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इन बीमारियों को भी जानिए:कोरोना से ठीक हुए लोगों और हाइपरटेंशन के मरीजों में ऑटोइम्यून डिसऑर्डर का खतरा ज्यादा, जानें क्या कहती है स्टडी?

4 महीने पहलेलेखक: डॉ. मिकेल ए सेकेर्स
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क्या कोरोना से ठीक हुए लोगों में ऑटोइम्यून डिसऑर्डर की समस्या हो सकती है? यह ऐसा सवाल है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर किया है। ऑटोइम्यून डिजीज, जैसे- रूमेटाइड, आर्थराइटिस या ल्यूपस तब होती हैं, जब इम्यून सिस्टम गलती से नॉर्मल बॉडी के टिश्यू पर अटैक करता है। आइए इसे 5 सवालों और उनके जवाबों से समझते हैं।

  • कोरोना से ठीक हुए मरीजों को क्यों ज्यादा खतरा है?

सवाल है कि कोरोना से ठीक हुए लोगों में इसका खतरा कितना है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कोरोना के कारण इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। शरीर इसे रिकवर करने के लिए इम्यून सेल्स डेवलप करता है। कभी-कभी इस प्रोसेस में कुछ डिफेक्टिव सेल्स भी बन जाते हैं। इन्हें डैमेज सेल कहते हैं।

डैमेज सेल बनने की गुंजाइश तब ज्यादा हो जाती है, जब शरीर नॉर्मल से ज्यादा इम्यून सेल डेवलप करता है। शरीर ऐसा तभी डेवलप करता है, जब इम्यून सिस्टम अचानक जरूरत से ज्यादा कमजोर हो जाए।

कोरोना के चपेट में आए लोगों के साथ भी यही हुआ था। उनका इम्यून सिस्टम अचानक कमजोर हो गया था। अब उनके शरीर में इम्यून सेल डेवलप हो रहे हैं। स्टडी में पाया गया कि कुछ लोगों में डैमेज सेल भी बन रहे हैं, जो बाद में कई बीमारियों की वजह बन सकते हैं।

  • क्या होता है ऑटोइम्यून डिसऑर्डर?

ऑटोइम्यून डिजीज के बारे में लोगों को बहुत कम पता होता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह लोगों में कई साल से रहती है, लेकिन उन्हें पता नहीं होता। इस बीमारी में शरीर अपने ही इम्यून सिस्टम और शरीर की सेहतमंद कोशिकाओं पर अटैक करने लगता है।

इस बीमारी में शरीर के अंदर कई तरह के बदलाव होने लगते हैं। कई बार शरीर की नसें भी डैमेज हो जाती हैं। इस बीमारी में जोड़ों में दर्द के साथ डाइजेस्टिव सिस्टम बिगड़ जाता है और शरीर के इंटरनल पार्ट में भी सूजन आ जाती है। कई बार बुखार भी रहता है।

  • इससे जुड़ी स्टडी क्या कहती है ?

इटली में हुई स्टडी में सामने आया कि पिछले 4 महीनों में रूमेटोलॉजी कंडीशन से जूझ रहे 2300 मरीजों में से 30% ऐसे हैं, जो कोरोना से ठीक हुए थे। इनमें से ज्यादातर मरीजों का इलाज कोर्टिकोस्टेरोइड या फिर दूसरी दवा से किया जा रहा है। यानी कोरोना से ठीक हुए मरीजों में रूमेटोलॉजी के लक्षण दिख रहे हैं। यह बीमारी ऑटोइम्यून डिसऑर्डर की वजह से होती है।

मरीज को भर्ती होने के पहले ही उसके इम्यून सिस्टम को सप्रेसिव थेरेपी दी गई। इसके बाद जब ऑटोइम्यून डिसऑर्डर के मरीजों का ट्रैक रिकॉर्ड निकाला गया तो पाया गया कि ऐसे मरीज जो कोरोना से ठीक हुए हैं, उनमें इस बीमारी का असर ज्यादा है।

न्यूयॉर्क में हुई एक स्टडी में भी यही बात सामने आई। इसमें भी पाया गया कि जिन ऑटोइम्यून रूमेटोलॉजी कंडीशन वाले मरीजों को कोरोना था, उनका हॉस्पिटल में भर्ती होने का रेट भी न्यूयॉर्क के सामान्य लोगों से ज्यादा है।

  • क्या हाइपरटेंशन के मरीजों में भी इसका खतरा है?

अमेरिका में इस बारे में एक और स्टडी की गई। इसमें पाया गया कि न केवल कोरोना से ठीक हुए मरीजों में बल्कि हाइपरटेंशन के मरीजों में भी ऑटोइम्यून डिसऑर्डर का खतरा ज्यादा है। इस स्टडी में कोरोना से ठीक हुए मरीजों और हाइपरटेंशन के मरीजों की तुलना की गई थी। इस दौरान हाइपरटेंशन और मोटापे की शिकायत वाले मरीजों में भी ऑटोइम्यून डिसऑर्डर का खतरा ज्यादा पाया गया।

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