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मानसिक बीमारी की वजह सरकार भी:कोरोना टाइम में पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा तनाव में रहीं, कमाई पर भी असर पड़ा; जानिए क्यों

नई दिल्ली8 महीने पहले
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क्या खुश रहने के लिए पैसा होना जरूरी है? यह बहुत पुराना सवाल है, लेकिन जवाब हमेशा से हां में है। sciencemag.org ने कोरोना के दौर में लोगों से जुड़ी एक स्टडी की। इसमें गरीबी और मानसिक समस्याओं के बीच सीधा संबंध पाया। इसी स्टडी को आधार बनाकर अब वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के एक्सपर्ट्स मेंटल हेल्थ से जुड़ी दिक्कतों को राजनीतिक और सरकारों की समस्या बता रहे हैं। उनका कहना है कि मानसिक समस्याओं का हल सरकार या सिस्टम ही निकाल सकता है।

क्या कहती है स्टडी?

स्टडी के मुताबिक कोरोना महामारी में दुनियाभर में करोड़ों लोग बेरोजगार हुए। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी CMIE के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ भारत में अप्रैल से जून के बीच करीब 1.9 करोड़ लोग बेरोजगार हुए। इसके चलते लोगों में एंग्जाइटी, डिप्रेशन और स्ट्रेस की समस्या देखी गई।

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के मुताबिक खाना, रहना और हेल्थ केयर इंसान की बेसिक जरूरत है। जब व्यक्ति को इनमें से कोई एक भी सेफ नजर नहीं आता है तो उसके लिए वह सबसे बुरा वक्त होता है।

गरीबी में भी जेंडर गैप, महिलाएं ज्यादा परेशान

care.org ने 40 देशों की 10 हजार महिलाओं पर स्टडी की। इसमें पाया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में गरीबी के चलते मानसिक समस्याओं का रिस्क ज्यादा है। वजह, महिलाओं पर घर की जिम्मेदारियां हैं।

खासकर, ऐसी महिलाएं जो इनफॉर्मल सेक्टर में काम करती हैं, जैसे- मजदूरी, सिलाई-बुनाई और मेड का काम करने वालीं। उनमें गरीबी के चलते मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर के केस ज्यादा आते हैं।

  • WEF के एक्सपर्ट्स के मुताबिक सरकारों की जिम्मेदारी है कि आर्थिक तौर पर परेशान लोगों की मदद करें। जिससे गरीबों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखा जा सके। यह राजनीतिक मसला भी है, इसकी दवा आर्थिक सहायता ही हो सकती है।
  • WEF के मुताबिक भारत में इसको लेकर पहल तो हुई, लेकिन मदद बहुत कम और सीमित समय तक ही दी गई। भारत में महिलाएं, पुरुषों की तुलना में मानसिक तौर पर ज्यादा परेशान हैं।

कैसे दूर की जा सकती है ये समस्या?

स्टडी के मुताबिक गरीबी, डिप्रेशन और एंग्जाइटी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। लो इनकम के चलते दुनिया में सबसे ज्यादा तनाव के मामले सामने आते हैं। इससे उबरने के लिए बेसिक जरूरत पूरी करना सबसे ज्यादा जरूरी है। यह तभी संभव है, जब इसे मेंटल हेल्थ इश्यू के तौर पर ही न देखकर, राजनीतिक समस्या के तौर पर भी देखा जाए। इसके लिए सरकारों को आगे आना होगा।

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