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लड़के से लड़की बनने चुकाई ये कीमत, किसी को छोड़नी पड़ी MNC की जॉब किसी को घर

ये ट्रांसजेंडर्स पैदा तो पुरुष की तरह हुए, लेकिन उन्होंने गर्व के साथ महिला होना स्वीकार किया।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 09, 2018, 01:41 AM IST

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    सिमरन।

    नई दिल्ली. हमारे देश में आज भी बेटा पैदा होने पर कहीं मिठाइयां बांटी जाती हैं तो कहीं ढोल बजते हैं लेकिन स्त्री होने का सुख इन सबकी परवाह नहीं करता। इसलिए तो कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस स्त्री होने के सुख को पाने के लिए दुनिया और समाज से भिड़ जाते हैं। इंटरनेशनल वुमन डे पर भास्कर बता रहे हैं उन ट्रांसजेंडर्स की जो पैदा पुरुष की तरह हुए, लेकिन उन्होंने गर्व के साथ महिला होना स्वीकार किया। भास्कर ने जब इन लोगों से बातकर उनके मन को टटोला तो अनोखी दास्तान की परतें खुलती चली गईं।

    लड़की बनने के बाद तो सड़क पर चलने में सोचना पड़ता है

    तिलक नगर में रहने वाली सिमरन जब लड़का थीं तब गूगल में काम करती थीं, लेकिन उनका लड़की बनने का फैसला ऐसा रहा कि उन्हें जॉब छोड़ना पड़ा। बाद में मेकअप आर्टिस्ट के तौर पर खुद को जमाया। वह उन लोगों की काउंसलिंग भी करती हैं जो पुरुष से महिला बनने हैं। कहती हैं, बराबरी तो दूर की बात है। लड़की बनने के बाद तो सड़क पर चलने में भी सौ बार सोचना पड़ता है। क्योंकि इस देश मेंं तो सड़कें भी पुरुषों की हैं। असल में पुरुषवाद का यह चेहरा ही मुझे पुरुष बनने से रोकता रहा। आज मैं सोचती हूं कि आखिर मैंने कैसे 30 बरस तक एक पुरुष बन कर जिया। मुझे पहले ही महिला बन जाना चाहिए था। बड़ी नौकरी जरूर छूटी, लेकिन उसके बदले मिला सुख ज्यादा बड़ा था।

    आगे की स्लाइड्स में पढ़ें, ऐसी ही कुछ और सच्ची कहानियां...

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    कियारा नारायण अय्यर।

    भारत आकर शुरू हुईंपरेशानियां

    मालवीय नगर में रहने वाली कियारा मैनचेस्टर, इंग्लैंड से एमबीए हैं। उन्होंने 10वीं में यह फैसला लिया कि अब वह लड़का बनकर नहीं जी सकते। वह अपने भीतर की औरत को और ज्यादा दिन कैद नहीं रख सकती थीं। पुरुष से महिला बनने का ऑपरेशन करवाने और ग्रेजुएशन के दौरान तो वह विदेश में थीं, लेकिन भारत आकर उनकी परेशानियां शुरू हुईं। वह बताती हैं, लड़की होने के बाद हर कदम मुश्किल था। बावजूद इसके महिला हाेना मुझे सुख देता है। कम से कम अपनी भावनाओं की आजादी तो मिल गई। पुरुषों पर भावनाओं को लेकर एक अजीब बंदिश है। एक लड़का होकर किसी के सामने आंख में आंसू लाना भी गलत लगता था। आइ लव टू बी ए वुमन।

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    रुद्राणी।

    शर्म तो लड़का होने पर आती थी

    विकास पुरी में रहने वाली रुद्राणी की कहानी संघर्षों की एक लंबी दास्तां है। उन्होंने महिला होने के लिए बहुत कुछ सहा है, लेकिन आज उन्हें अपने फैसले पर पर बहुत फख्र है। वह कहतीं हैं, मैंने दोनों जीवन जीकर देख लिए हैं। मैं 28 साल तक लड़का थी, लेकिन इस समाज में महिलाओं के साथ जैसा व्यवहार होता है उसे देखकर लड़का होने में शर्म महसूस आती थी। मैं बचपन से ही लड़की का मन लेकर पैदा हुई। लेकिन जब मैंने समाज की दशा देखी तो लगा कि लड़की होना ही इंसान होना है। आज मुझे इस बात पर फख्र है कि मैं उस तबके में नहीं जो जुल्म और बंदिशें आमादा करने के लिए जाना जाता है। बल्कि मैं खुद को संसार के सबसे जहीन जेंडर का हिस्सा मानती हूं।

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    पारो।

    लड़कियों की तरह जीना पसंद था तो गांव भी छोड़ना पड़ा

    20-25 साल पहले पारो असम से दिल्ली आईं थीं। 45 साल की पारो असम के छोटे से गांव में रहती थीं। वहां एक लड़के की तरह पैदा होने के बाद उनका लड़कियों की तरह रहना किसी को नहीं सुहाया था। वह बताती हैं, उस समय तो लड़की पैदा होते ही मार दी जाती थी। बेटा होने के कारण बहुत मान मिलता था। मैंने जैसे ही बताया कि मुझे लड़कियों की तरह जीना पसंद है तो घर ही नहीं गांव भी छोड़ना पड़ा था। इस लिहाज से आज का समय फिर भी कम मुश्किलों से भरा है। कोई कुछ भी कहे, महिलाओं पर चाहें जितनी बंदिशें लगाए लेकिन मैं हर बार लड़की ही बनकर जन्म लेना चाहती हूं। जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ा उसने कई चीजें सामान्य तरीके से लेना शुरू किया। हालांकि ट्रांस्जेंडर को लेकर नजरिए में अब भी सुधार की गुंजाइश है।

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    - सिम्बॉलिक

    जिंदगी का सुख तो लड़की और महिला बनने में ही

    नीतू जनकपुरी में रहने वाली नीतू अपनी दोनों जिंदगियों में से लड़की होने को जिंदगी का बेहतरीन वक्त और फैसला मानती हैं। नीतू भावुक होकर कहती हैं, इस देश में आज कितनी भी बातें कर ली जाएं। लाखों योजनाएं चलाई जाएं। लेकिन किसी को भी बेटी नहीं चाहिए। दरअसल नीतू एक पुलिस ऑफिसर का बेटा थीं और जब उन्होंने खुद के लड़की होने की बात को सबके सामने रखा तो घर में आफत आ गई। कोई भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं था कि मन्नतों से मांगा बेटा अब बेटी बनने पर आमादा है। वह अपनी कहानी बताती हैं, मैं हमेशा एक बेटे की तरह पाली गई। मुझे लड़कों वाले खिलौने ही खेलने के लिए दिए जाते थे लेकिन मैं खुद को बेटा मानने को तैयार नहीं थी। मैं खेल-खेल में अपनी मां की साड़ी पहन लेती थी। मेरी इस बात पर हमेशा डांट पड़ती थी। हर बंदिश के बाद भी पहले के नीतेश अब नीतू बनकर बेहद खुश हैं। उनका मानना है कि उनकी जिंदगी का सुख तो लड़की और महिला बनने में ही है। वह कहती हैं कि अब मैं जो हूं वह महसूस करती हूं न कि वह महसूस करती हूं जो मुझ पर थोपा गया था। नीतू इन दिनों मेकअप आर्टिस्ट का कोर्स कर रही हैं और बालीवुड में जाना चाहती हैं।

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Web Title: Transgenders Struggle Stories On International Women Day
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