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  • The Most Reliable Was Remdesivir, The Most Disappointing Hydroxychloroquine; Here Are The 19 Most Talked About Drugs And Treatments

महामारी में सबसे चर्चित दवाओं की कहानी:रेमेडेसिविर सबसे भरोसेमंद दवा, सबसे खराब हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्वीन; 19 ड्रग्स और ट्रीटमेंट के नतीजों से जानिए- कौन कारगर और कौन फेल

3 महीने पहले
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  • कोरोना से बचने के लिए डिसइंफेक्टेंट का यूज नहीं करें, यूवी किरणों से कैंसर का खतरा
  • प्रोन पोजिशनिंग में मरीज को पेट के बल लेटने को कहा जाता है, जिससे फेफड़े खुलते हैं

जोनाथन कोरम/कैथरीन जे वू/कार्ल जिमर. मॉडर्न मेडिसिन के सामने कोरोना से बड़ा संकट पहले कभी नहीं आया। दुनियाभर के डॉक्टर और वैज्ञानिक लगातार वैक्सीन की खोज में लगे हैं। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर तय समय में कोरोनावायरस की वैक्सीन तैयार हो जाती है तो यह इतिहास का सबसे तेज वैक्सीन प्रोग्राम होगा। आमतौर पर वैक्सीन बनाने में 10 साल तक लग जाते हैं।

कोरोना के इलाज में कुछ दवाओं के अच्छे रिजल्ट मिले। कुछ ऐसी दवाएं भी हैं, जिन्होंने काफी सुर्खियां बटोरीं। हालांकि अमेरिकी हेल्थ एजेंसी एफडीए ने किसी भी ट्रीटमेंट को लाइसेंस नहीं दिया है, सिर्फ इमरजेंसी यूज की परमिशन दी है। 

कोरोनो महामारी में सबसे चर्चित ड्रग्स और ट्रीटमेंट के नतीजे-

रेमेडेसिविर

  • इस दवा को गिलियड साइंसेज ने तैयार किया था। यह पहली ड्रग थी, जिसे एफडीए ने कोरोना के मामलों में इमरजेंसी यूज की परमिशन दी थी। यह जीन में जाकर वायरस को रेप्लिकेट करने से रोकता है। रेमेडेसिविर को इबोला और हेपेटाइटिस-सी के खिलाफ एंटीवायरल के तौर पर टेस्ट किया गया था।
  • ट्रायल से मिले शुरुआती डेटा बताते हैं कि ये ड्रग कोरोना के गंभीर मरीजों के हॉस्पिटलाइजेशन के समय को 15 दिन से घटाकर 11 दिन कर सकती है। मौत के मामलों में शुरुआती नतीजे असरदार नहीं रहे, लेकिन जुलाई में जारी हुए रिजल्ट संकेत देते हैं कि ये ड्रग गंभीर मरीजों में डेथ रेट भी कम कर सकता है।

डेक्सामैथासोन

  • सस्ती और आसानी से मिलने वाली ये ड्रग कई तरह के इम्यून रिस्पॉन्स को कमजोर कर देती है। डॉक्टर काफी समय से इसका यूज अस्थमा, एलर्जी और सूजन के इलाज के लिए करते हैं। जून में यह कोरोना से डेथ रेट कम करने वाली पहली दवा बन गई।
  • 6000 से ज्यादा लोगों पर की गई स्टडी में सामने आया कि डेक्सामैथासोन ने वेंटिलेटर वाले मरीजों में डेथ रेट एक तिहाई कम हो गई। अभी तक यह स्टडी किसी साइंटिफिक जर्नल में पब्लिश नहीं हुई है।
  • हो सकता है कि यह दवा उन मरीजों की मदद कम करे जो कोरोना संक्रमण के शुरुआती दौर में हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ ने कोरोना ट्रीटमेंट गाइडलाइंस में डेक्सामैथासोन के यूज की सलाह सिर्फ ऑक्सीजन और वेंटीलेटर सपोर्ट वाले मरीजों को दी है।

ये ट्रीटमेंट्स सबसे ज्यादा किए जा रहे
प्रोन पोजिशनिंग

  • इसमें मरीज को पेट के बल लेटने को कहा जाता है, जिससे उनके फेफड़े खुलते हैं। ये तरीका मरीजों में वेंटीलेटर की जरूरत को खत्म कर सकता है। फिलहाल क्लीनिकल ट्रायल्स में इलाज के फायदों की जांच की जा रही है।

वेंटिलेटर्स और रेस्पिरेटरी सपोर्ट डिवाइसेज

  • जो डिवाइस मरीजों को सांस लेने में मदद करती हैं, उन्हें सीरियस रेस्पिरेटरी डिजीज के खिलाफ अहम माना जाता है। नाक या मास्क के जरिए ऑक्सीजन देने पर भी कुछ मरीजों की हालत में सुधार देखा गया। वेंटिलेटर सांस लेने में मुश्किलों का सामना कर रहे मरीजों के फेफड़े ठीक होने तक मदद करता है।

