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ऑक्सीजन एट होम:कोरोना पेशेंट को मजबूरी में घर पर दे रहे हैं ऑक्सीजन तो डॉक्टरों की ये सलाह जरूर मानें, जानिए इससे जुड़े बेहद जरूरी सवालों के जवाब

7 दिन पहले
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देश कोरोना की सुनामी से जूझ रहा है। तमाम दावों के बावजूद न जाने कितने कोरोना मरीजों को अस्पतालों में जगह नहीं मिल रही। ऐसे हालात में हजारों कोरोना मरीज अपने घरों पर ऑक्सीजन सिलेंडरों से किसी तरह सांस लेने को मजबूर हैं।

डॉक्टरों के मुताबिक कोरोना मरीजों की हालत इतनी तेजी से बदलती या गिरती है कि उन्हें अस्पतालों में ही ऑक्सीजन जैसी क्रिटिकल केयर दी जानी चाहिए, मगर देश की मौजूदा हालात में अगर घरों पर ऑक्सीजन लेनी भी पड़े तो उस पर डॉक्टरों की पूरी निगरानी होनी चाहिए।
ऐसे हालात में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से जानते हैं कि ऑक्सीजन देने में क्या-क्या सावधानियां जरूरी हैं...

Q. ऑक्सीजन की क्यों और कब जरूरत पड़ती है?

एक मिनट में 24 से ज्यादा बार सांस और 94% से कम ऑक्सीजन सैचुरेशन पर ही ऑक्सीजन जरूरी है।
मेदांता अस्पताल में रेस्पिरेटरी मेडिसिन की डायरेक्टर डॉ. बोरनाली दत्ता का कहना है कि किसी कोरोना मरीज की रेस्पिरेटरी रेट यानी सांस लेने की दर एक मिनट में 24 बार से ज्यादा होने और पल्स ऑक्सीमीटर में उसका ऑक्सीजन सैचुरेशन 94% से कम होने पर ही ऑक्सीजन देने की जरूरत पड़ती है।
ऑक्सीजन देने से पहले मेडिकल जांच जरूरी है ताकि ऑक्सीजन की जरूरत का आंकलन किया जा सके। उन्होंने इस बारे में एक वीडियो भी जारी किया है।

Q. क्या कोरोना मरीजों को घर पर ऑक्सीजन देनी चाहिए?

सामान्य हालात में तो कोरोना मरीजों अस्पताल में ही मेडिकल सुपरविजन के तहत ही ऑक्सीजन दी जानी चाहिए। मजबूरी में अगर घर पर ऑक्सीजन देनी पड़ती है तो डॉक्टर की सलाह पर ही ऑक्सीजन का फ्लो और समय तय करें।

फर्स्ट ओपिनियन : 100% सैचुरेशन की कोशिश में न पड़ें, स्पेशलिस्ट की सलाह जरूर लें

गुड़गांव के पारस हॉस्पिटल में रेस्पिरेटरी मेडिसिन के हेड डॉ. अरुणेश कुमार का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर में फेफड़ों के इंफेक्शन में बढ़ोतरी देखी गई है। ऐसे समय में जब मेडिकल मदद मिलनी मुश्किल हो गई है तो ऑक्सीजन सिलेंडर और ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर मददगार साबित हो सकता है। डॉ.अरुणेश की सलाह है कि सामान्य ऑक्सीजन लेवल 94% से 99% होता है, लेकिन कोविड मरीजों के लिए इसे 88% से 92% के बीच हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए। जब शरीर बीमार हो तो 100 % सैचुरेशन की कोशिश नहीं करनी चाहिए इससे रिसोर्सेज (ऑक्सीजन) जल्दी से खत्म हो जाएगा। इन मशीनों का इस्तेमाल करने से पहले किसी स्पेशलिस्ट से जरूर सलाह लेनी चाहिए।

