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देश में जेनेिरक दवा की परिभाषा ही तय नहीं, विदेशों में जो जेनेरिक वो हमारे यहां नहीं

देश में दवाओं की उपलब्धता, गुणवत्ता, बाजार, व्यापार और कीमतों को लेकर कई समस्याएं हैं।

​पवन कुमार | Last Modified - Nov 26, 2017, 07:45 AM IST

  • देश में जेनेिरक दवा की परिभाषा ही तय नहीं, विदेशों में जो जेनेरिक वो हमारे यहां नहीं
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    नई दिल्ली.बार-बार देश में जेनेिरक दवा की चर्चा होती है। प्रधानमंत्री भी चिकित्सकों से जेनेरिक दवा लिखने की अपील कर चुके हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत सरकार की ओर से तैयार किए गए ड्रग्स कॉस्मेटिक्स एक्ट में जेनेरिक दवा की परिभाषा तक नहीं तय की गई है। भारत सरकार जेनेरिक दवा की दोहरी नीति रखती है। देश में जेनेरिक दवा कुछ और है और वैश्विक स्तर पर इसकी परिभाषा कुछ और है। इतना ही नहीं देश में दवाओं की उपलब्धता, गुणवत्ता, बाजार, व्यापार और कीमतों को लेकर कई समस्याएं हैं।

    देश में मार्च 2018 तक तीन हजार से अधिक जन औषधि केन्द्र बनाए जाने का लक्ष्य है। जहां से ये दवाएं आम आदमी को मिल पाएंगी।इस क्षेत्र में पिछले चार दशक से काम कर रहे मंथली इंडेक्स ऑफ मेडिकल स्पेशलिटी के प्रमुख डॉ. सीएम गुलाटी ने बताया कि भारत में जेनेरिक का मतलब होता है- सिंगल साॅल्ट वाली जेनेरिक नाम से बिकने वाली दवा, जिसका कोई ब्रैंड नाम न हो। जबकि वैश्विक स्तर पर जेनेरिक का मतलब होता है- ऐसी दवा जिसका कोई पेटेंट न हो या जिस दवा की पेटेंट की अवधि खत्म हो चुकी हो। डॉ. गुलाटी ने कहा कि इन दवाआें को भारतीय जेनेरिक परिभाषा के अनुसार बेचा ही नहीं जा सकता। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रेसीडेंट डॉ. जयश्री मेहता इस मामले में कहती हैं कि देश में डॉक्टरों से कहा गया है कि जितना संभव हो दवा का जेनेरिक नाम लिखें। यदि कोई डॉक्टर दवा का जेनेरिक नाम नहीं लिखता है तो कानून के तहत डॉक्टरों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती है। जेनेरिक दवा सभी को उपलब्ध हो और दवा की कीमत तय हो तो यह काम स्वास्थ्य मंत्रालय और डिपार्टमेंट और फॉर्माकोलॉजी का है। केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्‌डा ने कहा कि सबको गुणवत्ता पूर्ण और सस्ती दवा मिले इसके लिए देशभर में जन औषधि केन्द्र खोले जा रहे हैं। मार्च-2018 तक देश में तीन हजार से ज्यादा जन औषधि केन्द्र होंगे। जन औषधि केन्द्र पर अधिक से अधिक दवा लोगों को मिल पाए इसके लिए काम कर रहे हैं। एम्स के फाॅर्माकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. वाई के गुप्ता के मुताबिक किसी भी दवा को लाइसेंस तभी मिलता है जब दवा की गुणवत्ता 95 फीसदी से ज्यादा हो चाहे वह जेनेरिक हो या ब्रैंड की।

    दोनों दवाओं पर लिखी होती है गलत एमआरपी
    डॉ. गुप्ता के मुताबिक दोनों तरह की दवाओं की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं होता। ब्रैंडेड जेनेरिक और ब्रैंडेड दवा पर जो एमआरपी लिखी होती है, उसका तरीका बिल्कुल गलत है। एमआरपी बहुत ज्यादा होती है उस पर अलग-अलग ग्राहक को अलग-अलग डिस्काउंट दिया जाता है। यह गलत है, इस पर अंकुश लगाना जरूरी है।