वे ट्रीटमेंट जिनके सबूत अनिश्चित और मिले-जुले रहे-
फेविपिराविर

  • इंफ्लूएंजा के खिलाफ तैयार की गई फेविपिराविर वायरस को जेनेटिक मटेरियल रेप्लिकेट करने से रोकती है। मार्च में हुई एक स्टडी से संकेत मिलते हैं ये ड्रग हवा से कोरोनावायरस निकालने में मददगार हो सकती है, लेकिन अभी भी बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स अटके हुए हैं।

ईआईडीडी-2801

  • फ्लू के इलाज के लिए तैयार की गई ईआईडीडी-2801 ने सेल्स और जानवरों पर हुए कोरोनावायरस स्टडीज में अच्छे रिजल्ट दिए हैं। इसकी टेस्टिंग इंसानों पर होना बाकी है।

रीकॉम्बिनेंट ऐस-2 

  • सेल के अंदर जाने के लिए कोरोनावायरस को पहले उन्हें अनलॉक करना होगा। साइंटिस्ट्स ने आर्टिफिशियल ऐस-2 प्रोटीन तैयार किया है। यह खतरे वाले सेल्स से कोरोनावायरस को दूर रखेगा। रीकॉम्बिनेंट ऐस-2 प्रोटीन ने सेल्स पर हुए प्रयोग में भरोसेमंद रिजल्ट दिए हैं। 

कॉन्वालैसेंट प्लाज्मा

  • एक सदी पहले डॉक्टर फ्लू से ठीक हुए मरीज के खून से प्लाज्मा निकालते थे। इस कॉन्वालैसेंट प्लाज्मा में एंटीबॉडीज होती थीं, जो मरीजों की मदद करती थी। रिसर्चर इस तरीके को अब कोरोना के मरीजों पर भी अपनाकर देख रहे हैं। कॉन्वालैसेंट प्लाज्मा के शुरुआती रिजल्ट भरोसेमंद रहे हैं। एफडीए ने भी कोरोनावायरस के गंभीर मरीजों के लिए इसे यूज करने की परमिशन दे दी है।

मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज

  • कॉन्वालैसेंट प्लाज्मा में कई तरह की एंटीबॉडीज होती हैं। इनमें से कुछ कोरोनावायरस पर अटैक कर सकती हैं, कुछ नहीं। रिसर्चर घोल के जरिए कोरोना के खिलाफ सबसे कारगर एंटीबॉडीज की जांच कर रहे हैं।
  • इन मॉलिक्यूल्स की सिंथेटिक कॉपीज को मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज कहा जाता है। इन्हें बड़े पैमाने पर तैयार किया जा सकता है और मरीजों को इंजेक्शन लगाया जा सकता है। इस ट्रीटमेंट के लिए सेफ्टी ट्रायल्स अभी शुरू हुए हैं। 

इंटरफैरॉन्स

  • इंटरफैरॉन्स आमतौर पर मॉलिक्यूल्स होते हैं, जिन्हें हमारे सेल्स वायरस के जवाब में बनाते हैं। सिंथेटिक इंटरफैरॉन्स इम्यून डिसॉर्डर का इलाज है। शुरुआती स्टडीज बताती हैं कि इंटरफैरॉन्स इंजेक्ट करना कोरोना के खिलाफ मददगार हो सकता है। कुछ और सबूत भी हैं, जो बताते हैं कि मॉलिक्यूल्स स्वस्थ व्यक्ति को संक्रमित होने से बचा सकते हैं।

साइटोकीन्स इन्हिबिटर्स

  • रिसर्चर्स ने कई ड्रग्स तैयार किए हैं जो साइटोकाइन तूफानों को रोक सकते हैं। ये ड्रग्स ऑर्थराइटिस और दूसरे इनफ्लेमेट्री डिसॉर्डर में असरदार रहे हैं। कोरोनावायरस के खिलाफ इनमें से कई ड्रग्स कुछ ट्रायल्स में मददगार साबित हुए हैं, लेकिन कुछ में कमजोर रहे हैं।

साइटोसॉर्ब

  • साइटोसॉर्ब एक इक्विपमेंट है जो खून से साइटोकाइन्स को फिल्टर करता है। साइटोकाइन्स बीमारियों से लड़ने के लिए जरूरी है, यह कभी-कभी रनअवे रिस्पॉन्स को बढ़ावा देता है। शरीर में इतनी जलन होती है कि यह खुद को नुकसान पहुंचा लेता है। अतिरिक्त साइटोकाइन्स को हटाकर साइटोसॉर्ब इसे शांत कर सकता है।
  • यह मशीन 24 घंटे में इंसान के खून को 70 से ज्यादा बार साफ कर सकती है। यूरोप और चीन में बेहतर परिणाम के बाद एफडीए ने इसके इमरजेंसी यूज की परमिशन दे दी थी। 

