बच्चा बार-बार हो रहा बीमार:इसकी वजह कोरोना है या लापरवाही; कारण पहचानें और हो जाएं अलर्ट

18 दिन पहले

पिछले कुछ दिनों से जिसे देखो इस बात से चिंतित है कि मेरा बच्चा बहुत बीमार हो रहा है। दो-तीन बार वायरल हो गया। खाना भी ठीक तरह से नहीं खाता है। बार-बार डॉक्टर के पास लेकर जाना पड़ता है। कुछ पेरेंट्स को डॉक्टर ने यह बताया कि बच्चे के बीमार पड़ने की वजह विटामिन डी की कमी है।

बच्चे क्यों ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं, उनके खानपान में क्या कमी रह गई है, क्या कोरोना के बाद से ऐसा हो रहा है, ऐसे कई सवालों का जवाब आज जरूरत की खबर में देंगे।

एक्सपर्ट हैं- डॉ. रूचिरा पहारे, पीडियाट्रिशियन, कोकिलाबेन हॉस्पिटल, डॉ.रोहित जोशी, कंसल्टेंट पीडियाट्रिक, बंसल हॉस्पिटल भोपाल और डॉ. विवेक शर्मा, पीडियाट्रिक, जयपुर

सवाल: बच्चे पिछले कुछ दिनों से बार-बार बीमार हो रहे हैं, पेरेंट्स को लगता है कि ऐसा कोरोना के बाद से हो रहा है, क्या यह बात सही है?
जवाब: हर बच्चे के बार-बार बीमार होने की वजह कोरोना नहीं है। कुछ सीजन में इस तरह के केस हर साल हमारे पास आते हैं। जब भी मौसम बदलता है तब बच्चे बीमार पड़ते ही है। ऐसा बारिश के बाद ज्यादा होता है। इसके साथ सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर में ऐसे केस बढ़ते हैं। फिर थोड़े कम होने लगते हैं। इसके बाद अप्रैल से इन्फेक्शन के केस बच्चों में बढ़ते हैं।

सवाल: फिर इसकी वजह इम्यूनिटी कम होना है या सिर्फ मौसमी वायरस?
जवाब:
पेरेंट्स में बच्चों को लेकर मिसकॉन्सेप्शन रहता है कि उसकी इम्यूनिटी वीक है। ऐसा हर बच्चे के केस में जरूरी नहीं। अगर बच्चा बार-बार बीमार हो रहा है इसका मतलब उसमें किसी तरह का इन्फेक्शन रिपीट हो रहा है। यह माैसम की वजह से होता है। वायरस और मल्टिपल वायरस के स्ट्रेन सर्कुलेट होते रहे हैं। ऐसे में जरूरी नहीं एक बार इन्फेक्शन हुआ है तो दूसरी बार नहीं होगा।

स्कूल जाने वाले बच्चों में इन्फेक्शन का रिस्क हमेशा से ही ज्यादा रहता है। बच्चे स्कूल में दूसरे बच्चे से मिलते हैं, खेलते हैं, साथ में खाते हैं, इससे अगर एक बच्चे को इन्फेक्शन हुआ है तो उसका वायरस आसानी से दूसरे बच्चे में ट्रांसफर हो जाएगा। यही बच्चा स्कूल से इन्फेक्शन घर लाएगा और अपने भाई-बहनों को देगा।

सवाल: इसका मतलब कोरोना इसके लिए बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं है?
जवाब: कुछ एक केस में आप इसे मान सकती हैं। कोरोना की वजह से दो साल बच्चों का एक्सपोजर कम हो गया है। वो घर में कैद रहे, खेल की जगह मोबाइल से चिपके रहें। ऐसे में उनके अंदर वायरस से लड़ने की क्षमता कम हो गई। वो पॉल्यूशन को झेल नहीं पा रहे, एलर्जी की प्रॉब्लम होने लगी। आइसोलेशन से निकलने के बाद एक दो साल बच्चों में इस तरह की समस्या होती रहेगी।

