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#Metoo / क्या सिर्फ सोशल मीडिया पर आरोप लगाने से कोई आरोपी हो जाता है? जानें ऐसे ही कुछ अहम सवालों के जबाव



law related to metoo campaign expert opinion
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law related to metoo campaign expert opinion

Dainik Bhaskar

Oct 15, 2018, 06:18 PM IST

यूटिलिटी डेस्क. यूटिलिटी डेस्क. एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता द्वारा एक्टर नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने के बाद भारत में भी #MeToo कैम्पेन शुरू हो गया। अमेरिका में साल 2006 से शुरू हुए इस कैम्पेन के तहत मामले भारत में भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या अपने साथ हुई छेड़छाड़ की घटना को सिर्फ सोशल मीडिया पर शेयर कर देने भर से किसी के खिलाफ कोई केस बनता है या ऐसे मामलों में सजा का क्या प्रावधान है? क्राइम लॉ एक्सपर्ट्स एडवोकेट हरीश मेहता, प्रमोद सक्सेना, पल्लवी शुक्ला और शुभांक दीक्षित से जानिए #MeToo से जुड़े सवालों के जवाब।

#Metoo से जुड़े कुछ अहम सवालों का कानूनी पक्ष

  1. सवाल: क्या सिर्फ किसी के कह देने मात्र से कोई आरोपी हो जाता है?
    जवाब: कोई भी व्यक्ति किसी के विरुद्ध कोई भी आरोप लगा सकता है। लेकिन सिर्फ उसके कह देने मात्र से कोई आरोपी नहीं होता। इसके लिए आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करानी होती है। महिलाओं के लिए हमारे देश में कई फोरम हैं, जहां वे रिपोर्ट दर्ज करा सकती है। रिपोर्ट के बाद जांच में जब अपराध पाया जाएगा तब उसके बारे में बात होगी।

  2. सवाल: हमारे देश में #MeToo कैम्पेन का इम्पैक्ट किस तरह पड़ रहा है?
    जवाब: #MeToo का मतलब है शिकार मैं भी। हम ऐसा नहीं कह सकते हैं कि भारत में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित हैं। उनकी कुछ चुनौतियां, मजबूरियां और सामाजिक कारण होते हैं, जिसके कारण वे रिपोर्ट नहीं दर्ज करवा पती हैं। यह कैम्पेन उन महिलाओं की आवाज के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। उत्पीड़न की शिकार महिलाएं आगे आ रही हैं और शिकायत दर्ज करवा रही हैं।

  3. सवाल: सोशल मीडिया में किसी के खिलाफ आरोप लगाने से क्या न्यायालय मामले को स्वत: संज्ञान में ले सकता है?

    जवाब: साल 2013 में प्रोटेक्शन ऑफ वूमेन एट वर्कप्लेस फ्रॉम सेक्सुअल हैरेसमेंट एक्ट बना था। इसके तहत अगर कोई सुपीरियर सेक्सुअल नेचर का फेवर मांगता है और ऐसा करने पर प्रमोशन का जबकि न करने पर नौकरी से निकाल देने की बात करता है तो वह आरोपी है। लेकिन इसकी इन्क्वायरी ऑफिस की इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी द्वारा होगी। सेक्सुअल हैरेसमेंट फंडामेंटल राइट्स और ह्यूमन डिग्निटी का उल्लंघन है। ऐसे में रिट कोर्ट्स के पास इनहरेंट पॉवर है कि वे संज्ञान में ले सकते हैं। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है।

  4. सवाल: क्या इतने पुराने मामलों में सुनवाई होती है?
    जवाब: हां, सुनवाई हो सकती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट जजमेंट्स हैं, जिनमें कहा गया है कि ऐसे मामले में कोर्ट सुनवाई कर सकता है। हालांकि, आरोप लगाने वाले को देरी से रिपोर्ट करने का पूरा कारण बताना होता है और इसका सबूत भी देना होता कि ऐसी कौन सी परिस्थितियां थीं, जिनके कारण रिपोर्ट फाइल करने में देरी हुई।

  5. सवाल: ऐसे मामलों में दोष साबित होने पर सजा का क्या प्रावधान है?
    जवाब: इस तरह के मामलों में इंटेंशन बहुत जरूरी है। आईपीसी की धारा 354 के सब सेक्शन्स के तहत इंटेंशनली किए गए अपराध की अलग-अलग सजा हैं। किसी मामले में 6 माह की सजा है तो किसी में 2 साल तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन कितनी सजा मिलेगी ये दाखिल की गई रिपोर्ट पर डिपेंड करता है।

  6. सवाल: कई महिलाओं की शिकायत है कि जब वे रिपोर्ट दर्ज कराने गईं तो उनकी रिपोर्ट नहीं दर्ज की गई है। क्या ऐसे मामलों में रिपोर्ट न दर्ज करने वाले पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई हो सकती है?
    जवाब: जरूर हो सकती है। रिपोर्ट न दर्ज किए जाने पर वे सीनियर अधिकारियों के पास जाकर शिकायत कर सकती हैं। इसके बावजूद अगर सुनवाई नहीं हो रही है या मामले को आगे नहीं बढ़ाया जाता है तो सोशल मीडिया पर बात रखने से पुलिस वालों पर दबाव बनता है। मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में आने पर दोषी पुलिस वालों के खिलाफ इन्क्वायरी बैठेगी।

  7. सवाल: कई मामलों में झूठे आरोप लगाकर ब्लैकमेल किया जाता है। ऐसे में जब कोई किसी को ब्लैकमेल करता है तो वह क्या कर सकता है?
    जवाब: आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत अघर कोई इंटेंशनली किसी के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाता है तो पीड़ित व्यक्ति उस पर डिफामेशन (मानहानि) का केस दर्ज कराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में आरोप लगाने वाले को साबित करना होता है कि उसका इंटेंशन सामने वाले के सम्मान को ठेस पहुंचाना नहीं था। इसके अलावा सीआरपीसी की धारा 468 में प्रावधान है कि 3 साल से कम की सजा वाले मामले में 3 साल बाद शिकायत करने पर कोई भी क्रिमिनल कोर्ट कॉग्निजेंस नहीं ले सकती है।

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