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काम की खबर:छोटे बच्चों को कोरोना से बचा सकता है मां का दूध, अमेरिका में हुई रिसर्च - वैक्सीन लगवाने वाली मां के दूध से बच्चों में पहुंचे एंटीबॉडीज

5 महीने पहले
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दुनिया में जब कोरोना फैला तो सवाल खड़ा हुआ- क्या मां के दूध से बच्चों में कोरोना फैल सकता है? वहीं, करीब एक साल बाद जब वैक्सीनेशन शुरू हुआ तो सवाल खड़े होने लगे कि क्या वैक्सीन से बनने वाले एंटीबॉडीज मां के दूध से बच्चों में जा सकते हैं? क्या एंटीबॉडीज वाली मां का यह दूध नवजातों को कोरोना से बचा सकता है?

रिसर्चर्स के कई समूहों ने मां के दूध की जांच की, मगर उन्हें उसमें वायरस का कोई निशान तो नहीं मिला। मिले तो सिर्फ एंटीबॉडीज।

अमेरिका में कम से कम 6 रिसर्चर के अलग-अलग रिसर्च से साबित हुआ कि कोरोना वैक्सीन लगवाने वाली महिलाओं के शरीर में बने एंटीबॉडीज स्तनपान के जरिए उनके बच्चों तक पहुंच गए। इससे काफी हद तक साफ हो गया कि मां का दूध बच्चों को इन्फेक्शन से बचा सकता है।

तो आइए जानते हैं कि रिसर्चर्स के सामने क्या सवाल थे और कैसे उन्होंने साबित किया कि वैक्सीन लगवाने वाली मां का दूध अपने बच्चों को कोरोना से बचाने में मदद कर सकता है...

सवाल 1ः क्या वैक्सीन लगवाने वाली मां के दूध में एंटीबॉडी होते हैं?

जवाबः हां, एक के बाद एक हो रहे अध्ययन बता रहे हैं कि वैक्सीन लगवाने वाली मां के दूध में एंटीबॉडीज हैं। हालांकि अभी यह साफ नहीं कि यह एंटीबॉडीज बच्चों को कैसे कोरोना से बचाएंगे।

रिसर्चर्स के सामने बड़ा सवाल था कि क्या कोरोना वैक्सीन से बनने वाले एंटीबॉडीज भी मां के दूध से बच्चों तक पहुंच सकते हैं? क्योंकि दुनिया के किसी भी वैक्सीन ट्रायल में गर्भवती या दूध पिलाने वाली मां को शामिल नहीं किया गया था, इसलिए रिसर्चर्स को सबसे पहले दूध पिलाने वाली ऐसी महिलाएं तलाशनी थी, जिन्हें वैक्सीन लगाई जा सकती थी।

न्यूयॉर्क के मैनहटन के माउंट सिनाई में इकॉन स्कूल ऑफ मेडिसिन के एक मानव दुग्ध रोग विशेषज्ञ रेबेका पॉवेल ने एक फेसबुक ग्रुप के जरिए सैकड़ों डॉक्टरों और नर्सों को अपना दूध रिसर्च के लिए देने को तैयार कर लिया।

रेबेका ने 10 महिलाओं के दूध का विश्लेषण किया, जिन्हें वैक्सीन की दूसरी डोज लगे 14 दिन बीत चुके थे। इनमें से 6 महिलाओं को फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन लगवाई थी और चार ने मॉडर्ना वैक्सीन। रिसर्च में पता चला कि इन सभी महिलाओं के दूध में IgG नाम के एंटीबॉडी अच्छी तादाद में मिले। इसी तरह दूसरे रिसर्चर्स को भी करीब-करीब यही नतीजे मिले।

एक्सपर्ट नतीजों से उत्साहित

इसी तरह के अध्ययन करने वाली वालीं बोस्टन के विमेंस हॉस्पिटल में मातृ भ्रूण रोग विशेषज्ञ डॉ. कैथरीन ग्रे का कहना है कि इसमें उत्साहित होने के कारण हैं, हम मानते हैं कि इससे बच्चों को कुछ सुरक्षा दी जा सकती है।

