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मजबूर पिता ने राष्ट्रपति से मांगी थी मौत, इस बीमारी से जूझ रहा है बेटा

विपिन को एप्लास्टिक एनीमिया है। डाक्टरों ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट में दस लाख रूपये से ज्यादा का खर्च बताया है।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - Mar 09, 2018, 07:56 PM IST

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    लाल घेरे में विपिन अपने पैरेंट्स और भाई -बहनों के साथ

    आगरा. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इच्छामृत्यु पर एक अहम फैसला सुनाया। कहा है कि कोमा में जा चुके या मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों का सम्मान के साथ मरना फंडामेंटल राइट है। कोर्ट की कॉन्स्टीट्यूशन बेंच ने यह भी कहा कि Passive Euthanasia (सक्रिय इच्छामृत्यु) और इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (Living Will) कानूनी रूप से मान्य होगी। इस संबंध में कोर्ट ने डिटेल गाइडलाइन जारी की है।
    इस फैसले के आने के बाद यूपी के आगरा के रहने वाले राजू यादव ने Dainikbhaskar.comसे बात की और अपने बेटे विपिन की आप बीती को बयां किया। विपिन को एप्लास्टिक एनीमिया है। डाक्टरों ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट में दस लाख रूपये से ज्यादा का खर्च बताया है। उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं है। वह सीएम से लेकर पीएम और राष्ट्रपति को लेटर लिखकर बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की मांग कर चुका है।

    ऐसे बिता था बचपन

    - राजू बताते है, "मेरे बेटे विपिन (20) का जन्म 20 जुलाई 1998 को आगरा में हुआ था।
    - घर में चार बेटे और एक बेटी है। विपिन अपने भाई -बहन में सबसे बड़ा है।
    - मैं घरों में पेंटिंग्स का काम करता हूं। मेरी वाइफ हाउस वाइफ है।
    - पैसे की कमी के कारण बेटे को 9th क्लास के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
    - उसके भाई- बहन भी पैसे की प्रोब्लम के कारण पढ़ाई नहीं कर पाए। वे घर पर ही रहते है"।

    14 की उम्र में पता चली ये बीमारी


    - "विपिन जब 14 साल का हुआ तब एक दिन उसे तेज बुखार और दस्त हुआ। उसे आगरा के ही एक प्राइवेट हास्पिटल में इलाज के लिए लाया गया। डाक्टरों ने उसका चेक किया।

    - उसके बाद बताया कि उसे एप्लास्टिक एनीमिया है। उसकी बॉडी में हर महीने ब्लड बदलने की जरूरत होगी। डाक्टरों ने बताया कि एप्लास्टिक एनीमिया का एक मात्र इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। इसमें 10 लाख रूपये से ज्यादा का खर्च आयेगा। लेकिन मेरे पास इतने पैसे नहीं थे। इसलिए मैंने बोन मेरो ट्रांसप्लांट नहीं कराया।
    - मैं अपने बेटे को लेकर 2015 में आगरा के एसएन मेडिकल कालेज आ गया। वहां के डाक्टरों ने ब्लड बदलने को कहा। मैं कई हास्पिटलों में गया।

    - ब्लड बैक ने बिना डोनर के ब्लड देने से मना कर दिया। मैंने कई समाजिक संगठनों से भी मदद मांगी लेकिन वहां से भी कोई मदद नहीं मिली"।

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    विपिन की देखभाल करते पैरेंट्स

