इलाज के लिए डोनर न मिलने पर मरीज हुआ हताश:इच्छामृत्यु के लिए जाना चाहता है यूरोप, क्या है देश का कानून

3 महीने पहले

बेंगलुरु की रहने वाली 49 साल की एक महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने अपने दोस्त की यूरोप यात्रा पर रोक लगाने की मांग की है। दरअसल उसका दोस्त इच्छामृत्यु के लिए यूरोप जाना चाहता है। वह 2014 से वो क्रोनिक फेटीग सिंड्रोम से पीड़ित है। इसकी वजह से उसकी आंत में दिक्कत है। इलाज के लिए दिल्ली, एम्स में फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांटेशन करवा रहा है।

चूंकि कोरोना की वजह से ट्रांसप्लांट के लिए उसे कोई डोनर नहीं मिल पा रहा, इसलिए उसने मरने का मन बना लिया है। महिला ने कोर्ट से गुहार लगाई है कि अगर उसके दोस्त की यात्रा नहीं रोकी गई तो उसके पेरेंट्स और दूसरे दोस्तों का बड़ा नुकसान होगा।

ऐसे में चलिए समझते हैं कि इच्छामृत्यु को लेकर भारतीय कानून क्या कहता है? क्या कोई व्यक्ति इसके लिए दूसरे देशों में जा सकता है या नहीं? साथ ही जानते हैं कि फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांटेशन क्या है?

( इन सारे सवालों के जवाब जानने के लिए हमने बात की सुप्रीम कोर्ट के वकील बी. कृष्णा प्रसाद, रॉबिन मजुमदार, ग्रेटर नोएडा की एडवोकेट चिकिशा मोहंती और भोपाल के एडवोकेट अविनाश गोयल से)

सवाल: इच्छामृत्यु का मतलब क्या होता है?

जवाब: इच्छामृत्यु का मतलब है किसी व्यक्ति की इच्छा से उसे मृत्यु दे देना। इसमें डॉक्टर की सहायता से उसके जीवन का अंत करना होता है, ताकि उसे दर्द से छुटकारा दिलाया जा सके यानी किसी लाइलाज बीमारी की तकलीफ से उसे मुक्ति मिल जाए।

दुनियाभर में इच्छा मृत्यु दो प्रकार से दी जाती है।

  • सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)
  • निष्‍क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

सवाल: सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में क्या अंतर है?

जवाब: सक्रिय इच्छामृत्यु- इसमें डॉक्टर की मदद से पेशेंट को मृत्यु दी जाती है। डॉक्टर, पेशेंट को जहरीली दवा या फिर इंजेक्शन देते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है। कुछ ही देशों में इस तरह से इच्छामृत्यु दी जाती है। एडवोकेट कृष्णा प्रसाद के अनुसार, भारत में ये अवैध है।

निष्‍क्रिय इच्छा मृत्यु- इसमें जहरीली दवा या इंजेक्शन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। अगर कोई पेशेंट लंबे समय से जीवन रक्षक उपकरण यानी वेंटिलेटर की मदद से जिंदा है और उसका परिवार इच्छामृत्यु की गुहार लगा रहे हैं, तो उसे वेंटिलेटर से हटा दिया जाता है। उसकी वो दवाइयां भी बंद कर दी जाती हैं, जिनकी मदद से वो जिंदा है।

सवाल: किन बीमारियों में पेशेंट को इच्छामृत्यु की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने दी है?

जवाब: कोर्ट ने किसी खास बीमारी के बारे में नहीं कहा है। अगर डॉक्टर को लगता है कि पेशेंट के ठीक होने की कोई आस नहीं बची है, तब उसके परिवार वालों की सलाह से निष्क्रिय इच्छामृत्यु दी जा सकती है।

सवाल: अगर पेशेंट सोचने-समझने की क्षमता रखते हैं, तब भी क्या निष्क्रिय इच्छामृत्यु का फैसला परिवार वालों का होगा?

जवाब: नहीं, ऐसी सिचुएशन में फैसला लेने का हक पूरी तरह से पेशेंट का होगा।

सवाल: निष्क्रिय इच्छामृत्यु में पेशेंट को काफी दर्द सहना होगा?

जवाब: इसकी पूरी जिम्मेदारी डॉक्टर की होगी कि पेशेंट जिस दर्द से गुजर रहा है, उसे वो और बढ़ने न दें।

साल 2018 में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे दी थी। आप सोच रहे होंगे कि अब ये लिविंग विल क्या है। इसके बारे में नीचे पढ़िए...

अब बात करते हैं फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांटेशन के बारे में जिसकी वजह से मरीज अपनी मौत चाहता है…

सवाल: क्या है फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांटेशन?

जवाब: इसे स्टूल ट्रांसप्लांट कहते हैं। इलाज के लिए एक हेल्दी व्यक्ति के स्टूल को लेकर मरीज में फीकल बैक्टीरिया डाला जाता है। डॉक्टर मारिया वेरेशिल्ड के मुताबिक वे लोग जिन्हें पेट में बार-बार इंफेक्शन होते रहते हैं, उनके पाचन तंत्र में किसी हेल्दी व्यक्ति के शरीर से लिया स्टूल प्लांट किया जाता है। इसकी मदद से मरीज के शरीर में अच्छे बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाने और उसे संतुलन में लाने की कोशिश की जाती है।

सवाल: स्टूल यानी पॉटी को कैसे एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुंचाया जाता है?

जवाब: इसका जवाब नीचे पढ़ें-

  • स्टूल ट्रांसप्लांट से पहले कई तरह के टेस्ट और इंटरव्यू किए जाते हैं।
  • इसे ट्रांसफर करने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं।
  • सबसे पहले डोनर को लैब में आकर सैंपल देना होता है।
  • सैंपल को फिल्टर करने के बाद सेंट्रीफ्यूज मशीन में डालकर घुमाया जाता है।
  • इसी प्रक्रिया में बैक्टीरिया स्टूल से अलग होते हैं और फिर उन्हें कैप्सूलों में भर मरीज को निगलने दिया जाता है।
  • एक दूसरे प्रोसेस में मरीज की कोलन में कोलोनोस्कोपी कर सीधे भी ट्रांसफर किया जा सकता है।
  • एनीमा प्रोसेस से भी बड़ी आंत में बैक्टीरिया को छोड़ा जा सकता है। इसके बाद बैक्टीरिया के मरीज की आंत में बसने की उम्मीद की जाती है।

अब मरीज की पूरी कहानी

  • मरीज की उम्र 48 साल है। नोएडा का रहने वाला है। माता-पिता दोनों 70 साल के हैं। मरीज अकेला बेटा है और उसकी एक बहन है।
  • याचिका में यह भी कहा गया कि मरीज ने झूठ बोलकर शेंगेन वीजा लिया है। इस वीजा से वो 26 यूरोपीय देशों में ट्रैवल कर सकता है। उसने यह बताया था कि वो इलाज के लिए बेल्जियम जा रहा है, जबकि हकीकत में उसने इस वीजा के माध्यम से इसी साल जून में बेल्जियम से स्विटजरलैंड के ज्यूरिख की यात्रा की थी।
  • मरीज ने ज्यूरिख की ऑर्गेनाइजेशन ‘डिग्निटास’ से इच्छामृत्यु की मांग की है। आर्गेनाइजेशन विदेशी नागरिकों को इच्छामृत्यु देने में मदद करती है। ‘डिग्निटास’ ने उसका आवेदन स्वीकार कर लिया है। अगस्त के अंत तक मरीज के अंतिम फैसले का वो इंतजार करेंगे।
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