सवाल: अगर बच्चे की इम्यूनिटी वाकई वीक है, इसका पता चल चुका है तब उसे बिना दवाई क्या ठीक किया जा सकता है?
जवाब: अगर पेरेंट्स बच्चों के खानपान पर सही समय से ध्यान देंगे तो उन्हें इम्यूनिटी मजबूत करने के लिए दवाई देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए बच्चों को …

  • हल्दी वाले दूध पीने की आदत दें, इसमें शहद डाल सकते हैं।
  • जब भी मौसम बदलें, उन्हें तुलसी के रस में शहद मिलाकर दें।
  • छुहारे और भीगे बादाम को पीसकर दूध में मिलाकर पिलाएं।
  • मुनक्के में पोटैशियम, बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और बी कॉम्प्लेक्स होता है। ये इम्यूनिटी बूस्टर का काम करता है। बच्चों को भिगो कर रोज इसे दें।

सवाल: कई रिसर्च कहती हैं कि दूध न पीने से शरीर को कोई नुकसान नहीं होने वाला, आप बताएं क्या दूध पीना जरूरी है?
जवाब:
बच्चे के जन्म से केवल छह महीने तक ही दूध पीना जरूरी है। शुरुआती छह महीने में हम बच्चे को दूध के अलावा और कुछ और दे नहीं सकते हैं।उसके बाद हम बच्चे को सॉलिड खिलाना शुरू करते हैं। यह एक नेचुरल पैटर्न भी है और सही भी। इसलिए बच्चों को अनाज और दूसरी चीज खाने की आदत डालें। दिन भर में अगर आपका बच्चा एक गिलास दूध भी पीता है तो उसमें हर्ज नहीं।

सवाल: पेरेंट्स को लगता है कि बच्चा दूध नहीं पी रहा है तो कई तरह की दिक्कत होगी, इसलिए दूध पिलाने के लिए वे कई बार उसमें चॉकलेट पाउडर डालते हैं, क्या यह फायदेमंद हैं?
जवाब:
यही नहीं, अगर बच्चा दूध पीना पसंद करता है तो पेरेंट्स तीनों समय दूध देने लगते हैं। कुछ पेरेंट्स यह तक कहते हैं कि खाना मत खाओ, दूध पीकर सो जाओ। यह सब तरीका गलत है। जितनी बार दूध देंगे उसमें चीनी डालेंगे जो नुकसान करेगा। इसके साथ अगर आप चॉकलेट पाउडर या दूसरे फ्लेवर मिला रहे हैं तो उसमें भी चीनी होगी। इस तरह बच्चों को दूध के साथ अननेचुरल चीजें मिलती है, जो अनहेल्दी है।

सवाल: आपकी इस बात को सुनकर पेरेंट्स बोलेंगे कि दूध नहीं देंगे तो फिर बच्चे को कैल्सियम कहां से मिलेगा?
जवाब:
यह भी मिसकनसेप्शन है। कैल्शियम बाकी की चीजों में भी मिलता है। दाल और सब्जी से भी इस जरूरत को पूरी कर सकते हैं। एक और बात दूध आपके घर की चीज नहीं, आप आउटसोर्स करते हैं, इसकी क्वालिटी की गैरंटी नहीं ली जा सकती।

सवाल: कुछ बच्चों में विटामिन डी की कमी बताई जा रही है, इसकी वजह क्या है?
जवाब:
बच्चों में विटामिन डी की कमी की जिम्मेदार कई चीजें हैं…

  • बच्चों के भोजन में विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा का न होना।
  • बच्चों का सूरज की रोशनी में कम आना या बिल्कुल भी नहीं आना।
  • लिवर और किडनी में मौजूद समस्या के कारण शरीर में विटामिन डी को कन्वर्ट न कर पाना।
  • भोजन से विटामिन डी को अवशोषित करने में समस्या।
  • कुछ दवाओं को खाने की वजह से।
  • शरीर की आंतरिक समस्याओं या बीमारियों के कारण।

सवाल: विटामिन डी की कमी पूरी करने के लिए बच्चों को क्या खिलाएं?

