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इस वजह से हफ्तों कमरे में बंद रहते थे गालिब, पढ़ें इंटरेस्टिंग बातें

गालि‍ब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को मुगल शासक बहादुर शाह के शासनकाल के दौरान आगरा के एक सैन्य परिवार में हुआ था।

Danik Bhaskar | Dec 27, 2017, 09:34 AM IST
उर्दू के महान शायर मिर्जा गालि उर्दू के महान शायर मिर्जा गालि

आगरा. गूगल ने उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब की 220वीं जयंती पर उनको अपना डूडल समर्पित किया है। उनका जन्म 27 दिसंबर 1797 को मुगल शासक बहादुर शाह के शासनकाल के दौरान आगरा के एक सैन्य परिवार में हुआ था। बता दें, गालिब के साथ एक ऐसा भी समय आया, जब उन्‍हें मुसलमान होने का टैक्‍स देना पड़ता था। ये टैक्‍स उस समय अंग्रेज लगाते थे। जब वो पैसे के मोहताज हो गए तो हफ्तों कमरे में बंद पड़े रहते थे।

दिल्‍ली में गुजारा लंबा समय


- आगरा की जिस हवेली में गालिब पैदा हुए थे, अब वहां इंद्रभान इंटर कॉलेज चलता है।
- कालामहल इलाके की ये हवेली गालिब के नाना की थी। वो इस हवेली में 13 साल तक रहे।
- इसके बाद वो दिल्ली चले गए, लेकिन दिल्ली में उनके लिए रहना बहुत मुश्किल था।

दारोगा से परमिट के लिए देना पड़ता था टैक्‍स


- इतिहासकार राजकिशोर राजे बताते हैं कि 1857 में मुगल शासक बहादुर शाह जफर के कैद हो जाने के बाद अंग्रेजों ने दिल्‍ली को खाली करवा लिया था।
- अंग्रेजों के सिवाय यहां कोई नहीं था। इसके 15 दिन बाद हिंदुओं को दिल्‍ली लौटने और रहने की इजाजत दी गई थी।
- दो महीने बाद मुसलमानों को भी दिल्‍ली आने की अनुमति मिली, लेकिन इसमें बड़ी शर्त थी।
- इस शर्त के मुताबिक, मुसलमानों को दरोगा से परमिट लेना था।
- इसके लिए दो आने का टैक्‍स हर महीने देना पड़ता था।
- थानाक्षेत्र से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। रकम न देने पर दरोगा के आदेश पर व्‍यक्ति को दिल्‍ली के बाहर धकेल दिया जाता था।
- वहीं, हिंदुओं को इस परमिट की जरूरत नहीं होती थी। कुछ ऐसा ही मिर्जा गालिब के साथ भी हुआ। वो दिल्‍ली में हर महीने दो आने अंग्रेजों को देते थे।
- पुस्‍तक 'गालिब के खत किताब' में गालिब ने इस परेशानी का जिक्र का किया है।

हफ्तों रहते थे घर में बंद


- राजे बताते हैं कि गालिब ने जुलाई 1858 को हकीम गुलाम नजफ खां को पत्र लिखा था।
- दूसरा पत्र फरवरी 1859 को मीर मेहंदी हुसैन नजरू शायर को लिखा।
- दोनों पत्र में गालिब ने कहा है, 'हफ्तों घर से बाहर न‍हीं निकला हूं, क्योंकि दो आने का टिकट नहीं खरीद सका। घर से निकलूंगा तो दारोगा पकड़ ले जाएगा।'
- गालिब ने दिल्ली में 1857 की क्रांति देखी। मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का पतन देखा।
- अंग्रेजों का उत्थान और देश की जनता पर उनके जुल्म को भी गालिब ने अपनी आंखों से देखा था।