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देख नहीं सकता ये शख्स, पर 15 मिनट में बनाता है ट्रक के टायर का पंक्चर

अंधेरे भरे जीवन में कैसे रहें पॉजिटिव, इसकी जिंदा मिसाल हैं इलाहाबाद के मोहम्मद आजाद।

Danik Bhaskar | Feb 13, 2018, 12:07 PM IST

इलाहाबाद. संगमनगरी के रहनेवाले मोहम्मद आजाद पंक्चर बनाने का काम करते हैं। इसी धंधे से वे अपने 8 में से 5 बच्चों की शादी भी कर चुके हैं। सबसे हैरान करने वाली बात है कि वह आंखों से मोहताज हैं। इनके हुनर को देखते हुए स्थानीय लोग इन्हें पंक्चर मैन कहकर बुलाने लगे हैं। DainikBhaskar.com इसी हुनरबाज की कहानी अपने रीडर्स को बता रहा है।

15 मिनट में बनाते हैं ट्रक का पंक्चर

- इलाहाबाद के दारागंज मोहल्ले में मोहम्मद आजाद की पंक्चर बनाने की दुकान है। शादी के महज 2 साल बाद ही एक हादसे में आजाद की आंखों की रोशनी चली गई थी। तब आजाद महज 20 साल के थे।
- आंखों से मोहताज हो जाने के बावजूद आजाद ने हौसला नहीं छोड़ा। उन्होंने इस परेशानी के बावजूद पंक्चर बनाना जारी रखा और आज इस काम के एक्सपर्ट बन चुके हैं।
- नॉर्मल पंक्चर बनाने वाले को ट्रक का टायर सुधारने में औसतन 30 से 40 मिनट लगते हैं। आजाद आंखों की रोशनी नहीं होने के बावजूद महज 15-20 मिनट में यह काम कर लेते हैं।

कभी मिलती थी 50 पैसे मजदूरी

- आजाद बताते हैं, "मेरे बड़े भाई अब्दुल जब्बार हाईकोर्ट के पास एक पंक्चर की दुकान में काम करते थे। मैंने 12-13 साल की उम्र से उनके साथ पंक्चर बनाना शुरू कर दिया था। दिनभर के काम के बाद भाई को 1 रुपया और मुझे 50 पैसे मजदूरी के मिलते थे।"
- शादी के बाद भाई ने आजाद की अलग दुकान खुलवा दी। उन्होंने 2800 रुपए में पहली एयर मशीन खरीदी थी। यह दुकान एक पूर्व सांसद के ऑफिस के पास थी, जिससे डेली 4-5 रुपए की कमाई हो जाती थी।

ऐसे गईं आंखें

 

- आजाद बताते हैं, "मैं तब 20 साल का था और पहली बेटी रुखसाना का पिता बन चुका था। एक दिन मैं पंक्चर बनाते वक्त टायर में हवा भर रहा था, तभी वह फट गया। उस ब्लास्ट से मेरी आंखें और चेहरा झुलस गए थे।
हादसे के 3 महीने बाद मैंने पंक्चर बनाने का काम दोबारा शुरू किया।"
- प्रेजेंट में आजाद की दुकान पर उनका 15 साल का सबसे छोटा बेटा मोहम्मद गुलाम हेल्प करता है। हालांकि, गाड़ियों के टायर खोलने और पंक्चर बनाने का काम सिर्फ आजाद करते हैं। 
- वो बताते हैं, "अपनी दुकान के बूते मैंने गांव में चार कमरे का पक्का मकान बनावाया है। मेरे 3 बेटे और 5 बेटियां हैं। मैं इसी तरह उन्हें सपोर्ट करता हूं।"

बेटे को भेजा सऊदी अरब

 

- आजाद 32 साल से यह काम कर रहे हैं। इससे वे हर रोज 1000-1200 रुपए तक कमा लेते हैं। पिछले साल उन्होंने अपने बड़े बेटे को सऊदी अरब भेजा।
- बेटे का पासपोर्ट और वीजा बनवाने में 1.5 लाख रुपए का खर्च आया, जो कि इन्होंने अपनी कमाई से पूरा किया।
- छोटे बेटे को साथ रखा जरूर है, जिसकी वजह से वह स्कूल नहीं जा पाता। इसके लिए उन्होंने ट्यूशन लगा रखी है। खुद एक भी अक्षर नहीं पढ़े, लेकिन आजाद ने अपने सभी बच्चों को साक्षर बनाया है।