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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पीड़ित के लिए मुआवजा खैरात नहीं बल्कि उसका अधिकार

सड़क दुर्घटना में हाथ गंवाने वाले का मुआवजा दोगुना किया, सड़क हादसों पर सुप्रीम कोर्ट ने दी अहम व्यवस्था

पवन कुमार | Last Modified - Mar 09, 2018, 05:18 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पीड़ित के लिए मुआवजा खैरात नहीं बल्कि उसका अधिकार
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    ‘हाथ नहीं तो कुछ भी नहीं, यह सौ फीसदी विकलांगता’: जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

    नई दिल्ली.सड़क दुर्घटनाओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति के हाथ उसकी कमाई का अहम जरिया हैं। हाथ नहीं तो कुछ भी नहीं। ऐसी विकलांगता को कुछ प्रतिशत में नहीं नापा जाना चाहिए। यह शरीर में कुछ फीसदी विकलांगता नहीं बल्कि सौ फीसदी विकलांगता है।पीड़ित को उसी के अनुसार मुआवजा भी मिलना चाहिए।

    कोर्ट सड़क दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गंवाने वाले व्यक्ति जगदीश की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने अपने आदेश में निचली अदालत द्वारा दी गई मुआवजा राशि 12 लाख 81 हजार 228 को बढ़ाकर 25 लाख 38 हजार 308 रुपए कर दिया। कोर्ट ने यह राशि पीड़ित को 9 प्रतिशत ब्याज के साथ छह हफ्ते में देने का आदेश दिया।

    जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि सड़क दुर्घटना मामले में इंसाफ करते समय अक्सर निचली अदालतों का फैसला कानून के तहत पात्रता अनुसार होता है। हमारा कानून के प्रति यह निष्कर्ष मानव प्रतिष्ठा के लिए आंतरिक रूप से लागू होने वाले योग्य अधिकारों के दावे की ओर होना चाहिए।

    सवाल... क्या हाथ लौटाए जा सकते हैं?

    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि क्या हाथ लौटाए जा सकते हैं? इस बात की कल्पना करना कठिन नहीं है कि बिना हाथ के किसी का जीवन कैसा होगा? बिना हाथ के व्यक्ति न तो कमा सकता है। बिना किसी की मदद के शौचालय तक नहीं जा सकता। किसी व्यक्ति के हाथ ही उसकी कमाई और रोजमर्रा के काम करने का जरिया होते हैं। हाथ नहीं तो कुछ भी नहीं।

    नसीहत... न्यायिक संस्था पर सवाल न उठें

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुआवजा तय करते समय कोर्ट के फैसले में यह झलकना चाहिए कि पीड़ित व्यक्ति के वजूद की मर्यादा को बहाल करने का ठोस कानूनी प्रयास किया गया है। मुआवजा तय करने के मानक इतने भी छोटे न हों कि न्यायिक संस्था पर सवाल उठने लगे कि कानून इंसानी जीवन की कद्र करता है या नहीं? अगर कानून कद्र करता है तो हादसे से हुई हानि और सदमे का मुआवजा व्यवहारिक हो।

    यह था पूरा मामला

    24 वर्षीय जगदीश अपनी मोटरसाइकिल से 24 नवंबर 2011 को कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे एक डम्पर ने टक्कर मार दी। इस हादसे में उसके दोनों हाथ हमेशा के लिए खराब हो गए। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने उसकी विकलांगता को 90 प्रतिशत आंकते हुए उसे 12 लाख 81 हजार 228 रुपए मुआवजा दिए जाने के आदेश दिए। इस आदेश को चुनौती देने पर हाईकोर्ट ने मुआवजा राशि की रकम 2 लाख 19 हजार रुपए बढ़ा दी थी। इसके बाद हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग की गई थी।

    बढ़ रही हादसों में विकलांग होने की दर

    - 65% बढ़ी 1990 के मुकाबले 2016 में सड़क हादसों में विकलांग होने की दर

    - 25% बढ़ोतरी एक साल में ऐसे हादसों की हो गई जिनमें पीडि़त विकलांग हो गए

    - 55 सड़क दुर्घटनाएं हुईं हर घंटे में औसतन 2016 में

    - 4.81 लाख सड़क हादसे हुए देश में वर्ष 2016 में

    ‘हाथ नहीं तो कुछ भी नहीं, यह सौ फीसदी विकलांगता’

    अदालतों को सड़क दुर्घटना मामलों में फैसला देते समय ध्यान रखना चाहिए कि मुआवजा पाना पीड़ित के लिए कोई खैरात नहीं है, बल्कि उनका कानूनी अधिकार है।
    - जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

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    कोर्ट ने कहा- सड़क हादसों पर सुप्रीम कोर्ट ने दी अहम व्यवस्था। - फाइल
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Web Title: Sc Says Compensation For The Victim Is Not Bailout But Its Right
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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