पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

आपदा से कैसे निपटें:देश का आपदा मॉडल तो बेहतर; कोऑर्डिनेशन में कमी, एटीट्यूड और कमजोर आकलन के चलते होता है ज्यादा नुकसान

नई दिल्ली13 दिन पहलेलेखक: आदित्य सिंह
  • जापान में आपदा प्रबंधन को स्कूल में पढ़ाया जाता है, अमेरिका में सबकुछ लोकल लेवल की टीम कंट्रोल करती हैं
  • अमेरिका और जापान में इंटिग्रेटेड इन्फॉर्मेशन सिस्टम और अवेयरनेस ही सबसे अहम, लेकिन भारत में ये कमजोर कड़ी

उत्तराखंड में आपदा के 9 दिन बाद भी रेस्क्यू जारी है। हताहत लोगों के परिजनों की डबडबाई आंखें बद-इंतजामी की कहानियां बयां कर रही हैं। लोग डिजास्टर मैनेजमेंट सिस्टम पर सवाल भी उठा रहे हैं। आखिर केदारनाथ की आपदा से सिस्टम ने सबक क्यों नहीं लिया? क्यों समय पर प्रभावितों तक राहत नहीं पहुंच पाती? जबकि दुनिया के कई देश ऐसे हैं, जो आपदाओं के आदी हैं, लेकिन वहां के डिजास्टर मैनेजमेंट सिस्टम के सामने आपदाएं छोटी पड़ जाती हैं।

आइए ऐसे ही दो देश जो सबसे ज्यादा आपदाओं का सामना करते हैं, वहां के डिजास्टर मैनेजमेंट को समझते हैं कि वे कैसे काम करते हैं-

1. अमेरिका का मॉडल : यहां आपदा प्रबंधन तीन स्तरों पर किया जाता है, उसमें लोकल अथॉरिटी की भूमिका अहम रहती है।

जानते हैं 2005 और 2012 में आए कटरीना तूफान में कैसे किया काम-

  • 2005 का कटरीना-

2005 में आए कटरीना तूफान ने अमेरिका को झकझोर डाला। 1800 से अधिक जानें गईं, लाखों लोग बेघर हो गए। तूफान की स्पीड 119 से 154 किलो मीटर प्रति घंटे थी। उस वक्त लोकल लेवल का सिस्टम इस तूफान का सामना करने के लिए तैयार नहीं था।

स्टेट लेवल पर आपदा प्रबंधन करने वाली फेडरल इमरजेंसी मैनेजमेंट एजेंसी को रिस्पांस करने में 3 घंटे लग गए। लोकल यूनिट्स लोगों को ट्रैक तक नहीं कर पा रही थी। इसीलिए ज्यादातर लोगों की जान खाने, पीने के पानी की सप्लाई में देरी और वक्त पर राहत न पहुंच पाने से गई।

  • 2012 का कटरीना-

2012 में अमेरिका में दोबारा कटरीना आया। इस बार अमेरिका अलर्ट था और व्यवस्थाएं चाक-चौबंद थीं। इस बार भी तूफान की स्पीड 125 किलो मीटर प्रति घंटे से ऊपर की थी। इस बार लोकल लेवल की टीमों ने 10 मिनट के अंदर रिस्पॉन्स किया। कम्युनिटी लेवल पर कम्यूनिकेशन बनाकर लोगों को ट्रैक किया गया।

तूफान प्रभावित इलाकों में मल्टी रिटेल चेन वॉलमार्ट ने खाने-पीने का सामान पहुंचाया। इस सबका असर यह हुआ कि सिर्फ 300 लोगों जान गई। इस बार 36 हजार 400 करोड़ का नुकसान हुआ, जबकि 2005 में 72 हजार करोड़ का नुकसान हुआ था।

2. जापान का मॉडल: जापान का आपदा प्रबंधन तंत्र देश की भौगोलिक स्थितियों की तरह ही अनूठा है। जापान में पूरे साल भूकंप आते हैं, इसीलिए आपदा प्रबंधन की ट्रेनिंग और ड्रिल बचपन से ही शुरू हो जाती है।

