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वैक्सीनेशन पर मोदी को सलाह:युवाओं और बच्चों को फौरन वैक्सीन लगाना फायदे का सौदा नहीं, जिन्हें कोरोना हो चुका उन्हें भी टीका जरूरी नहीं

एक वर्ष पहले
  • अंधाधुंध और अधूरा वैक्सीनेशन कोरोना के नए म्यूटेंट स्ट्रेन्स बनने की कर सकता है शुरुआत
  • हर जिले में हो सीरो सर्वे, जहां 70% लोगों में एंटीबॉडीज मिलें वहां न लगे कोई लॉकडाउन

बड़े पैमाने पर अंधाधुंध और अधूरा वैक्सीनेशन कोरोना वायरस के नए-नए म्यूटेंट स्ट्रेन्स बनने की शुरुआत कर सकता है। यह चेतावनी देश के जाने-माने हेल्थ एक्सपर्ट्स के एक समूह ने दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपी अपनी एक रिपोर्ट में इन एक्सपर्ट्स ने सलाह दी है कि कोरोना की चपेट में आ चुके लोगों को वैक्सीन लगाने की जरूरत नहीं।

समूह का कहना है कि बड़े पैमाने पर लोगों के वैक्सीनेशन की जगह केवल उन लोगों को वैक्सीनेट करना चाहिए जो संवेदनशील और जोखिम वाली कैटेगरी में हैं। मौजूदा हालात में युवाओं और बच्चों को फौरन वैक्सीन लगाना फायदे का सौदा नहीं। इससे जरूरतमंद लोगों को वैक्सीन मिलने में परेशानी हो सकती है। इन एक्सपर्ट्स में AIIMS के डॉक्टर और कोविड-19 नेशनल टास्क फोर्स के मेंबर भी शामिल हैं।

इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन (IPHA), इंडियन एसोसिएशन ऑफ एपिडमोलॉजिस्ट्स (IAE) और इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्रीवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन (IAPSM) के इन एक्सपर्ट्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, "देश में महामारी के मौजूदा हालात में बच्चों समेत सभी उम्र के लोगों की बजाय हमारी वैक्सीनेशन पॉलिसी महामारी के डेटा पर आधारित होनी चाहिए।"

जानते हैं सरकारी एक्सपर्ट्स ने प्रधानमंत्री मोदी को क्या-क्या सलाह दी हैं...

1. सीमित वैक्सीन एक सच, युवाओं को टीका फायदेमंद नहीं : सभी वयस्कों को वैक्सीन देना सबसे बेहतर स्थिति है, लेकिन सच यह कि हम सीमित वैक्सीन के साथ एक महामारी के बीच में हैं। ऐसी स्थिति में हमारा ध्यान मौतों को घटाने पर होना चाहिए, जो खासतौर पर बुजुर्गों, बीमार और मोटापे से शिकार लोगों के लिए खतरा साबित हो रही है। मौजूदा सीमाओं को देखते हुए युवाओं को सभी के साथ वैक्सीन लगाना खर्च के हिसाब से भी लाभकारी नहीं है।
2. बच्चों के वैक्सीनेशन पर डेटा साथ नहीं : डेटा कम उम्र के वयस्क और बच्चों के फौरन वैक्सीनेशन की जरूरत को जाहिर नहीं कर रहा है। इस पर होने वाले खर्च का पूरा फायदा नहीं मिलेगा। सभी के लिए वैक्सीनेशन खोलने से जोखिम वाली आबादी तक टीके देर से पहुंचेंगे।
3 . इंफेक्शन तेज, वैक्सीनेशन धीमा: इस बात की संभावना बेहद कम है कि सभी वयस्कों को टीका लगाने की हमारी योजना युवा आबादी में फैल रहे इंफेक्शन की तेजी को पीछे छोड़ सके।
4. कोरोना हो चुका तो बाद में टीका : जिन्हें कोरोना हो चुका है, उन्हें वैक्सीन लगाने की जरूरत नहीं। ऐसे लोगों को इस बात के सबूत मिलने के बाद वैक्सीन दी जानी चाहिए कि प्राकृतिक रूप से हुए इंफेक्शन के बाद वैक्सीन फायदेमंद है।
5. लचीला हो वैक्सीन शेड्यूल : वैक्सीन कब और कितने दिनों के अंतर से लगाई जानी चाहिए, यह इलाके और आबादी (जैसे बुजुर्ग या बीमार) में कोरोना या किसी खास वैरिएंट में बढ़ोतरी के हिसाब से तय होना चाहिए। उदाहरण के लिए जिन इलाकों में डेल्टा वैरिएंट तेजी से फैल रहा हो, वहां कोवीशील्ड की दूसरी डोज कम अंतराल पर लगनी चाहिए। जैसे- बुजुर्गों और बीमार लोगों को कोवीशील्ड के दोनों डोज 82 दिनों के बजाय कम दिनों के भीतर ही लगने चाहिए।
6. सीमित संसाधनों को बिखेरे नहीं : एक साथ सभी मोर्चे खोलने से हमारे सभी संसाधन इतने बिखर जाएंगे कि पूरी आबादी के हिसाब से उसका असर बेहद कम पड़ेगा।
7. नए वैरिएंट्स को मिलेगा बढ़ावा : एक्सपर्ट्स के मुताबिक बड़े पैमाने पर अंधाधुंध और अधूरा वैक्सीनेशन कोरोना वायरस के नए म्यूटेंट्स के जन्म को बढ़ावा दे सकता है।
8. वैक्सीनेशन न अंधाधुंध अच्छा, न उसे रोकना : वैक्सीन कोरोना के खिलाफ एक मजबूत और शक्तिशाली हथियार है और ऐसे बाकी हथियारों की तरह इसे न तो रोका जाना चाहिए और न अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लागत का अधिकतम लाभ लेने के लिए इसे स्ट्रैटजिकली प्लांड करना चाहिए।

