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कभी जान पर खेल कर बचाई थी 2 की जान,आज चाहते हैं फेंक दे प्रेसिडेंट अवार्ड

आगरा में राष्ट्रपति के हाथों वीरता का पुरस्कार पाने वाला शख्स जूता बनाने का काम करता है।

Dainik Bhaskar

Jan 19, 2018, 02:30 PM IST
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आगरा (यूपी). यहां 10 साल पहले मात्र 11 साल की उम्र में शहंशाह ने 2 लोगों की जान पानी में कूद कर बचाई थी। इसके लिए दिल्ली के लालकिले पर राष्ट्रपति से बहादुरी का पुरस्कार भी मिला था। आज ये शख्स जूते के कारखाने में नौकरी कर रहा है। अवॉर्ड के दौरान प्रेसिडेंट ने पूछा था, क्या बनोगे तो बोला था- पुलिस अफसर बनाऊंगा, लेकिन आज बड़ी मुश्किल से इंटर पास कर पाया है। रोजगार ने उसे जूता करखाना पहुंचा दिया।

11 साल की उम्र में मिला था इनाम...

- थाना एत्माद्दौला यमुना ब्रिज की दलित बस्ती मोतीमहल में एक छोटी झोपड़ी में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त करने वाला शहंशाह अपने परिवार के साथ रहता है। 2 सितंबर 2007 में शहंशाह अपनी वीरता की वजह से सुर्खियों में आया था।

- 11 साल की उम्र मे इसने यमुना मे डूबते हुए 2 युवको को बचाया था। उसकी इस वीरता के लिए 2009 मे गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उसे वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था।

- उस समय यूपीए चेयरमैन सोनिया गांधी, तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी, दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत कई हस्तियों ने उसकी पीठ थपथपाई थी। पुरस्कार मिलने के कुछ महीने बाद सरकारी खर्च पर उसकी पढ़ाई का इंतजाम तो हो गया।

- 2013 में इंटर पास कर लिया। इसके बाद सरकारी मदद मिलना बंद हो गई। आगे पढ़ने के लिए लखनऊ से दिल्ली तक भागदौड़ की, लेकिन 2014 में अधिकारियों ने नई सरकार बनने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया।

- घर की आर्थ‍िक हालत खराब होने के कारण मजबूरन उसे जूते की फैक्ट्री में काम करना पड़ रहा है।

मां ने बयां किया दर्द

- शहंशाह की मां अनीशा ने कहा, ''मुझे बेटे पर बहुत नाज है, लेकिन सरकार की बेरुखी के चलते इंजीनियर का सपना देखने वाला लड़का मजदूरी कर रहा है। उसके 12वीं पास होते ही ना पैसा मिला और ना ही रहने के लिए कोई मकान।''

- ''जिस समय शाहजहां को वीरता पुरस्कार मिला था, उस समय आगरा के डीएम ने मकान देने का वायदा किया था। इसके लिए उन्होंने 2010 में साढ़े 7 हजार रुपए कर्ज लेकर नगर निगम में ड्राफ्ट जमा किया।''

- ''अब तक वो 24 हजार रुपए जमा कर चुके है, लेकिन मकान नहीं मिला। पूरे सप्ताह काम करने के बाद केवल 500 रुपए कमा पाता है। जिससे परिवार का ठीक से भरण-पोषण भी नहीं होता है।''

इंजीनियर बनने का था सपना

- राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार विजेता शहंशाह ने बताया, ''जिस समय वीरता पुरस्कार मिल रहा था तब बहुत खुशी हो रही थी। लग रहा था कि कि मैं अपने और अपने परिवार की जिंदगी बदल दूंगा।''

- ''कई साल बीत जाने के बाद कोई मदद करने के लिए आगे नहीं आया। ऐसे में पढ़ाई छोड़कर मैं एक जूते बनाने का काम शुरू कर दिया। इससे मेरी दो जून की रोटी का काम चल जाता है।''

मन करता है अवार्ड को फेंक दूं

- शहंशाह के पिता विस्सा ने बताया, ''मैंने शहंशाह को तैरना सिखाया है। इसने पानी में डूब रहे 2 लोगों की जान भी बचाई है। हम गरीब है इसलिए अच्छे से पढ़ा नहीं पाए सरकार से कुछ उम्मीद थी लेकिन उन्होंने ने भी मुंह मोड़ लिया।

- आज आलम यह है कि बेटे को मिले राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार सहित वह तमाम प्रशस्ति पत्र एक दिखावा लगता है। कभी-कभी तो मनकर है कि उसे लेकर यमुना में फेंक दूं। डीएम ने घर देने का वादा किया था, उसके लिए रुपए भी जमा करा दिए गए लेकिन आज तक छत नसीब नहीं हुई।

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