पति घर बैठकर नहीं खा सकता पत्नी की कमाई:ये मानसिक क्रूरता है, समझिए पत्नी पर क्यों लागू नहीं होती यह शर्त

4 महीने पहलेलेखक: अलिशा सिन्हा

कुछ दिन पहले ही कर्नाटक हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले पर सख्त टिप्पणी की और कहा- पति अगर पत्नी के साथ 'कामधेनु गाय' यानी Cash Cow की तरह व्यवहार करता है तो ये मानसिक क्रूरता है। मतलब साफ है कि पुरुष घर बैठकर अपनी पत्नी की कमाई नहीं खा सकता। उसे पैसे कमाने का सिर्फ जरिया नहीं बना सकता। कोर्ट ने इस मामले में तलाक को मंजूरी दे दी है।

पूरा मामला समझ लीजिए-
साल 1999 में दंपती की शादी हुई। 2001 में एक बच्चा हुआ और 2017 में तलाक की याचिका दायर की गई, जिसमें कहा गया कि पति का परिवार आर्थिक संकट में था। लड़ाई-झगड़े और कर्ज चुकाने की वजह से पत्नी ने दुबई में नौकरी कर ली। उसने पति के नाम पर खेत खरीदा और 2012 में एक सैलून भी खुलवा दिया, लेकिन पति ने खुद को फाइनेंशियली मजबूत नहीं किया। 2013 में परिवार भारत वापस लौट आया। महिला ने लगभग 60 लाख रुपए अपने पति को दिए थे, जिसकी बैंकिंग डिटेल कोर्ट में पेश की थी।

चलिए इस केस से जुड़े जरूरी सवालों के जवाब जानते हैं पटियाला हाउस कोर्ट की एडवोकेट सीमा जोशी से।

सवाल 1- कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा होगा कि पति घर बैठकर पत्नी की कमाई खाए तो मानसिक क्रूरता, तो फिर पत्नी घर बैठकर पति की कमाई कैसे खा सकती है?
जवाब-
दरअसल पति को Primary source of earning माना गया है, जबकि पत्नी को Secondary source of earning माना गया है। यानी पत्नी का नौकरी करना जरूरी नहीं है, क्योंकि वो उसके बदले में बच्चे पाल रही है, घर की देखभाल कर रही है, खाना बना रही है, सास-ससुर की देखभाल कर रही है और बाकी काम भी कर रही है। अगर पति घर में ये सब काम भी नहीं कर रहा है और सिर्फ पत्नी की कमाई बैठकर खा रहा है, तो वो मानसिक क्रूरता ही है।

सवाल 2 - अगर कोई पुरुष हाउस हसबैंड है यानी घरेलू महिला की तरह घर के सारे काम कर रहा है और उसकी पत्नी नौकरी करती है तो क्या वो भी मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकता है?
जवाब-
जिस तरह पत्नी घर का ख्याल रखती है। वैसे ही अगर हाउस हसबैंड भी घर का ख्याल रखता है और कभी कोर्ट केस होने पर वो प्रूफ कर पाता है कि नौकरी नहीं करने के बदले उन्होंने घर को अच्छी तरह से संभाला है। तब ऐसे पति को मानसिक क्रूरता के दायरे में नहीं लाया जा सकता है।

सवाल उठता है कि क्या मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक लिया जा सकता है, तो इसका जवाब है हां, बिल्कुल।

मौजूदा मामले में पत्नी ने तलाक के लिए अर्जी लगाई थी, पति ने नहीं। ऐसी सिचुएशन में दोनों में से कोई एक पार्टनर contested divorce (विवादित तलाक) की मांग कर सकता है। इसे एकतरफा तलाक भी कहते हैं।

सवाल 3 - अगर किसी एक पार्टनर को एकतरफा तलाक लेना है तो उसके लिए क्या करना होगा?
जवाब-
हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13 में contested divorce यानी एकतरफा तलाक को लेकर साफ तौर से लिखा गया है। चलिए इसके लिए क्या करना होगा बताते हैं-