हर जिले में हो सीरो सर्वे, जोखिम का पता चलेगा
रिपोर्ट में कोरोना की दूसरी लहर के बाद हर जिले में रियल टाइम लोकल सीरो सर्वे कराने की सलाह दी गई है।

  • सीरो सर्वे में लोगों के ब्लड सैंपल लेकर उसमें कोरोना वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज की मौजूदगी जांची जाती है। बिना वैक्सीनेशन के किसी शख्स के खून में एंटीबॉडीज होने का मतलब है कि उसे कोरोना संक्रमण हो चुका है।
  • एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे जिले में कोरोना के जोखिम का पता चलेगा और वैक्सीनेशन की स्ट्रैटजी तय की जा सकेगी।
  • ऐसे सीरो सर्वे कोरोना के बाद पैदा होने वाली इम्यूनिटी का समय पता करने, दोबारा इंफेक्शन के मामलों का पता लगाने, इंफेक्शन की गंभीरता और नतीजों का रिकॉर्ड करने में मददगार होंगे जो लंबे समय की नीति तय करने में मददगार होंगे।

सीरो सर्वे में अगर 70% पॉजिटिव तो न हो लॉकडाउन
एक्सपर्ट समूह का कहना है कि अगर जिला स्तर पर नेचुरल इंफेक्शन और वैक्सीनेशन, दोनों वजह से 70% सैंपल में एंटीबॉडी (seroprevalence) पाए जाते हैं तो वहां किसी भी तरह का लॉकडाउन नहीं होना चाहिए। ऐसे जिलों में सामान्य जन-जीवन बहाल करने की कोशिश होनी चाहिए।

सीरो सर्वे के नतीजों से यह भी तय किया जा सकेगा कि किस जिले में पहले वैक्सीनेशन किया जाना चाहिए। मतलब यह कि जिस जिले में seroprevalence कम हो वह वैक्सीनेशन की प्राथमिकता में उतना ऊपर होना चाहिए।

जीनोम सिक्वेंसिंग 3% तक ले जाना जरूरी
कई तरह के कोरोना वैरिएंट्स को भारत में दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है, इसके बावजूद देश में 1% से भी कम पॉजिटिव सैंपल की जीनोम सिक्वेंसिंग हुई है। प्रति 1000 केसों पर भी इसकी दर काफी कम है।

  • एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौजूदा हालात में 5% पॉजिटिव सैंपल्स की जीनोम सिक्वेंसिंग का टारगेट हासिल करना काफी चुनौती भरा है, लेकिन कम से कम 3% के आंकड़े तक तो पहुंचना होगा।
  • रिपोर्ट में 10 नेशनल लैबोरेटरी को मिलाकर SARS-CoV-2 जिनोमिक्स कन्सोर्टियम (INSACOG) के गठन की तारीफ की गई है। हालांकि इसमें 17 और लैबोरेटरी को जोड़ने की सलाह दी गई है।
  • जिनोम सिक्वेंसिंग से यह पता चल सकेगा कि कौन सा वैरिएंट किस इलाके या किस तरह की आबादी में और किस गति से फैल रहा है। पारंपरिक तरीकों से यह पता लगाना मुश्किल होता है।

गांव-कस्बों में कोरोना जांच सुविधाएं काफी कम

एक्सपर्ट्स का कहना है कि गांव-कस्बों में कोरोना जांचने की सुविधाएं बेहद कम हैं। ऐसे में सभी लक्षण वाले सभी मरीजों की समय पर जांच होना मुमकिन नहीं। ऐसे स्थिति में सबसे सही हल क्लीनिकल लक्षणों के आधार कोरोना मरीजों की पहचान पर फोकस करना चाहिए।

कोरोना जांच के दौरान वैक्सीनेशन की जानकारी जुटाएं
समूह ने सलाह दी कि कोरोना की RT-PCR और RAT जांच कराने वाले सभी लोगों के वैक्सीनेशन के बारे में पूरी जानकारी जमा करने की सलाह दी गई है।
इस जानकारी का समय-समय पर विश्लेषण होना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि कोरोना वैक्सीनेशन के बाद कितने लोग पॉजिटिव हुए? कितने गंभीर बीमारी से ग्रसित हुए और कितनों की मौत हो गई।

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