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लैपटॉप या मोबाइल पर पढ़ाई में आंखों का ख्याल:बच्चे डिजिटल डिवाइस को 2 फीट दूर रखें, बीच में ब्रेक लेते रहें; जानिए क्या है आंखों को आराम देने वाला 20-20-20 रूल

10 महीने पहले
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  • एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर स्क्रीन 2 फीट से कम दूरी पर है तो आंखों को इमेज शार्प रखने में दिक्कत होती है
  • ब्लू लाइट रोकने वाले लेंस की जगह ब्रेक लेने पर भरोसा करें, बच्चे को बार-बार आंख झपकाने के लिए कहें

कैली हूवर ग्रीनवे. कोरोनावायरस के कारण एजुकेशन ऑनलाइन मोड पर शिफ्ट हो गई है। दुनियाभर के कई स्कूल पूरी तरह रिमोट या हायब्रिड लर्निंग मॉडल्स तैयार कर रहे हैं। ऐसे में एक चीज जो लगातार बढ़ेगी वो है बच्चों का स्क्रीन टाइम। अब माता-पिता बच्चों की हेल्थ और खासतौर से विजन को लेकर चिंता में हैं।

मार्च में पियु रिसर्च सेंटर के एक सर्वे में पता चला है कि ज्यादातर पैरेंट्स अपने बच्चों के ज्यादा टाइम स्क्रीन पर बिताने को लेकर चिंतित हैं। स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताने से स्ट्रेन, थकान और सिरदर्द जैसी परेशानियां होती हैं। हालांकि एक्स्पर्ट्स पैरेंट्स को अपने बच्चों की आंखों को सुरक्षित रखने के लिए आसान उपाय बता रहे हैं।

डिवाइस से सुरक्षित दूरी पर रहें

  • ऑप्टोमैरिस्ट और ग्लोबल मायोपिया अवेयरनेस कोएलिशन की प्रवक्ता डॉक्टर मिलिसेंट नाइट कहती हैं कि "आमतौर पर हम पढ़ने के लिए 16 इंच की दूरी रखते थे, लेकिन अब हम पा रहे हैं कि लोग 10-12 इंच की दूरी से रीडिंग कर रहे हैं। खासतौर से फोन पर।"
  • इस दूरी पर आखें आराम के बजाए स्क्रीन पर फोकस करती हैं। कुछ देर बाद मोड़ने पर इसे आंखों की मांसपेशियों में तनाव हो सकता है, जो सिरदर्द और दूसरी देखने की दिक्कतों का कारण बन सकता है।
  • हालांकि कोई भी रिसर्च यह नहीं बताती कि मायोपिया और स्क्रीन उपयोग के बीच कोई लिंक है। अमेरिकन ऑप्टोमैरिक एसोसिएशन का डाटा बताता है कि 2018 में चार में से एक पैरेंट्स के बच्चे को मायोपिया था।

मायोपिया का इलाज करना बेहद जरूरी

  • अगर मायोपिया का इलाज नहीं किया जाता है तो यह भविष्य में मायोपिक मैक्युलर डीजनरेशन, रेटिनल डिटैचमेंट, कैटेरेक्ट्स और ग्लुकोमा जैसी गंभीर बीमारियों की प्रवृत्ति का कारण बन सकती है।
  • जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में पीडियाट्रिक ऑप्थेल्मोलॉजी के प्रोफेसर डॉक्टर डेविड गायटन कहते हैं "यहां मायोपिया के बारे में जानकारी का एक पहाड़ है, लेकिन 50 सालों में सबसे बड़ा फैक्ट यह है कि आंख का बढ़ना मायोपिया का कारण होता है।"
  • गायटन के मुताबिक यह किसी को भी ठीक-ठीक नहीं पता कि आंखों का बढ़ना उस इमेज के कारण होता है जो लोग रेटिना के पीछे देख रहे होते हैं। ऐसा तब होता है जब आप किसी चीज को देखने के लिए नजदीक लाते हैं।

एक्सपर्ट्स दो फीट दूर रखने की सलाह देते हैं

  • लॉस एंजिलिस में पीडियाट्रिक ऑप्थेलमोलॉजिस्ट डॉक्टर ल्यूक डाइट्ज डिजिटल डिवाइस को आंखों के लेवल से दो फीट दूर रखने या नीचे रखने की सलाह देते हैं। इससे ज्यादा नजदीक स्क्रीन रखने पर हमारी आंखों को इमेज शार्प रखने के लिए फोकस बनाने में मुश्किल होती है। यह तनाव का कारण बन सकता है और मायोपिया को बिगाड़ सकता है।
  • डॉक्टर नाइट सलाह देते हैं कि बच्चे कोहनी को टेबल पर रखते हैं और सिर को हाथों में रखते हैं। इस पोजिशन में उन्हें कोहनी को उठाकर स्क्रीन को छूना चाहिए।

20/20/20 रूल क्या है?