सेकंड ओपिनियन : अस्पताल की निगरानी में ही ऑक्सीजन देना जरूरी

मेदांता अस्पताल में रेस्पिरेटरी मेडिसिन की डायरेक्टर डॉ. बोरनाली दत्ता कहती हैं कि ध्यान रखना होगा कि ऑक्सीजन भी एक दवा है। एक पल्मनोलॉजिस्ट होने के नाते हम लंबे समय से फेफड़ों की बीमारी का सामना कर रहे मरीजों (जैसी COPD के मरीज) को घर पर ऑक्सीजन लेने की सलाह देते हैं। ऐसे लोग लंबे समय से ऑक्सीजन ले रहे होते हैं, लेकिन कोरोना में हालात एकदम अलग होते हैं। कोरोना में स्थिति बहुत तेजी से बदलती है। मरीज की हालत बहुत तेजी से खराब हो सकती है। ऐसे में हमें घर पर ऑक्सीजन नहीं देनी चाहिए। हमें यह ध्यान रखना होगा कि अगर किसी कोरोना पेशेंट का ऑक्सीजन लेवल गिर रहा है तो मरीज की देखभाल केवल अस्पताल में ही जा सकती है। हां, कोरोना के कई मरीजों को ठीक होने के बाद भी कई दिनों तक ऑक्सीजन की जरूरत पड़ सकती है। ज्यादातर मामलों में दो से चार सप्ताह तक घर पर ऑक्सीजन देने की जरूरत पड़ती है। ऐसे मामलों में डॉक्टर से ऑक्सीजन देने की पूरी जानकारी लेकर ही इसका इस्तेमाल करना चाहिए।

Q. ऑक्सीजन फ्लो क्या होता है, इसे कैसे कंट्रोल करते हैं?

सिलेंडर में 99% तक शुद्ध मेडिकल ऑक्सीजन होती है, ऐसे में डॉक्टर मरीज की हालत के हिसाब से तय करते हैं कि उन्हें हर मिनट कितने लीटर ऑक्सीजन की जरूरत है। इसी दर को ऑक्सीजन का फ्लो कहते हैं। यह 1 लीटर प्रति मिनट से लेकर 15 लीटर प्रति मिनट तक होती है। मरीज केवल सिलेंडर से मिलने वाली ऑक्सीजन से ही बल्कि आसपास के वातावरण से भी ऑक्सीजन लेता है। सिलेंडर में 99% शुद्ध ऑक्सीजन होती और वातावरण में करीब 21%। ऐसे में डॉक्टर मरीजों की जरूरत के हिसाब से ऑक्सीजन फ्लो तय करते हैं। ऑक्सीजन का कम फ्लो के अलावा ज्यादा फ्लो भी मरीज को काफी नुकसान पहुंचा सकता है। मतलब साफ है कि कम या ज्यादा, ऑक्सीजन दोनों तरह से परेशानी में डाल सकती है।

Q. घर पर ऑक्सीजन देते हुए और क्या निगरानी है?
डॉ. अरुणेश कुमार का कहना है कि जिसे ऑक्सीजन दी जा रही है कि उसकी पल्स रीडिंग और ऑक्सीजन रीडिंग पर निगरानी जरूरी है। इससे यह जानने में मदद मिलेगी कि शरीर बीमारी के खिलाफ कैसे लड़ रहा है।
किसी मरीज को हर मिनट 1 से 2 लीटर ऑक्सीजन की ज़रुरत होती है तो इसे 3 से 4 लीटर किया जा सकता है।
अगर ऑक्सीजन सैचुरेशन लगातार कम बना रहे तो मरीजों को घर पर रखने की बजाय मेडिकल निगरानी में रखना जरूरी है।