जानते हैं 2011 के भूकंप में सिस्टम ने कैसे काम किया-

  • चेतावनी सिस्टम सबसे खास-

जापान में अक्सर भूकंप के झटके आते रहते हैं और लोग पहले की तैयारी के दम पर ही जानमाल के नुकसान से बच पाते हैं। जापान का आपदा चेतावनी का सिस्टम दुनिया में सबसे बेहतर है। इसी के चलते हर साल हजारों जिंदगियां बचाती हैं।

ऐसी ही एक आपदा मिनामीशरायिकी शहर में 11 मार्च 2011 को आई। भूकंप की तीब्रता रियक्टर स्केल पर 8.1 थी जिसमें 413 लोग मारे गए थे। यहां आपदा चेतावनी देने के लिए तैनात मिकी एंडो और तकीशी मियूरा ने उपकरणों के दम पर भारी तबाही को पहले ही भांप लिया। इसके बाद उन्होंने लगातार चेतावनी देने का सिलसिला जारी रखा। लोग फौरन सुरक्षित जगहों पर जाने लगे। हालांकि ड्यूटी करते हुए दोनों की जान चली गई, लेकिन हजारों लोग बचा लिए गए।

अब बात भारत के आपदा मैनेजमेंट के मॉडल की

भारत में आपदा प्रबंधन का मॉडल डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट 2005 के तहत बनाया गया। इस ऐक्ट के तहत किसी भी आपदा में चाहे वह नैचुरल हो या मैन मेड, उससे कैसे निपटना है? इसकी पूरी जानकारी है। इस एक्ट में अलग-अलग एजेंसियों की भूमिकाओं को भी तय किया गया है।

किस स्थित में किस यूनिट को दी जाती है जिम्मेदारी

  • नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स(NDRF)- किसी भी तरह की आपदा से निपटने के लिए इस फोर्स को बनाया गया है। इसका प्रमुख डायरेक्टर जनरल लेवल का अधिकारी होता है। NDRF की स्थापना, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत 2005 में हुई थी, इसमें 13 हजार फोर्स काम कर रही है।
  • भारतीय सेना- जब आपदा राज्य सरकारों के बूते से बाहर हो जाती है, तब भारतीय सेना की भूमिका शुरू होती है। कच्छ भूकंप, केदारनाथ आपदा जैसी स्थितियों में भारतीय सेना ने हजारों लोगों को बचाया। वायु सेना भी लोगों को दुर्गम जगहों से निकालने और मेडिकल सेवाएं मुहैया कराने में बड़ी भूमिका निभाती है।
  • पैरामिलिट्री फोर्स- आपदा की स्थिति में पैरामिलिट्री फोर्स भी अहम भूमिका निभाती है। उत्तराखंड में आई आपदा में आईटीबीपी के जवान राहत और बचाव में जुटे हैं। इस तरह की फोर्स पहाड़ों पर रेस्क्यू में ज्यादा सक्षम होती हैं।
  • स्टेट पुलिस, फायर सर्विस और सिविल डिफेंस- आपदा के वक्त सबसे पहले लोगों तक राहत पहुंचाने का काम लोकल स्तर पर मौजूद स्टेट पुलिस और फायर सर्विस के लोग करते हैं। इसके अलावा सिविल डिफेंस से जुड़े लोग भी अहम भूमिका अदा करते हैं।

इतना मजबूत सिस्टम होने के बाद कैसे हो जाती है चूक?

अब सवाल है कि इतने मजबूत सिस्टम के बाद हम उत्तराखंड जैसी आपदा को समझने और उसे संभालने में फेल क्यों हो जाते हैं? इसको समझने के लिए हमने ओडिशा के स्पेशल रिलीफ डिपार्टमेंट के डिप्टी डायरेक्टर प्रवात रंजन मलिक से बात की। रंजन कहते हैं कि देश में अलग-अलग जगहों की भौगोलिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए इसे राष्ट्रीय स्तर से ज्यादा लोकल स्तर पर दुरुस्त करने की जरूरत है।

जानिए ओडिशा के स्पेशल रिलीफ के डिप्टी डायरेक्टर प्रवात रंजन से कि देश के आपदा मॉडल में क्या खामियां हैं-

