हर जगह लगे प्लास्टिक बैरियर को देखकर अलर्ट हो जाएं:एंटी कोविड प्लास्टिक बैरियर कोरोना से बचाते नहीं, बल्कि स्थिति ज्यादा खराब कर सकते हैं, इससे वेंटिलेशन भी नहीं हो पाता है

4 महीने पहले

कोरोना महामारी फैलने के बाद कैब, ऑफिस, स्कूल या फिर शॉप पर आपने एक प्लास्टिक बैरियर लगा देखा होगा। इसे देखकर लोग इस बात की तसल्ली कर लेते हैं कि यह जगह उनके लिए सुरक्षित है, लेकिन ये बैरियर समस्या बढ़ा सकते हैं। ये बैरियर कोरोना से तो पूरी तरह सुरक्षा नहीं दिलाते हैं साथ ही इनकी वजह से वेंटिलेशन भी नहीं हो पाता है।

एयरोसोल, एयरफ्लो और वेंटिलेशन की स्टडी करने वाले साइंटिस्ट का कहना है कि ज्यादातर ये बैरियर कारगर नहीं होते। बल्कि स्थिति को और खराब कर सकते हैं। साइंटिस्ट का यह भी मानना है कि इससे लोगों को झूठी सुरक्षा का अहसास होता है।

प्लास्टिक बैरियर फ्रेश एयर को रोकता है
अलग-अलग स्टडी में पता चला है कि चेकआउट काउंटर के पीछे बैठे व्यक्ति को सुरक्षा देने वाले प्लास्टिक बैरियर से वायरस किसी अन्य कर्मचारी तक आसानी से पहुंच सकता है। क्योंकि ये बैरियर फ्रेश एयर के फ्लो को रोक देते हैं।

प्लास्टिक बैरियर जहां लगा हो वो एरिया ‘डेड जोन’ बन जाता है
साइंटिस्ट का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में बेहतर वेंटिलेशन वाले क्लासरूम, स्टोर और ऑफिस में सांस द्वारा छोड़े गए कण करीब 15-30 मिनट तक रहते हैं, उसके बाद फ्रेश एयर फ्लो के साथ बाहर निकल जाते हैं। लेकिन प्लास्टिक बैरियर से रूम में फ्रेश एयर फ्लो नहीं हो पाता इस वजह से वेंटिलेशन भी प्रभावित होता है। इससे वहां ‘डेड जोन’ बन जाते हैं, जिनमें ज्यादा प्रभावी वायरल एयरोसोल बन सकते हैं।

प्लास्टिक बैरियर से एरोसोल बाहर नहीं निकल पाते और संक्रमण फैलने लगता है
वर्जीनिया टेक में सिविल एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग की प्रोफेसर लिंसे मर्र कहते हैं कि अगर किसी क्लास रूम में प्लास्टिक के बैरियर ज्यादा हैं तो वहां का वेंटिलेशन प्रभावित होना तय है। इसकी वजह से वहां मौजूद लोगों के एरोसोल वहीं फंसे रहते हैं बाहर नहीं निकल पाते है। कुछ देर बाद ये एरोसोल वहां की सतह पर भी फैलने लगते हैं जिससे संक्रमण तेजी से फैलता है।

प्लास्टिक बैरियर खांसने व छींकने के दौरान निकले बड़े कण तो रोक सकते हैं, पर बातचीत में निकले कणों को फैलने से रोकने में सक्षम नहीं हैं। जबकि कोरोना तो अनदेखे एयरोसोल कणों से फैलता है, इसलिए शील्ड की उपयोगिता सवालों के घेरे में है।

प्लास्टिक बैरियर के बाद भी लोग वायरस के संपर्क में आ जाते हैं
लीड्स यूनिवर्सिटी में एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग एक्सपर्ट कैथरीन नोक्स कहती हैं, ‘छोटे एयरोसोल प्लास्टिक बैरियर पर ट्रैवल करते हैं और 5 मिनट में कमरे की हवा में मिल जाते हैं। यानी लोग कुछ देर तक बात करते हैं तो स्क्रीन के होते हुए भी वायरस के संपर्क में आ सकते हैं। वैसे भी शील्ड जिस तरह लगाई जाती हैं, उनसे बहुत फायदा मिलने की संभावना नहीं है।’

ऑफिस या स्कूल में बैरियर लगवाते वक्त एक्सपर्ट की सलाह जरूरी
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग एक्सपर्ट रिचर्ड कोर्सी कहते हैं कि क्लासरूम की हवा में एयरोसोल हैं, तो शील्ड नहीं बचा पाएगी। दरअसल ऑफिस, स्कूल और रेस्त्रां में प्लास्टिक बैरियर लगवाते वक्त इंजीनियरिंग एक्सपर्ट्स की मदद नहीं ली जाती। वे हर कमरे में एयरफ्लो और वेंटिलेशन के बारे में बता सकते हैं।

रूम में एयरफ्लो जटिल होता है, फर्नीचर व्यवस्था, छत की ऊंचाई, रोशनदान और शेल्फ जैसी चीजों का इस पर खासा प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन पारदर्शी शील्ड को पूरी सुरक्षा के रूप में नहीं देखना चाहिए। जोखिम कम करने के लिए मास्क पहनना जारी रखना चाहिए।

प्लास्टिक बैरियर बच्चों को संक्रमण से नहीं बचा सकते
रिचर्ड कोर्सी का कहना है कि अगर क्लास में चारों तरफ एरोसोल के पार्टिकल हैं तो ये प्लास्टिक बैरियर बच्चों को संक्रमण से नहीं बचा सकते हैं। हालांकि प्लास्टिक बैरियर देखकर लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन ये पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, इस बात का ध्यान रखना जरूरी है। इसलिए प्लास्टिक बैरियर लगे होने पर भी मास्क जरूर लगाएं।

एरोसोल साइंटिस्ट का मानना है कि वर्कप्लेस यानी ऑफिस या स्कूल में लोगों को जल्द से जल्द वैक्सीनेशन करवा लेने पर जोर देना चाहिए। इसके अलावा बेहतर वेंटिलेशन, HEPA एयर फिल्टरिंग मशीन और मास्क ही संक्रमण से बचने का बेहतर तरीका है।