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बैंक ने एफडी गुमा दी और मान भी नहीं रहा था, ग्राहक ने ढाई साल लड़ा मुकदमा और पाया हक

2 वर्ष पहले
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यूटिलिटी डेस्क. प्रदीप गुप्ता मध्यप्रदेश में शाजापुर ज़िले के शुजालपुर में रहते हैं और निजी व्यवसाय करते हैं। एसबीआई ने उनकी एफडी गुमा दी थी और रकम भी नहीं लौटा रहा था। ढाई साल तक बैंक का चक्कर काटने और शिकायतों के बावजूद कुछ नहीं हुआ तो वह उपभोक्ता फोरम पहुंचे। यहां उन्हें जीत मिली और उनका पूरा हक भी। बैंक पर जुर्माना भी लगा। उन्होंने खुद बताई बैंक के साथ संघर्ष की कहानी।

1) प्रदीप की कहानी उन्हीं की जुबानी

मैंने स्टेट बैंक ऑफ इंदौर (विलय के बाद अब एसबीआई) की भोपाल में होशंगाबाद रोड पर स्थित शाखा में 11 फरवरी वर्ष 2000 को 72 महीने के लिए 17 हजार रुपए की फिक्स्ड डिपॉजट (एफडी) करवाई थी। इसमें यह लिखा गया था कि इसकी मियाद पूरी होने पर अगर ग्राहक इसे कैश नहीं करवाता है या नहीं लेने आता है तो बैंक अपने आप इसका अगली मियाद के लिए नवीनीकरण (रिन्यू) कर देगा।

मैं भी बीच-बीच में इसे रिन्यू करवाता रहा। इसी दौरान मैं 29 जुलाई 2015 को एफडी की मियाद पूरी होने पर राशि लेने बैंक पहुंचा। वहां एफडी के पूरे दस्तावेज़ भी दिखाए, लेकिन बैंक ने कहा कि इस बैंक के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) में विलय होने की वजह से पूरा रिकॉर्ड कम्प्यूटर पर डाला जा रहा है। इसमें वक्त लगेगा इसलिए एक महीने बाद आना।

इसके लिए मुझे बार-बार शुजालपुर से करीब 100 किलोमीटर का सफर कर भोपाल आना पड़ता था। ऐसा करते-करते 6 महीने बीत गए। इस बीच एफडी का स्वतः नवीणीकरण हो जाना चाहिए था, लेकिन बैंक ने वह भी नहीं किया।

मैं बैंक की बताई तारीख पर फिर से एफडी लेकर पहुंचा तो इस बार उन्होंने रकम देना तो दूर, इस बात से ही इनकार कर दिया कि मेरे नाम की कोई एफडी भी है। मैंने अपने पास रखी ओरिजिनल एफडी भी दिखाई, लेकिन वे नहीं माने। उन्होंने कम्प्यूटर पर भी रिकॉर्ड दर्ज नहीं किया था, इसलिए उस पर नहीं दिखा रहा था।

इससे परेशान होकर मैंने लिखित शिकायत की। इसके बाद वे मुझे बैंक की अलग-अलग ब्रांच के चक्कर कटवाते रहे। इसमें दो साल बीत गए लेकिन न तो एफडी का पता चला और न ही मेरे अकाउंट का।

आखिरकार परेशान होकर मैंने जिला उपभोक्ता फोरम भोपाल में शिकायत दर्ज करवा दी। इसमें भी 6 महीने बीत गए। आखिरकार ढाई साल लंबी लड़ाई के बाद बैंक ने गलती मानी और मेरी राशि और अधिकार देना पड़ा।

प्रदीप गुप्ता के वकील संदीप गुरु बताते हैं कि उपभोक्ता फोरम में आवेदन और मामला पेश होने के बाद भी मामला आसान नहीं रहा। पूरे दस्तावेज़ पेश करने के बावजूद बैंक सही जानकारी देने से बचता रहा। जबकि पहले बैंक कर्मचारी ने फोन कर प्रदीप गुप्ता से ओरिजनल एफडी और अन्य जानकारी मांगी थी।

जब वे दस्तावेज़ लेकर बैंक पहुंचे तो बैंक पलट गया। हमने उपभोक्ता फोरम में लड़ाई लड़ी और बैंक की गलती पकड़ी गई। गुप्ता को एफडी की पूरी रकम ब्याज सहित वापस करने के आदेश दिए। साथ ही गुप्ता को हुई परेशानी के लिए पांच हजार रुपए मुआवजा भी देना पड़ा

यदि आपको बैंक से संबंधित इस तरह की कोई समस्या होती है तो आप पहले ब्रांच में संपर्क करें। इसके बाद भी यदि शिकायत न सुनी जाए तो बैंक लोकपाल के पास शिकायत कर सकते हैं। हर राज्य में बैंक लोकपाल होते हैं।

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