Q. क्या ऑक्सीजन सिलेंडर से खतरा हो सकता है? ऐसे में क्या-क्या एहतियात बरतना जरूरी है?

Q. ऑक्सीजन लेने या देने के दौरान हाइजीन और रिफिलिंग को लेकर क्या जरूरी टिप्स हैं?

  1. घर पर ऑक्सीजन देने के लिए कम से दो सिलेंडर रखें। ताकि एक सिलेंडर भरने के दौरान दूसरा उपलब्ध रहे।
  2. ऑक्सीजन रिफिल के सभी संभावित जगहों के पते और फोन नंबर घर पर चस्पा करके रखें।
  3. सप्ताह में कम से कम एक बार प्लास्टिक ट्यूबिंग को साबुन और पानी से अच्छी तरह धो लें। इस दौरान दूसरे सेट से ऑक्सीजन देना जारी रखें।
  4. दो सप्ताह बाद कैनुला यानी नाक से ऑक्सीजन पहुंचाने वाली प्लास्टिक पतली नली को बदल लें।
  5. अगर मास्क से ऑक्सीजन दे रहे हैं तो मास्क को 2 से 4 सप्ताह में बदल लें।
  6. किसी एक मरीज का कैनुला या मास्क दूसरे मरीज के लिए इस्तेमाल न करें।
  7. मरीज के ठीक होने पर कैनुला, मास्क आदि को मेडिकल वेस्ट के रूप में संबंधित NGO या संस्था को सील पॉलीबैग में सौंप दें।
  8. ऑक्सीजन से नाक और गले में सूखापन हो सकता है ऐसे में नाक के भीतर लुब्रिकेशन रखें।
  9. ऑक्सीजन देने के लिए मास्क के बजाय कैनुला का इस्तेमाल करने की कोशिश करें ताकि मरीज को बोलने या खाने-पीने में दिक्कत न हो। हालांकि इसके लिए भी डॉक्टर की सलाह जरूरी है।
  10. परिजन या अटेंडेंट पूरी पीपीई किट पहनकर ही मरीज की देखभाल करें।

Q. कार्बन डाइआकसाइड रिटेंशन क्या है? घर पर ऑक्सीजन देने से इसका भी खतरा हो सकता है?

आमतौर यह लंबे समय तक ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने से यह समस्या होती है। हमारे फेफड़े शरीर के लिए न केवल ऑक्सीजन उपलब्ध कराते हैं बल्कि शरीर में बनने वाली कार्बन डाइऑक्साइड यानी CO2 को भी बाहर निकालना इनका काम है।
लगातार या ज्यादा मात्रा में शुद्ध ऑक्सीजन मिलने पर हमारे फेफड़े बेहद धीरे-धीरे सांस लेना शुरू कर देते हैं और शरीर से CO2 बाहर निकल नहीं पाती। जल्द ही मरीज के खून में CO2 का स्तर बढ़ने लगता है। इसे कार्बन डाइऑक्साइड रिटेंशन या हाइपरकार्बिया कहते हैं।
ऐसे में ऑक्सीजन पर होने के बावजूद मरीज को बेहोशी छाने लगती है। उसके सोचने समझने की क्षमता कमजोर होने लगती है, सिर दर्द और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।
खास बात यह है कि ऑक्सीमीटर खून में ऑक्सीजन का लेवल तो बता सकता है लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड का नहीं।
डॉक्टरों के मुताबिक ऐसे ही खतरों से बचने के लिए कोरोना मरीजों को एक्सपर्ट निगरानी से ही ऑक्सीजन दी जानी चाहिए।

Q. ऐसे कौन से लक्षण हैं जो घर पर ऑक्सीजन देने के दौरान नजर आएं तो फौरन अस्पताल पहुंचना चाहिए?

  • ऑक्सीजन के इस्तेमाल के बाद भी परेशानी महसूस करना।
  • चेहरे, जीभ और होंठ का काला होना या रंगहीन होना।
  • बेहोश होना या कोरोना के दूसरे लक्षण में तेजी आना जैसे बुखार, खांसी या सांस लेने में तकलीफ बढ़ना।

Q. कोरोना अलावा किन मामलों में घर पर ऑक्सीजन थेरेपी लेने की जरूरत पड़ती है?

कोरोना की मौजूदा हालात में अस्पतालों में बेड न मिलने के कारण ही घर पर ऑक्सीजन लेने या देने के लिए लोग मजबूर हैं। डॉक्टर सामान्य हालात में ऐसा न करने की सलाह देते हैं। इस विशेष परिस्थिति को छोड़ दें तो नीचे दी गई बीमारियों में आमतौर पर डॉक्टर घर पर ही ऑक्सीजन देने की सलाह देते हैं...

  • दमा
  • क्रोनिक ब्रोंकाइटिस
  • कोंजेस्टिव हार्ट फेलियोर
  • COPD (क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पलमनरी डिसीज)
  • फेफड़ों का कैंसर
  • निमोनिया
  • स्लीप एपनिया (सोते हुए सांस रुक जाना) आदि
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