  • सबसे पहले एक एप्लिकेशन फैमिली कोर्ट या सेशन कोर्ट में लगानी होगी।
  • आपके शहर में फैमिली कोर्ट नहीं है तो सेशन कोर्ट में एप्लिकेशन लगाएं।
  • एप्लिकेशन लगाने के बाद दूसरे पक्ष के पास कोर्ट की तरफ से नोटिस जाएगा।
  • कोर्ट में पेश होने के लिए तारीख दी जाएगी। उस तय तारीख पर सुनवाई होगी।
  • पहले नोटिस के बाद अगर दूसरा पक्ष नहीं पहुंचता है तो सेकेंड नोटिस जाएगा।
  • इसके बाद भी अगर दूसरे पक्ष की पेशी नहीं होती है तो थर्ड नोटिस जाएगा।
  • थर्ड नोटिस के बाद भी अगर वो नहीं आता है तो एक पक्ष की ही बात सुनी जाएगी।
  • उसके बाद कोर्ट फैसला करेगी कि तलाक को मंजूरी देनी है या नहीं।
  • वहीं अगर दूसरे पक्ष की पेशी होती है तो पहले सुलह की कोशिश की जाएगी।
  • सुलह में कुछ महीने लग सकते हैं, सुलह नहीं होने पर कोर्ट फैसला सुना देगी।

सवाल 4 - एक पार्टनर तलाक चाहता है और दूसरा कोर्ट में पेश होने के बाद कह दे कि उसे तलाक नहीं चाहिए तब क्या होगा?
जवाब-
ऐसी सिचुएशन में दोनों पार्टनर की मैरिज काउंसलिंग होगी। यानी उनके रिश्ते को बचाने की कोशिश की जाएगी। यह मैरिड कपल पर की जाने वाली एक तरह की साइकोथेरेपी है। इसके जरिए एक्सपर्ट्स उनके रिश्तों में आने वाली समस्याओं को दूर करने की कोशिश करते हैं।

इसे ऐसे समझें

कोकिलाबेन हॉस्पिटल मुंबई के साइकाएट्रिस्ट शौनिक अजिंक्य के मुताबिक पंडित की तरह काउंसलर भी आपकी कुंडली ही बनाते हैं। अंतर बस यह है कि वह मन और रिलेशनशिप की कुंडली बनाते हैं। वह compatibility देखते हैं। हर व्यक्ति में कुछ कमी तो कुछ अच्छाई होती ही है। कौन सी अच्छाई को बढ़ाना है और किस कमी को कम करना है। यह काउंसलर बताते हैं।

सवाल 5- क्या कांउसलर के फैसले के आधार पर कोर्ट अपना फैसला सुनाता है?
जवाब-
नहीं, काउंसलिंग के बाद कोर्ट और पुलिस को काउंसलर अपनी राय दे सकता है। इस रिपोर्ट के आधार पर फैसला सुनाने के लिए जज मजबूर नहीं होता है। जज दोनों पार्टी की राय सुनने और सबूत देखने के बाद ही अपना फैसला सुनाता है।

चलते-चलते जान लीजिए-

ऐसा ही एक मामला साल 2021 में सामने आया था, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कहा था कि पति अपनी पत्नी को कामधेनु गाय समझता है। जब पत्नी की नौकरी दिल्ली पुलिस में लगी तब पति की दिलचस्पी अपनी पत्नी के साथ रहने में बढ़ी।

जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस जसमीत सिंह की पीठ ने कहा था कि पति का पत्नी से कोई इमोशनल रिलेशन नहीं था। नौकरी की वजह से वो साथ रहना चाहता था। ऐसे में पत्नी को मानसिक पीड़ा हुई होगी। जो उसके साथ क्रूरता दिखाने के लिए पर्याप्त है।

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