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नई स्टडी में दावा:दिमाग पर भी असर डाल रहा है कोरोना, कंफ्यूजन जैसी परेशानियों का शिकार हो रहे मरीज; ऐसे मरीजों के मौत की संभावना 7 गुना ज्यादा

2 महीने पहले
स्टडी में पता चला है कि 82% भर्ती मरीजों में बीमारी के दौरान किसी न किसी समय न्यूरोलॉजिकल लक्षण नजर आए थे। यह दर चीन और स्पेन में हुई स्टडी से ज्याद है।
  • एंसेफेलोपैथी से जूझ रहे हैं मरीज, इस बीमारी में दिमाग ठीक से काम नहीं कर पाता है
  • स्टडी में शामिल एक तिहाई मरीज मानसिक परेशानियों का शिकार, बुजुर्गों में जोखिम ज्यादा

पेम बुलक. फेफड़ों को प्रभावित करने वाला कोरोनावायरस अब मरीजों के दिमाग पर भी गंभीर असर डाल रहा है। हाल ही में आई एक स्टडी से पता चला है कि अस्पताल में भर्ती हुए कई मरीजों के मानसिक स्तर में बदलाव नजर आए हैं। मरीज कंफ्यूजन और प्रतिक्रिया न देने जैसी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। मेडिकल भाषा में इस परेशानी को एंसेफेलोपैथी कहा जाता है।

सोमवार को एनाल्स ऑफ क्लीनिकल एंड ट्रांस्लेशन न्यूरोलॉजी में प्रकाशित स्टडी में 5 मार्च से 6 अप्रैल के बीच शिकागो में नॉर्थ वेस्टर्न मेडिसिन हेल्थ सिस्टम में भर्ती हुए 509 कोरोनावायरस मरीजों के रिकॉर्ड्स की जांच की गई थी। बिना मानसिक बदलावों वाले मरीजों की तुलना में ये मरीज तीन गुना ज्यादा अस्पताल में रुके थे। अमेरिका में कोरोनावायरस मरीजों में न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को लेकर की गई यह अब तक की सबसे बड़ी स्टडी है।

स्टडी में शामिल और एंसेफेलोपैथी से जूझ रहे 162 मरीजों में बुजुर्गों और पुरुषों की संख्या ज्यादा थी। इसके अलावा इन सभी में न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, कैंसर, सेरेब्रोवैस्क्युलर डिसीज, क्रोनिक किडनी बीमारी, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रोल, हार्ट फैलियर, हाइपरटेंशन या स्मोकिंग समेत कई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने की संभावना ज्यादा थी।

ऐसे मरीजों के मरने की संभावना दूसरों से सात गुना ज्यादा

  • स्टडी के वरिष्ठ लेखक नॉर्थवेस्टर्न मेडिसिन में न्यूरो-इंफेक्शियस डिसीज और ग्लोबल न्यूरोलॉजी के प्रमुख डॉक्टर आइगोर कोराल्निक का कहना है कि अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मानसिक परेशानी से जूझ रहे केवल 32% मरीज ही अपने रोज के कामों को आसानी से कर पा रहे थे। इसके विपरीत 89% सामान्य मरीज बगैर किसी मदद के अपना काम पूरा कर पा रहे थे। सामान्य मरीजों की तुलना में एंसेफेलोपैथी से जूझ रहे मरीजों में मौत की संभावना करीब सात गुना बढ़ जाती है।
  • डॉक्टर आइगोर ने कहा "एंसेफेलोपैथी एक जैनेरिक टर्म है, जिसका मतलब होता है कि दिमाग के साथ कुछ दिक्कत है।" इसमें व्यक्ति को ध्यान देने, शॉर्ट टर्म मैमोरी जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि शोधकर्ता एंसेफेलोपैथी के कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं।
  • यह बीमारी दूसरे रोगों के साथ भी हो सकती है और ब्लड सर्कुलेशन पर प्रभाव और सूजन समेत कई कारणों से बढ़ भी सकती है। खासतौर से बुजुर्ग मरीजों में। इस बात के बहुत की कम सबूत हैं कि वायरस सीधे तौर पर दिमाग के सेल्स पर हमला करता है और ज्यादातर एक्सपर्ट्स का कहना है कि न्यूरोलॉजिकल प्रभाव शायद इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया और सूजन के कारण बढ़ते हैं।

चीन और स्पेन से ज्यादा है अमेरिका में दर
बदली हुई मानसिक स्थिति केवल न्यूरोलॉजिकल परेशानी नहीं है। कुल मिलाकर 82% भर्ती मरीजों में बीमारी के दौरान किसी न किसी मौके पर न्यूरोलॉजिकल लक्षण नजर आए थे। यह दर चीन और स्पेन में हुई स्टडी से ज्यादा है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा जैनेटिक फैक्टर्स के कारण या इस वजह से हो सकता है कि नॉर्थ वेस्टर्न अस्पतालों के पास न्यूरोलॉजिकल परेशानियों को समझने के लिए समय ज्यादा था, क्योंकि यहां के अस्पतालों में दूसरी जगहों की तरह मरीजों की भीड़ नहीं थी।

युवा मरीजों में न्यूरोलॉजिकल लक्षण होने की संभावना ज्यादा
न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को देखा जाए तो करीब 45% मरीजों में मांसपेशियों में दर्द, 38% मरीजों में सिरदर्द, करीब 30% मरीजों में चक्कर आने की शिकायत देखी गईं। जबकि, स्वाद या सूंघने की परेशानियों से जूझ रहे मरीजों की संख्या कम थी। स्टडी के मुताबिक, एंसेफेलोपैथी के अलावा युवाओं में न्यूरोलॉजिकल लक्षण होने की संभावना ज्यादा थी।

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