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पर्सनल फाइनेंस:हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेते समय बीमा कंपनी के अस्पतालों के नेटवर्क का रखें ध्यान, इससे मिलेगा सही इलाज

नई दिल्ली2 महीने पहले
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  • नेटवर्क अस्पताल अस्पतालों का एक समूह हैं जो आपको अपनी वर्तमान हेल्थ प्लान को भुनाने की अनुमति देता है
  • भारत में चिकित्सा महंगाई (मेडिकल इंफ्लेशन) की सालाना दर करीब 17% है

देश में कोरोना महामारी का कहर जारी है। ऐसे में लोग सही उपचार और वित्तीय सुरक्षा के लिए हेल्थ इंश्योरेंस ले रहे हैं। अगर आपने अभी तक कोई इंश्योरेंस प्लान नहीं लिया है और आप इन दिनों कोरोना या अन्य बीमारियों के इलाज को कवर करने के लिए हेल्थ इंश्योरेंस प्लान लेने का विचार कर रहे हैं, तो हेल्थ इंश्योरेंस लेने से पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस कंपनी से आप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रहे हैं उसका अस्पतालों का नेटवर्क (नेटवर्क अस्पताल) सही हो।

क्या है नेटवर्क अस्पताल?
नेटवर्क अस्पताल अस्पतालों का एक समूह है जो आपको अपनी वर्तमान हेल्थ प्लान को भुनाने की अनुमति देता है। हमेशा उसी प्लान के लिए जाएं जो आपके क्षेत्र में अधिकतम नेटवर्क हॉस्पिटल प्रदान करता हो अन्यथा आपका निवेश आपात स्थिति के समय में काम में नहीं आएगा।

क्यों जरूरी है अच्छा अस्पतालों का नेटवर्क होना?

अगर आप किसी ऐसी इंश्योरेंस कम्पनी से पॉलिसी ले रहे हैं जिसके अस्पतालों का नेटवर्क अच्छा नहीं है या जिसमें शहर के अच्छे हॉस्पिटल शामिल न हों, तो हो सकता है कि आपको सही समय पर सही इलाह न मिल पाए। इसके अलावा अस्पतालों के नेटवर्क में अच्छे हॉस्पिटल शामिल न होने पर हो सकता है आपको सही या बेहतर इलाज न मिल पाए इसके अलावा बड़े हॉस्पिटल में सभी सुविधाएं जैसे सभी टेस्ट और ICU जैसी कई सुविधाएं रहती हैं इससे आपको बाहर से कोई टेस्ट नहीं कराने पड़ते हैं। इससे आपका पैसा बच जाता है और काम भी जल्दी होता है।

नेटवर्क अस्पतालों में कैशलैस क्लेम जरूरी
कैशलैस मेडिकल इंश्योरेंस उस प्रकार की पॉलिसी है जिसमें पॉलिसी होल्डर को इलाज के लिए नकद भुगतान नहीं करना होता है और बिलों का सेटलमेंट सीधे अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनी के बीच हो जाता है। इसके लिए, अगर अस्पताल में भर्ती पहले से तय है तो आमतौर पर कैशलैस हेल्थ इंश्योरेंस प्लान प्रदाता को 2 दिन पहले सूचित करना होता है, और एमरज़ेंसी की स्थिति में अस्पताल में भर्ती करने पर 24 घंटों के अंदर सूचित करना होता है।

बिलों का सेटलमेंट थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (TPA) के तहत हो जाता है और मेडीक्लेम कार्ड अस्पताल में सबमिट करना होता है। कैशलैस हेल्थ इंश्योरेंस के मामले में एक बात का ध्यान रखना होता है कि यह जरूरी है कि इलाज, मेडीक्लेम सेवा देने वाली कम्पनी के नेटवर्क अस्पतालों की लिस्ट में शामिल किसी अस्पताल में कराया जाए, नहीं तो राशि का रीइम्बर्समेंट बाद में तब होगा जब सारे बिल इंश्योरेंस प्रदाता के पास सबमिट कर दिए जाएंगे।

