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जब कविता न छपने पर अटल ने सम्पादक को लि‍खा लेटर, मिला ऐसा रिप्लाई

अटल बिहारी वाजपेयी ने 25 अगस्त 1977 को एक अखबार के संपादक को अपनी कविता न छपने पर एक लेटर लिखा था।

Danik Bhaskar | Dec 26, 2017, 06:16 PM IST
कविता न छपने पर अटल ने अखबार के कविता न छपने पर अटल ने अखबार के

आगरा. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 25 अगस्त 1977 को एक अखबार के सम्पादक को अपनी कविता न छपने पर एक लेटर लिखा था। इस लेटर में उन्होंने लिखा था कविता के रूप में लिखा था, जिसकी एक लाइन है, '' कठिन कविता कर पाना, लेकिन उससे कठि‍न, कहीं कविता छपवाना।'' इस पर सम्पादक ने भी कविता के जरिए ही उन्हें जवाब दिया था। ये दोनों लेटर ही सोशल मीडि‍या पर वायरल हो रहे हैं।

क्या है पूरा मामला...

- दरअसल, 1977 में जब अटल विदेश मंत्री थे तो दिल्ली के एक बड़े अखबार में अपनी एक कविता छपने के लिए भेजी थी, लेकिन किसी कन्फ्यूजन की वजह से वह कविता छप नहीं पाई थी। तब अटल ने लेटर ल‍िख कविता के जर‍िए संपादक से शिकायत की थी।

- इंटरेस्टि‍ंग ये रहा, जब सम्पादक ने भी उस लेटर का जवाब कविता के जरिए ही दिया। उन्होंने लिखा "कविता मिली तिहारी, साइन किन्तु न पाया। हमें लगा चमचा कोई, खुद ही लिख लाया।"

- सम्पादक ने अपने जवाबी लेटर में यह भी लिखा कि आपके घर पर फोन किया गया था, लेकिन खुद को पीए बताने वाले ने किसी कविता को भेजने से ही मना कर दिया था। फिलहाल, अब यह दोनों ही पत्र सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं।

अटल ने लिखी थी ये कविता

- कैदी कवि लटके हुए, सम्पादक की मौज।

- कवि '@#$%@' में, मन हैं कांजी हौज।

- मन है कांजी हौज, सब्र की सीमा टूटी।

- तीखी हुई छपास, करे क्या टूटी-फूटी।

- कह कैदी कविराय, कठि‍न कविता कर पाना, लेकिन उससे कठि‍न, कहीं कविता छपवाना।

अटल के लेटर पर सम्पादक ने भी कविता के रूप में जवाब दिया...

- कह जोशी कविराय, सुनो जी अटल बिहारी।

- बिना पत्र के कविवर, कविता मिली तिहारी।

- कविता मिली तिहारी, साइन किन्तु न पाया।

- हमें लगा चमचा कोई, खुद ही लिख लाया।

- कविता छपे आपकी, यह तो बड़ा सरल है।

- टाले से कब टले, नाम जब स्वयं अटल हैं।

2003 में आखिरी बार अटल जी गए थे अपने गांव


- बता दें, वैसे तो अटल जी का जन्म एमपी के ग्वालियर में हुआ था, लेकिन उनके दादा-परदादा आगरा के पास स्थित बटेश्वर में रहते थे। बटेश्वर गांव में रह रहे अटल बिहारी के भतीजे (69 साल) रमेश चंद्र वाजपेयी ने बताया, ''अटल जी जब से बीमार हुए हैं, तब से गांव के विकास के बारे में कोई पूछने भी नहीं आता। रोजाना 16 घंटे से ज्‍यादा बिजली कटौती होती है।''
- ''बटेश्‍वर गांव के वाजपेयी मोहल्‍ले में 90 के दशक तक रौनक रहती थी। यहीं से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति शुरू की थी।''
- ''अब वाजपेयी मोहल्‍ला उजड़ चुका है। अटल जी का घर खंडहर बन चुका है। इनके घर के आस-पास पांच मकान और परिवार मौजूद हैं।''
- ''अच्‍छा भविष्‍य बनाने के लिए वाजपेयी मोहल्‍ले का परिवार शहरों में चला गया। ज्‍यादातर लोग तो कभी लौटकर नहीं आए।''
- ''आखिरी बार अटल जी यहां साल 2003 में आए थे। उस समय उन्‍होंने रेल लाइन का शिलान्‍यास किया था।''
- ''2015 में अटल के बर्थडे के एक दिन पहले भी ही यहां ट्रेन की शुरुआत हुई।'