    इलाज में आया 9 लाख रूपये का खर्च

    - "बेटे के इलाज में अब तक करीब 9 लाख रूपये का खर्च आ चुका है। मेरे पास एकमुश्त 10 लाख रूपये जमा नहीं हो पाए। इस वजह से अभी तक बोन मैरो ट्रांसप्लांट नहीं करा पाया।
    -उसे हर महीने ब्लड की जरुरत पड़ती है। मैं लोगों के आगे हाथ जोड़ता था। तब जाकर एक - दो लोग ब्लड डोनेट के लिए तैयार होते थे। इस तरह से वह ज़िंदा बचा है।
    - 2017 में एक दिन मैं अपने बेटे के लिए ब्लड मांगने आगरा के ही डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल पहुंचा था। लेकिन मुझें वहां पर भी बिना डोनर के ब्लड देने से मना कर दिया गया। मैं बहुत ज्यादा परेशान था। मैंने डाक्टरों से अपनी परेशानी बताई। कोई भी मदद को तैयार नहीं हुआ।
    - यहीं पर मेरी मुलाकात किरन मित्तल नाम के एक व्यक्ति से हुई। आगरा के हास्पिटलों में उनकी अच्छी पकड़ है। उन्होंने मेरे बेटे को ब्लड दिलाया था। तब जाकर उस टाइम बेटे कि जान बच पाई थी। तब से वह ही मेरे बेटे के लिए ब्लड का अरेंजमेंट्स कर रहे है"।

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    विपिन डाक्टर का इंतजार करते हुए

    राष्ट्रपति से मांगी थी इच्छामृत्यु

    - "2015 से लेकर 2017 तक मैं बेटे के लिए ब्लड मांगते हुए बहुत ही ज्यादा परेशान हो गया था। कोई भी ब्लड देने को तैयार नहीं था। उस टाइम मैं बहुत रोया था। मैंने यूपी के एक्स सीएम अखिलेश यादव को 18 अगस्त 2016 में पहली बार बेटे के इलाज में मदद के लिए लेटर लिखा था। मैंने लिखा था कि या तो सरकार मेरी मदद करे या फिर मेरे बेटे के लिए इच्छामृत्यु दिलाये। लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
    - उसके बाद मैंने दो बार और अखिलेश यादव को लेटर लिखा लेकिन उसका भी कोई जवाब नहीं आया। तब मैंने पीएम नरेंद्र मोदी को लेटर लिखने का डिसीजन लिया।

    - 2 फरवरी 2017 को पीएम को लेटर लिखा लेकिन कोई जवाब नहीं आया। उसके बाद मैं अपने बेटे के इलाज सम्बन्धी दस्तावेजों को लेकर पीएमओ पहुंचा। मेरी मुलाकात पीएम से हुई थी।

    - मैंने पीएम से कहा कि मैं बेटे का इलाज कराकर थक चुका हूं। डाक्टरों ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट करने को बताया है। उसमें दस लाख से ज्यादा का खर्च बताया लेकिन मेरे पास उसके इलाज के लिए अब पैसे नहीं बचे है। एक छोटा सा मकान बचा है। उसके अलावा सब कुछ बिक चुका है। सरकार या तो मेरे बेटे के इलाज में मदद करे या फिर इच्छामृत्यु दे।

    - तब पीएम ने आगरा डीएम के नाम लेटर लिखकर मेरी मदद का भरोसा दिलाया था। मैंने 23 फरवरी 2017 को पूर्व राष्ट्रपति को भी लेटर लिखकर इच्छामृत्यु की मांग की थी। लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आया।

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    विपिन अपने घर में

    क्या है एप्लास्टिक एनीमिया

    - केजीएमयू के पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. जेडी रावत के मुताबिक़ एप्लास्टिक एनीमिया में शरीर में खून बनने की क्षमता खत्म हो जाती है। इस बीमारी का मुख्य कारण प्रदूषण और खेतों में कीटनाशक रसायनों का अत्यधिक प्रयोग है।

    - बार-बार एक्सरे आदि कराने से बच्चा यदि ज्यादा विकिरण के संपर्क में आए तो भी ब्लड स्टेम सेल खराब हो जाती है और बोन मैरो ठीक से काम नहीं करता है।

    - ऐसे बच्चों में भी एप्लास्टिक एनीमिया का खतरा बढ़ जाता है। कुछ दवाओं के अत्यधिक सेवन से भी ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं। अनुवांशिकता भी इस बीमारी के एक अहम कारणों में से एक है।


    क्या है इस बीमारी का इलाज


    - डॉ. जेडी रावत के मुताबिक़ इस बीमारी के स्थाई इलाज के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराने की जरूरत होती है, जो बेहद खर्चीला होता है। इसके इतर टाइम-टाइम पर मरीज को खून चढ़ाना पड़ता है। जिससे वह जीवित रहता है।

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Web Title: Emotional Story Of Aplastic Anemia Patient
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