ब्लैक फंगस के बाद अब ‘बोन डेथ’:कोरोना के बाद जोड़ों में दर्द एवैस्कुलर नेक्रोसिस हो सकता है, जॉइंट रिप्लेसमेंट करवाना पड़ सकता है; मुंबई में मिले तीन मरीज

3 महीने पहले

एक तरफ कोरोना वायरस की दूसरी लहर भारत में कहर बरपा चुकी है, वहीं दूसरी तरफ कोविड रिकवरी के बाद हो रहे कॉम्प्लीकेशन्स में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। म्यूकॉरमाइकोसिस यानी ब्लैक फंगस, डायबिटीज, ब्लड क्लॉट्स, दिल, फेफड़ों और पल्मनरी से जुड़ी दिक्कतें और साथ ही लंबे समय तक कोविड के लक्षणों का रहना देश भर में चिंता का विषय बन गया है। अब डॉक्टर्स के सामने कोविड रिकवरी से जुड़ी 'एवैस्कुलर नेक्रोसिस' नाम की नई मुसीबत आ गई है।

ऑर्थोपेडिक डॉ. राजीव हिंगोरानी इस बीमारी के बारे में बताते हैं कि एवैस्कुलर का मतलब है नो ब्लड और नेक्रोसिस का मतलब है डेड। यानी ऐसा कोई पीस ऑफ बोन जहां ब्लड सप्लाई कम हो जाती है उसके सेल्स डेड हो जाते हैं। इसे ही बोन डेथ के नाम से जाना जाता है।

सेल्स तक खून न पहुंचने से होता है एवैस्कुलर नेक्रोसिस
आसान भाषा में कहें तो इस बीमारी में हड्डियां गलने लगती हैं। इसका कारण है रक्त प्रवाह में बाधा, जिससे सेल्स तक पर्याप्त मात्रा में खून नहीं पहुंच पाता है। ऐसे में पोषण की कमी हो जाती है और हड्डियों के सेल्स मरने लगते हैं।

एवैस्कुलर नेक्रोसिस के मामले बढ़ने की आशंका
रिपोर्ट्स के अनुसार, मुंबई के अस्पतालों में एवैस्कुलर नेक्रोसिस (AVN) के तीन मामले मिले हैं और सभी की उम्र 40 साल से कम है। ये सभी कोराना से ठीक हो चुके थे। डॉक्टर्स के मुताबिक आने वाले समय में एवैस्कुलर नेक्रोसिस के मामले बढ़ सकते हैं।

स्टेरॉयड लेने वालों को है ज्यादा खतरा
डॉक्टर राजीव कहते हैं कि एवैस्कुलर नेक्रोसिस की समस्या सबसे अधिक कूल्हे की हड्डी में होती है, जिसकी वजह से जांध की हड्डी का गोल हिस्सा, जो कूल्हे का जोड़ बनता है, वो गलने लगता है। आमतौर पर 30 से 60 साल की उम्र के लोग प्रभावित होते हैं। लेकिन कोरोना के उन मरीजों पर इसका खतरा ज्यादा है जिन्हें इलाज के दौरान स्टेरॉयड दिया गया हो।

कैसे होता है 'बोन डेथ' का इलाज
डॉक्टर राजीव कहते हैं जोड़ों में दर्द होने पर उसे नजरअंदाज न करें। अगर लगातार कई दिनों से दर्द बना हुआ है, इसके अलावा कोई दूसरे लक्षण नहीं हैं तो ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से सलाह लें। हॉक्टर कुछ दिनों के लिए ऑब्जर्वेशन में रखेगा, दर्द ठीक न होने पर तुरंत एमआरआई की सलाह देगा। क्योंकि एक महीने बाद एमआरआई से इसका पता लगाया जा सकता है। तीन महीने बाद यह एक्सरे में भी नजर आने लगता है। शुरुआती दिनों में पता चलने पर इसका इलाज हो सकता है, लेकिन देरी होने पर जॉइंट रिप्लेसमेंट ही एकमात्र तरीका है।