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नॉर्थ-ईस्ट में बिना इंटरनेट के पढ़ाई का मॉडल:सिक्किम में होम स्कूलिंग, त्रिपुरा में नेबरहुड क्लास और नगालैंड में पेनड्राइव पाठशाला चल रही

3 महीने पहले
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नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में अध्यापक बच्चों को गांव के खुले मैदानों में या फिर उनके घर जाकर पढ़ा रहे हैं।
  • पूर्वोत्तर के 7 राज्यों में 100 में से महज 2.75 लोगों तक है इंटरनेट की पहुंच
  • मेघालय के ग्रामीण इलाकों में बच्चों के घर-घर नोट्स पहुंचाए जा रहे हैं

प्रभाकर मणि तिवारी (डॉयचे वेले). कोरोना के दौर में इंटरनेट, कंप्यूटर और स्मार्टफोन की कमी की वजह से ग्रामीण इलाकों के ज्यादातर छात्र ऑनलाइन क्लास से वंचित हैं। लेकिन, पूर्वोत्तर के कुछ राज्य इस मामले में देश के दूसरे राज्यों लिए मिसाल बन रहे हैं। ऑनलाइन क्लास न हुई तो क्या, सिक्किम में स्कूल घरों तक पहुंच रहे हैं। वहां शिक्षक अपने घर या बच्चों के गांव में जाकर एक साथ कई बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

त्रिपुरा ने 'नेबरहुड क्लास' यानी पड़ोस की कक्षा नामक एक योजना शुरू की थी। इनमें बच्चों को खुले में पढ़ाया जा रहा था। हालांकि राज्य में संक्रमण बढ़ने की वजह से फिलहाल इन कक्षाओं को कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया है, लेकिन यह योजना बेहद कामयाब व दूरदर्शी है। राज्य में करीब एक लाख बच्चे इन कक्षाओं में पढ़ रहे थे। सरकार अब इसे दोबारा शुरू करने की बात कह रही है।

नगालैंड में इंटरनेट की समस्या को ध्यान में रखते हुए शिक्षा विभाग ग्रामीण इलाकों के बच्चों को पेनड्राइव बांट रहा है। इनमें पूरा पाठ्यक्रम, होमवर्क लोड हैं। मेघालय में घर जाकर बच्चों को नोट्स दिए जा रहे हैं।

पूर्वोत्तर में महज 35% आबादी के पास है इंटरनेट

  • 2018 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पूर्वोत्तर के राज्यों में महज 35 प्रतिशत आबादी के पास इंटरनेट है। इलाके के करीब 8,600 गांवों तक अब तक इंटरनेट नहीं पहुंच सका है। उसके बाद बीते दो साल में भी हालत में खास बदलाव नहीं आया है।
  • असम में स्थिति कुछ बेहतर जरूर है, लेकिन बाकी राज्यों की स्थिति एक जैसी है। दूरसंचार विभाग के 2019 के आंकड़ों के मुताबिक पूर्वोत्तर में इंटरनेट के करीब 61 लाख उपभोक्ता थे, यानी प्रति 100 लोगों में से महज 2.75 लोगों तक ही इसकी पहुंच थी।