हेल्थ कवर में निवेश क्यों ?
कुछ अध्ययनों के अनुसार, भारत में चिकित्सा महंगाई (मेडिकल इंफ्लेशन) की सालाना दर करीब 17 फीसदी है। यह महंगाई के सामान्य स्तर से कहीं ज्यादा है। इस तरह पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस की जरूरत बढ़ जाती है। इसमें सही हेल्थ इंश्योरेंस प्लान को चुनना भी अहम है। किसी की सेहत आज अच्छी हो सकती है। लेकिन, हेल्थ इंश्योरेंस को केवल बीमारी और उसके उपचार से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। कोई नहीं जानता कब किस उम्र में किसी के साथ दुर्घटना हो जाए। उन स्थितियों में हेल्थ कवर मददगार साबित होता है। कम उम्र में पॉलिसी खरीदकर उसे बिना क्लेम के रिन्यू कराते रहने से कभी अचानक बीमारी आती है तो उसका सामना करने में मदद मिलती है।

क्या है थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर?
थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर बीमा देने वाली कंपनी और बीमा लेने वाले व्यक्ति के बीच एक मध्यस्थ के रूप में काम करता है। इसका मुख्य काम दावे और सेटलमेंट की प्रक्रिया में मदद करना है। टीपीए बीमा लेने वाले व्यक्ति को कार्ड जारी करता है, जिसे दिखाकर ही किसी अस्पताल में कैशलेस इलाज कराया जा सकता है। किसी दावे के वक्त बीमा लेने वाला व्यक्ति टीपीएस को ही पहले सूचना देता है। इसके बाद उसे संबंधित अस्पताल में जाने के लिए कहा जाता है। यह बीमा कंपनी के नेटवर्क का अस्पताल होता है। इसके अलावा अगर ग्राहक दूसरे अस्पताल में भी इलाज कराता है तो इसका खर्च उसे रीइम्बर्समेंट के जरिए मिल सकता है।

इन बातों का भी रखें ध्यान

पॉलिसी में क्या-क्या कवर होगा ये ठीक से समझ लें
बीमा कंपनियां कई तरह की बीमा पॉलिसियां ऑफर कर रहे हैं। हर बीमा कंपनी के अपने नियम होते हैं, उसी हिसाब से वे पॉलिसी बनाती हैं। हेल्थ पॉलिसी खरीदने से पहले यह समझ लें कि उसमें कितना और क्या-क्या कवर होगा। जिस पॉलिसी में ज्यादा से ज्यादा चीजें जैसे टेस्ट का खर्च और एम्बुलेंस का खर्च कवर हो उस पॉलिसी को लेना चाहिए। ताकि आपको जेब से पैसे खर्च न करने पड़ें।

पहले से मौजूद बीमारियां कवर हैं कि नहीं?
सभी हेल्थ इंश्योरेंस प्लान पहले से मौजूद बीमारियों को कवर करते हैं। लेकिन, इन्हें 48 महीने के बाद ही कवर किया जाता है। कुछ 36 महीने बाद इन्हें कवर करते हैं। हालांकि, पॉलिसी खरीदते वक्त ही पहले से मौजूद बीमारियों के बारे में बताना होता है। इससे क्लेम सेटेलमेंट में दिक्कत नहीं आती है।

को-पे को चुनना पड़ेगा जेब पर भारी
थोड़े पैसे बचाने और प्रीमियम को कम करने के लिए कई बार लोग को-पे की सुविधा ले लेते हैं। को-पे का मतलब होता है कि क्लेम की स्थिति में पॉलिसी धारक को खर्चों का कुछ फीसदी (उदाहरण के लिए 10 फीसदी) खुद भुगतान करना होगा। को-पे को चुनने से प्रीमियम में मिलने वाला डिस्काउंट बहुत ज्यादा नहीं होता। लेकिन आपके बीमार पड़ने पर ये आपकी जेब खाली करा सकता है।

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