    भारत में दवा की सात दुकानें जिसमें से तीन लाख बिना लाइसेंस की चल रही हैं
    भारत में करीब सात लाख दवा की दुकानें हैं, जिसमें करीब तीन लाख दुकान बिना लाइसेंस के चल रहे हैं। देश में करीब साढ़े आठ हजार दवा कंपनियां हैं। दवा दुकान में बेची जा रही और कंपनियों में तैयार होने वाली दवाइयों की गुणवत्ता जांचने के लिए देश में महज पांच हजार ड्रग्स इंस्पेक्टर हैं। इन्हीं इंस्पेक्टर के जिम्मे दवा की क्वालिटी से लेकर दवा कंपनियों के इन्फ्रास्ट्रक्चर तक जांचने का जिम्मा है। सरकारी अस्पतालों में सप्लाई होने वाली करीब 10 फीसदी दवाओं की क्वालिटी खराब होती है। इसी वर्ष केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से कराए गए सर्वे में यह सामने आया। 654 जिलों से 47,954 ड्रग्स के नमूने लिए गए जिसमें यह सामने आया। ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन के सर्वे के अनुसार देश में सप्लाई होने वाली 4.5 फीसदी दवा की क्वालिटी खराब होती है।

    भारत में इस्तेमाल होने वाली दवा का 80 फीसदी रॉ मटेरियल चीन से आता है
    ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया डॉ.जीएन सिंह बताते हैं कि भारत में दो लाख 30 हजार करोड़ रुपए का दवा कारोबार है, जिसमें करीब एक लाख 20 हजार करोड़ की दवा की खपत देश में है। जबकि एक लाख 10 हजार करोड़ की दवा पश्चिमी और यूरोपियन देशों में सप्लाई की जाती है। यह सही है कि भारत में इस्तेमाल होने वाली दवा का 80 फीसदी रॉ मटेरियल चीन से भारत आता है। भारत में तैयार रॉ-मटेरियल की क्वालिटी ज्यादा अच्छी होती है। इसलिए थोड़ा मंहगा है, जबकि चीन से सस्ती दर पर रॉ-मटेरिलय उपलब्ध हो जाता है। प्रयास किया जा रहा है कि भारत में तैयार रॉ-मटेरियल एक तय हिस्सा भारत में दवा बनाने में इस्तेमाल हो। नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी के चेयरमैन भूपेन्द्र सिंह के अनुसार देश में जरूरी दवाओं की सूची में करीब 850 तरह की दवाएं हैं। यह सूची स्वास्थ्य मंत्रालय तैयार करता है और इसकी कीमत नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी तय करती है। बाकी दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं।


    जेनेरिक ब्रैंड और ब्रैंडेड दवा की कीमतों में 6 गुना का अंतर
    - जन औषधि केन्द्र पर उपलब्ध जेनेरिक दवा, इसके अलावा केमिस्ट शॉप पर बिकने वाली ब्रैंडेड जेनेरिक और ब्रैंडेड दवा की कीमतों और उसके सॉल्ट को समझने के लिए भास्कर ने कुछ दवाइयां खरीदीं इसके बाद उनकी दरों की समीक्षा की।
    - जन औषधि केन्द्र में एजिथ्रोमाइसिन-500 एमजी की एक गोली की कीमत चार रुपए है जबकि यही दवा ब्रैंडेड जेनेरिक खरीदी गई तब एक गोली कीमत (एमआरपी) 19 रुपए रही। कोई दुकानदान एमआरपी पर पांच फीसदी तो कोई दुकानदार 25 फीसदी की छूट देता है, जबकि यही दवा ब्रैंडेड ली जाए तो एक गोली की कीमत 19 रुपए है लेकिन एमआरपी पर कोई छूट नहीं मिली।
    - पैंटाप्राजोल के 10 टैबलेट के लिए जन औषधि केन्द्र में 20 रुपए लिए गए। यही दवा किसी कंपनी की जेनेरिक लेने पर 10 टैबलेट के लिए अंकित मूल्य 100 रुपए है। लेकिन इस पर उपभोक्ता को पांच से 40 फीसदी तक की छूट मिल जाती है। यही दवा ब्रैंडेड लेने पर 10 टैबलेट के लिए 103 रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

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