स्टेम सेल्स

  • कुछ तरह के स्टेम सेल्स सूजन विरोधी मॉलिक्यूल्स छोड़ सकती हैं। पिछले कुछ सालों में शोधकर्ताओं ने इन्हें साइटोकाइन्स स्टॉर्म के इलाज में इस्तेमाल किया है। अब कोरोना के खिलाफ असर के लिए इसके क्लीनिकल ट्रायल्स जारी हैं। हालांकि पहले स्टेम सेल्स के इलाजों से बेहतर परिणाम नहीं मिले हैं। यह साफ नहीं कि यह कोरोनावायरस के खिलाफ काम करेंगे।

एंटीकोएग्युलेंट्स

  • कोरोनावायरस ब्लड वेसल्स की लाइनिंग में जा सकता है। इससे छोटे थक्के बनते हैं, जो स्ट्रोक या कोई गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इन थक्कों को एंटीकोएग्युलेंट्स से हटाया जा रहा है। इसका उपयोग पहले भी दिल के मरीजों पर किया जाता रहा है। कोरोना के मामले में इस दवा के कई क्लीनिकल ट्रायल्स जारी हैं।

वे ट्रीटमेंट्स जो बिल्कुल भरोसेमंद नहीं रहे-
लोपिनावीर और रिटोनावीर

  • 20 साल पहले एफडीए ने इस जोड़ी को एचआईवी के ट्रीटमेंट के लिए परमिशन दी थी। हाल ही में शोधकर्ताओं ने इनका उपयोग कोरोनावायरस के मरीजों पर किया। उन्होंने पाया कि इससे वायरस रेप्लिकेट होना रुक गया। हालांकि कुछ क्लीनिकल ट्रायल्स के रिजल्ट अच्छे नहीं रहे।
  • जुलाई की शुरुआत में ही डब्ल्यूएचओ ने अस्पताल में भर्ती कोरोना के मरीजों में इसके ट्रायल्स बंद कर दिए थे।

हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्वीन और क्लोरोक्वीन

  • जर्मन केमिस्ट ने 1930 में मलेरिया की दवा के तौर पर क्लोरोक्वीन सिंथेसाइज की थी। इसके बाद इसका कम टॉक्सिक वर्जन हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्वीन 1946 में तैयार हुआ। बाद में यह दवा ल्यूपस और रिह्युमैटॉयड ऑर्थराइटिस जैसी बीमारियों में भी इस्तेमाल की जाने लगी। कोरोना महामारी की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने पाया कि दोनों ड्रग्स कोरोना को सेल की नकल बनाने से रोक रहे हैं।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का जमकर प्रचार किया। एफडीए ने भी अस्थाई तौर पर इसके इमरजेंसी यूज की इजाजत दे दी। बाद में यह दावा किया गया कि यह राजनीतिक दबाव में आकर ऐसा किया गया था।
  • जब क्लीनिकल ट्रायल्स के डेटा सामने आए तो पता चला कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना के मरीजों और स्वस्थ लोगों के लिए मददगार नहीं है। एक बड़ी स्टडी में यह भी बताया गया कि इस दवा के नुकसान हैं। हालांकि बाद में स्टडी वापस ले ली गई थी।
  • डब्ल्यूएचओ, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ और नोवार्टिस ने इसके ट्रायल्स बंद कर दिए हैं। अब एफडीए चेतावनी दे रहा है कि इस ड्रग से दिल और दूसरे अंगों में गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं।

वे ट्रीटमेंट्स जो फर्जी नुस्खे और दावों वाले रहे- 
ब्लीच और डिसइंफेक्टेंट्स को पीना या इंजेक्ट करना

  • अप्रैल में राष्ट्रपति ट्रम्प ने सलाह दी थी कि अल्कोहल या ब्लीच जैसे डिसइंफेक्टेंट्स इंजेक्ट करने से मदद मिल सकती है। ट्रम्प के इस बयान का खंडन दुनियाभर के हेल्थ प्रोफेशनल्स और रिसर्चर ने किया। उनके मुताबिक डिसइंफेक्ट को इंजेस्ट करना खतरनाक हो सकता है।

यूवी लाइट

  • रिसर्चर यूवी लाइट का यूह सतहों को साफ करने और वायरस मारने के लिए करते हैं। यूवी लाइट किसी बीमार के शरीर से वायरस को नहीं निकाल पाएगी। इस तरह का रेडिएशन स्किन को नुकसान पहुंचा सकता है। ज्यादातर स्किन कैंसर के केस सूरज की रोशनी में मौजूद यूवी किरणों के संपर्क में आने की वजह से ही होते हैं।

चांदी

  • एफडीए ने उन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है, जो ये दावा कर रहे हैं कि चांदी के प्रोडक्ट कोरोना के खिलाफ असरदार होते हैं। कई धातुओं में नेचुरल एंटीमाइक्रोबायल प्रॉपर्टीज होती हैं, लेकिन कोरोनावायरस के मामले में कोई भी रिजल्ट सामने नहीं आया है।

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