जवाब: विटामिन डी की कमी आसानी से आप खाने से पूरी कर सकते हैं। यहां कुछ खाने-पीने की चीजों का जिक्र कर रहे हैं, उसे आप आपने बच्चों के खाने में शामिल कर सकते हैं…

  • फोर्टिफाइड फूड
  • कॉडलिवर ऑयल
  • मशरूम
  • अनाज
  • दूध और उससे बने प्रोडक्ट
  • मछली
  • अंडा और खासकर उसकी जर्दी

सवाल: फोर्टिफाइड फूड होता क्या है?
जवाब: फोर्टिफाइड और एनरिच फूड का जिक्र पहली बार 1930 और 40 के दशक में हुआ था। ये वो प्रोडक्ट थे जिनसे शरीर में विटामिन और मिनरल्स की कमी को पूरा किया जा सकता था। ये कुछ भी हो सकते हैं जैसे अनाज, दूध, सब्जियां, नाश्ते वाले सीरियल आदि।

सवाल: क्या विटामिन डी की कमी का आसानी से पता चल सकता है? जवाब: अगर बच्चे में विटामिन डी के लक्षण नजर आ रहे हैं तो डॉक्टर को दिखाएं। ब्लड टेस्ट से पता चल जाएगा कि बच्चे में वाकई विटामिन डी की कमी है।

सवाल: अगर बच्चा वेजिटेरियन है तो उनके शरीर में प्रोटीन, विटामिन की कमी को कैसे पूरा कर सकते हैं? पनीर के अलावा क्या ऑप्शन है?
जवाब: प्रोटीन के बहुत सारे ऑप्शन है। दाल से कई तरह की चीजें बन सकती हैं, चीला, गाठिया, ढोकला, खमण ट्राई कर सकते हैं। सोया के साथ एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं। बच्चों के टेस्ट के हिसाब से पेरेंट्स को खाने में वेरिएशन लाना चाहिए।

बच्चे के टेस्ट को सूट करने के लिए उन्हें कुकिंग में कुछ न कुछ बदलाव लाना होना। आप एक जैसा खाना डेली उन्हें देंगे ताे वो बोर होगा ही। हकीकत में यही होता है, पेरेंट्स बच्चे के स्वाद को डिवेलप करने की कोशिश नहीं करते हैं और हमसे आकर कहते हैं कि बच्चा खाना नहीं खाता।

चलते-चलते

बच्चे बार-बार बीमार पड़ते हैं, हम बड़े क्यों नहीं?

बच्चों का जितना ज्यादा एक्सपोजर बीमारी से होगा वो उतना ही ठीक रहेगा। नाॅर्मल बच्चा छह साल की एज तक सोसाइटी के सारे इन्फेक्शन ले लेता है, उससे बीमार पड़ चुका होता है। आप सोचों बच्चों को वायरल हो रहा है, बड़ों को क्यों नहीं होता। इसका जवाब यह है कि हमें वो सब बचपन में हो चुका होता है। बड़ों काे वही वायरस होता है जो अब तक नहीं हुआ।

एक नॉर्मल बच्चे को सात-आठ की उम्र तक साल में छह से सात बार खांसी-जुकाम होता है। माइल्ड को हम कभी काउंट नहीं करते है, उसे घरेलू नुस्खे से ठीक कर लेते हैं। हम उसी खांसी-जुकाम को काउंट करते हैं तो सीरियस होते हैं, तब हम बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाते हैं। कोरोना के बाद कुछ बच्चों में हल्की-फुल्की बीमारी भी गंभीर हो रही है। इस वजह से माता - पिता परेशान हैं।

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