फरवरी, 2015: सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथनेशिया यानी इच्छा मृत्यु की याचिका को संविधान पीठ में भेजा।

15 फरवरी 2016: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह मामले में विचार कर रहा है।
11 अक्टूबर 2017: चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की 5 सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा।

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बात, 27 नवंबर 1973 की है। अरुणा शानबाग मुंबई के केईएम अस्पताल में नर्स थीं। सोहनलाल वहां एक वार्ड ब्वॉय था। 23 साल की अरुणा डयूटी खत्म कर चेंजिंग रूम में गई थीं। यहां सोहन ने अरुणा को दबोच लिया। कुत्ते के गले की चेन से करुणा का गला दबाकर दुष्कर्म की कोशिश की। इससे अरुणा के दिमाग की नसें फट गईं। इसके बाद अरुणा कोमा में चलीं गईं। उनकी आंखों की रोशनी चली गई, शरीर को लकवा मार गया, अरुणा बोल भी नहीं पा रही थीं। वक्त बीतने के साथ दोस्त, परिवार सबने उसे छोड़ दिया। आरोपी सोहन को 7 साल की सजा मिली। जर्नलिस्ट पिंकी विरानी द्वारा 2011 में अरुणा के लिए की गई इच्छा मृत्यु की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दी थी।

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अमेरिकी महिला टेरी शियावो दुनिया भर में कई साल तक चर्चा में रहीं। फ्लोरिडा की रहने वाली टेरी 1990 में अपने घर में हार्ट फेल होने की वजह से गिरीं और हमेशा के लिए कोमा में चली गईं। दस साल ऐसे ही रहने के बाद उसके पति ने डॉक्टरों से कहा कि वे टेरी का लाइफ सपोर्ट निकाल दें। इसका टेरी के परिवार वालों ने विरोध किया। टेरी के शरीर में डॉक्टरों को हरकत दिखाई दे रही थी। देश में बहस छिड़ी कि यदि लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा दिया जाएगा तो इच्छा मृत्यु को मान्यता मिल जाएगी। टेरी का मामला अमेरिकी संसद कांग्रेस तक गया, जहां इस पर कई दिनों तक बहस हुई। कोई फैसला लिया जाता, उसके पहले ही 18 मार्च 2005 को टेरी की मौत हो गई।

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