1. कोऑर्डिनेशन: एजेंसियों के बीच कोऑर्डिनेशन की कमी है। इस के चलते आपदाओं से निपटने में बड़ी दिक्कत आती है।

2.अनुमान कमजोर: हमारी मौसम विभाग की एजेंसियां समय पर खतरों का सही आकलन न कर पाती हैं। इसके चलते लोगों को सही समय पर अलर्ट नहीं कर मिलता है।

3. लापरवाही: आपदाओं से निपटने के लिए होने वाले ड्रिल प्रोग्राम में अधिकारी हिस्सा लेने से कतराते हैं। इसी लिए आपदा आने में पर वे हड़बड़ा जाते हैं और नुकसान और बड़ा हो जाता है।

4. अधिक जनसंख्या: हमारे देश में जनसंख्या काफी है। इसलिए कम समय में अधिक लोगों को एक जगह से दूसरी जगह रेस्क्यू करने में मुश्किल आती है।

5. इंटिग्रेटेड इन्फॉर्मेशन सिस्टम: देश में इंटिग्रेटेड इन्फॉर्मेशन सिस्टम नहीं है। इसके चलते कई बार बचाव कार्य में लगी एजेंसियों को ही पता नहीं चल पाता है कि कितने लोग फंसे हैं और कितनों को बचाया गया है। वहीं, जापान और अमेरिका जैसे देश में सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट के जरिए लगातार ऐसी सूचनाएं दी जाती हैं।

6. एटीट्यूड: जब तक लोगों का एटिट्यूड आपदा से निपटने को लेकर नहीं बदलेगा, तब तक इस तरह की आपदाएं राहत पर भारी पड़ती रहेंगी। आपदा प्रबंधन को लेकर लोगों में अवेयरनेस लाने की जरूरत है।

जागरूक होकर आपदा के नुकसान को कम किया जा सकता है
NGO रैपिड रिस्पॉन्स की वालंटियर साक्षी देशमुख 7 साल से लोगों को आपदा से निपटने की ट्रेनिंग दे रही हैं। साक्षी कहती हैं कि किसी भी आपदा से निपटने के लिए सबसे जरूरी होती है लोगों की जागरूकता। कभी-कभी आपदाएं उतनी बड़ी नहीं होती, जितना नुकसान हो जाता है। पैनिक माहौल में लोग वह कर देते हैं, जो करना नहीं चाहिए।

देश में घटी दो घटनाओं से समझें जागरूकता कितनी जरूरी

  1. 2015 में पुणे की एक फैक्ट्री में आग लग गई, कुछ लोग लिफ्ट से भागने लगे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि नीचे वाले फ्लोर पर आग भीषण रूप ले चुकी थी, लिफ्ट वहां जाकर फंस गई और लिफ्ट में सवार 13 लोग छोटी सी गलती के चलते मारे गए, जबकि अन्य सभी लोगों को बचा लिया गया।
  2. मुंबई के परेल इलाके में 2018 में एक रिहायशी इमारत में लगी आग में 4 लोगों की मौत हो गई। लेकिन इसी हादसे में 10 साल की बच्ची ने सूझबूझ से अपने परिवार और पड़ोसियों की जिंदगी बचा ली। हुआ यूं कि 10 साल की जेन सदावर्ते ने सभी लोगों को मुंह पर गीला रुमाल रखकवाकर एयर प्यूरिफायर के पास ले गई, जिससे वे आसानी से सांस लेते रहे। जेन ने आग से निपटने की ट्रेनिंग स्कूल में ली थी।

3 ग्राफिक्स में समझिए आपदा के वक्त खुद क्या करें ?

खबरें और भी हैं...

आज का राशिफल

मेष
Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
मेष|Aries

पॉजिटिव- आज जीवन में कोई अप्रत्याशित बदलाव आएगा। उसे स्वीकारना आपके लिए भाग्योदय दायक रहेगा। परिवार से संबंधित किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार विमर्श में आपकी सलाह को विशेष सहमति दी जाएगी। नेगेटिव-...

और पढ़ें