लेकिन सवाल यह है कि हम इस बारे में सुनिश्चित कैसे हो सकते हैं? इसके लिए छोटे बच्चों को कोरोना वायरस से संक्रमित करना अनैतिक होगा। इसके बजाय कुछ रिसर्चर्स ने इस सवाल के जवाब के लिए एंटीबॉडीज का अध्ययन किया।

तो क्या यह एंटीबॉडीज कोरोना वायरस को इंसानी कोशिकाओं को संक्रमित करने से रोक पा रहे थे?

तेल अवीव यूनिवर्सिटी के एक इम्यूनोलॉजिस्ट यारिव वाइन का कहना है कि मां के दूध में वायरस को फैलने से रोकने और वायरस में मेजबान कोशिकाओं को संक्रमित करने की क्षमता को ब्लॉक करने की क्षमता होती है।

बेहद सावधान भी हैं एक्सपर्ट

इसी तरह अध्ययन करने वाले रोचेस्टर मेडिकल सेंटर यूनिवर्सिटी में पीडियाट्रिक एलर्जी एंड इम्यूनोलॉजी के चीफ डॉ. किरसी जर्विनन सेप्पो का कहना है कि यह रिसर्च अभी शुरुआती चरणों में है। ऐसे में पूरी तरह नहीं कहा जा सकता है कि उन नवजात बच्चों को कोरोना नहीं हो सकता जो वैक्सीन लगवा चुकी अपनी मां का दूध पी रहे हैं। इस बात के सीधे सबूत नहीं हैं कि मां के दूध में शामिल कोरोना एंटीबॉडीज उनकी रक्षा कर रहे हैं। हां, कई टुकड़ों में सबूत बता रहे हैं कि ऐसा हो सकता है।

सवाल 2: मां का दूध कितने समय तक सुरक्षा देगा?

जवाबः जब तक बच्चा एंटीबॉडीज वाला मां का दूध पीएगा।

रिसर्चर का कहना है कि कभी-कभार मां का दूध पीने के बजाय दिनभर मां का दूध पीने वाले बच्चे कोरोना वायरस से ज्यादा सुरक्षित हैं।

इनका कहना है कि कोरोना के खिलाफ मां का दूध महीनों तक काम करने वाली एक वैक्सीन के बजाय उस गोली की तरह जो आपको रोज लेनी है।

सवाल 3: क्या वैक्सीन लगवा चुकी मां का दूध सुरक्षित है?

जवाब: ज्यादातर विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि कोरोना वैक्सीन लगवा चुकीं मां का दूध सुरक्षित है।

सैन डिएगो में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर बेटर बिगिनिंग्स की को-डायरेक्टर क्रिस्टीना चेंबर्स कहती हैं, "यह सोचने का कोई कारण नहीं है कि वैक्सीन के बारे में कुछ भी ऐसा है जो हानिकारक होगा वहीं, यह विश्वास करने का कारण है कि वैक्सीन फायदेमंद होगी।"

वहीं, बोस्टन महिला अस्पताल में मैटर्नल फीटल मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ. कैथरीन ग्रे का कहना है कि प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ सैद्धांतिक सुरक्षा को लेकर चिंताएं हैं, लेकिन ब्रेस्ट फीडिंग और वैक्सीनेशन को लेकर ऐसी चिंता नहीं।

रोचेस्टर मेडिकल सेंटर यूनिवर्सिटी में पीडियाट्रिक एलर्जी एंड इम्यूनोलॉजी के चीफ डॉ. किरसी जर्विनन सेप्पो का कहना है कि mRNA अणु का जीवनकाल बहुत छोटा है। ऐसे में वह किसी भी तरह मां के दूध में आ ही नहीं सकते। इसलिए वह सुरक्षित है। मॉडर्ना और फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन mRNA आधारित ही हैं।

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