त्रिपुरा में थोड़ा खेलो, थोड़ा पढ़ो
त्रिपुरा में लंबे लॉकडाउन की वजह से स्कूलों के बंद होने के कारण बच्चों के भविष्य का ध्यान रखते हुए सरकार ने अनोखी पहल की थी। सरकार ने बच्चों के बीच में 'एकटू खेलो, एकटू पढ़ो' यानी थोड़ा खेलो, थोड़ा पढ़ो योजना के तहत एक सर्वे किया था।
इसमें पता चला कि राज्य के सभी आठ जिलों में 3.22 लाख में से करीब 94 हजार यानी 29% स्कूली बच्चों के पास कोई फोन ही नहीं है। उसके बाद शिक्षा विभाग ने नेबरहुड क्लास योजना शुरू की। इसके तहत सुदूर इलाकों में पांच-पांच बच्चों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए खुले में पढ़ाया जाता था।
राज्य के शिक्षा मंत्री रतन लाल नाथ बताते हैं, "मार्च से ही स्कूलों के बंद होने की वजह से बच्चों की पढ़ाई काफी प्रभावित हो रही थी। सर्वे में यह बात सामने आई कि 29 प्रतिशत बच्चों के पास कोई फोन ही नहीं है। ऐसे में वे ऑनलाइन शिक्षा हासिल नहीं कर सकते थे। इसलिए 18 अगस्त से पड़ोस की कक्षा शुरू की गई थी। लेकिन, राज्य में संक्रमण बढ़ने की वजह हमने एहतियात के तौर पर उनको फिलहाल बंद कर दिया है, लेकिन जल्दी ही इसे दोबारा शुरू किया जाएगा।”
नगालैंड में पेनड्राइव क्लास
त्रिपुरा के पड़ोसी नगालैंड ने भी दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट की दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए एक नई योजना शुरू की है। नेटवर्क की समस्या की वजह से ग्रामीण इलाकों में स्थित सरकारी स्कूलों के जो छात्र ऑनलाइन पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं, सरकार की ओर से उनको पेनड्राइव बांटा जा रहा है। उसमें पाठ्यक्रम के अलावा दूसरी तमाम जरूरी चीजें पहले से डाली गई हैं।
राज्य के प्रमुख निदेशक (स्कूली शिक्षा) शानावास सी. बताते हैं, "दीमापुर और कोहिमा जैसे शहरी इलाकों में रहने वाले बच्चे तो ऑनलाइन पढ़ाई में सक्षम हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की समस्या है। इसलिए हमने पेन ड्राइव के जरिए ऐसे छात्रों में नोट्स और वर्कशीट बांटने का निर्देश दिया है।”
कोहिमा में शुहूरी छात्र संघ के अध्यक्ष लुका झिमोमी कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों के छात्रों को भारी दिक्कत हो रही है, उनके पास इंटरनेट नहीं है। ऐसे में शिक्षकों से नोट्स मिलने में परेशानी हो रही थी, लेकिन अब पेन ड्राइव से उनका जीवन कुछ आसान हो जाएगा।”
मेघालय में बच्चों को नोट्स मिल रहा
मेघालय में भी इंटरनेट की पहुंच बेहद कम है। इसकी वजह से छात्रों की दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा विभाग ग्रामीण इलाकों में रहने वालों के घर-घर नोट्स, कॉपी, किताब आदि पहुंचाया जा है। इसके लिए शिक्षकों की मदद ली जा रही है।
वेस्ट खासी हिल्स के उपायुक्त टी. लिंगवा कहते हैं, "राज्य में ज्यादातर स्थानों पर दुर्गम पहाड़ियों की वजह से मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं है। इसलिए हम एक-दूसरे के जरिए छात्रों को पाठ्य सामग्री मुहैया करा रहे हैं।”
सिक्किम में 50% से ज्यादा बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं है
पश्चिम बंगाल से सटे सिक्किम में तो अध्यापक छात्रों को उनके घर जाकर पढ़ा रहे हैं। एक शिक्षक आसपास के पांच-छह बच्चों को उनके या अपने घर पर पढ़ा रहे हैं। इसे होम स्कूलिंग प्रोग्राम कहा जा रहा है।
पूर्वी सिक्किम के टाडोंग स्थित लुमसे हाईस्कूल की टीचर इंद्र कला शर्मा इलाके के छह छात्रों को अपने घर के बरामदे में पढ़ाती हैं। वहीं, सरकार ने लॉकडाउन में ऑनलाइन कक्षाओं के लिए सिक्किम एडुटेक नामक एक ऐप लांच किया था। लेकिन, गरीब घरों या फिर ग्रामीण व दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चे खराब मोबाइल नेटवर्क की वजह से इसका फायदा नहीं उठा पा रहे थे।
सिक्किम के 765 सरकारी स्कूलों में 1.18 लाख छात्र हैं। बीते जून में शिक्षा विभाग की ओर से कराए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई थी कि सेकेंडरी स्कूलों में पढ़ने वाले 50% से ज्यादा बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं।
राज्य में शिक्षा विभाग के प्रभारी अतिरिक्त मुख्य सचिव जीपी उपाध्याय बताते हैं, "सरकार ने होम स्कूलिंग योजना के लिए 10 हजार सरकारी शिक्षकों की सूची तैयार की है।”
पूर्वी सिक्किम के पोसाकी सरकारी प्राथमिक स्कूल के शिक्षक अमृत ठाकुरी बताते हैं, "मैं इलाके के 46 छात्रों को अलग-अलग समय पर पढ़ाता हूं। इनको पांच से 10 तक के समूह में बुलाया जाता है। कक्षाएं पंचायत भवन या खुले में लगती हैं। खुले में पढ़ाना कोविड-19 के लिहाज से सुरक्षित है।”

शिक्षाविद् पूर्वोत्तर के मॉडल को देश के अन्य राज्यों में लागू करने की सलाह देते हैं
शिक्षाविदों ने पूर्वोत्तर के राज्यों में चल रही इन पहलों की सराहना की है। उनका कहना है कि देश के बाकी हिस्सों में भी इस मॉडल को अपनाया जा सकता है। शिक्षाविद् पवित्र गोस्वामी कहते हैं, "पूर्वोत्तर में राज्य सरकारें सीमित संसाधनों के बावजूद कोविड-19 के दौर में शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय काम कर रही हैं। इससे छात्रों की पढ़ाई बर्बाद होने से बच जाएगी। दूसरे राज्यों में भी इन माॅडल को लागू किया जाना चाहिए।”

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