  • डॉक्टर नाइट पैरेंट्स और केयरटेकर को 20/20/20 रूल को फॉलो करने की सलाह देते हैं। इसके तहत हर 20 मिनट में आपको 20 फीट की दूरी पर कम से कम 20 सेकंड के लिए कुछ देखना चाहिए। इससे आपकी आंखों को आराम मिलता है और वे अपने नेचुरल पोज में आ जाती हैं।
  • डॉक्टर ल्यूक भी ब्लू लाइट रोकने वाले चश्मों के अलावा ब्रेक लेने को जरूरी बताते हैं। उन्होंने बताया कि उनसे कई पैरेंट्स ने इन ग्लासेज के बारे में पूछा है। "मैं उन्हें इसकी सलाह नहीं देता, क्योंकि अभी तक हमारे पास इस बात के कोई भी पुख्ता सबूत नहीं है कि यह सुरक्षित हैं और आखों के तनाव और थकान को कम करने में मदद का एकमात्र तरीका है।"
  • डॉक्टर ल्यूक ने पाया कि पैरेंट्स बच्चों के लिए सनग्लासेज में निवेश करेंगे, ताकि आंखों को अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाया जा सके।

आंखों की परेशानियों को लेकर सजग रहें
सिरदर्द, ज्यादा पलक झपकाना, आंख रगड़ना और बच्चों में थकान महसूस करना देखने में परेशानी के संकेत हो सकते हैं। डॉक्टर ल्यूक के अनुसार, चमक से दूर रहना मददगार हो सकता है। इंडोर रहते हुए स्क्रीन की ब्राइटनेस को कम रखें और बार डिजिटल डिवाइस का उपयोग न करें।

आंखों का सूखा होना भी चिंता का विषय है। डॉक्टर गायटन बताते हैं कि जब लोग डिवाइस पर पढ़ते हैं तो उनका ब्लिंक (पलक झपकाना) का रेट प्रति मिनट 5-10 बार कम हो जाता है। यह आंखें सूखने का कारण हो सकता है। हालांकि बच्चों की आंखें बड़े लोगों जितनी नहीं सूखतीं। याद रखें कि जब बच्चा स्क्रीन पर देखकर भले ही आंख बार-बार झपका रहा हो, लेकिन इसके बाद भी उन्हें इसकी याद दिलाते रहें।

विजन स्क्रीनिंग न छोड़ें
महामारी के कारण डॉक्टर के पास जाना न छोड़ें। अपने आई डॉक्टर की सेफ्टी गाइडलाइंस के बारे में जानें। हालांकि कमजोर समुदायों के लाखों छात्रों के लिए स्क्रीनिंग मुख्य रूप से की जाती है। अगर ऐसा नहीं है तो यह सुविधा स्कूल में दी जाती है। जब से स्कूल बंद हुए हैं, तब से बच्चों तक आंख संबंधी सुविधा पहुंचाना चुनौती भरा हो गया है।

पीडियाट्रिक ऑप्थेलमोलॉजिस्ट और जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में ऑप्थेलमोलॉजी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर मीगन कॉलिंस आई केयर प्राप्त करने वाले और यह सुविधा नहीं मिलने वाले बच्चों के बीच आ रहे फर्क को लेकर चिंतित हैं। वे अपने काम का बड़ा हिस्सा विजन फॉर बाल्टीमोर प्रोग्राम और नए तैयार हुए ई-स्कूल+इनिशिएटिव के जरिए कमजोर समुदाय के बच्चों तक आई केयर पहुंचाने में लगाती हैं।

मीगन कहती हैं "हम जानते हैं जो बच्चे ठीक से देख नहीं पाते वे स्कूल में परेशान होते हैं। हम टेक्नोलॉजी के बारे में बात करते हैं और टेक्नोलॉजी टाइम को लेकर चिंतित होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि बाहर कई बच्चों के पास अच्छी टेक्नोलॉजी नहीं है या पैरेंट्स का फोन टेक्नोलॉजी का जरिया है। अगर आप यह सोचते हैं कि लैपटॉप पर कुछ भी पढ़ना मुश्किल है तो मोबाइल फोन पर यह और भी ज्यादा मुश्किल होता है।"

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