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हाईकोर्ट NEWS: नियमित जांच बगैर अस्थायी कर्मी की बर्खास्तगी अवैध

हाईकोर्ट ने कहा है क‍ि अस्थायी कर्मचारी के पीठ पीछे जांच के आधार पर सेवा बर्खास्तगी दंडात्मक होने के नाते गलत है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jan 25, 2018, 01:58 PM IST

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    फाइल।

    इलाहाबाद.हाईकोर्ट ने गुरुवार को कहा है कि अस्थायी कर्मचारी के पीठ पीछे जांच के आधार पर सेवा बर्खास्तगी दंडात्मक होने के नाते गलत है। बर्खास्त करने से पहले नियमित विभागीय जांच किया जाना जरूरी है। बर्खास्तगी का ठोस आधार जरूरी है। कोर्ट ने मुजफ्फरनगर में सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास विभाग के कल्याणकर्ता याची की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि याची सेवानिवृत्त हो चुका है। ऐसे में उसे 3 महीने में सेवानिवृत्त परिलाभों का भुगतान किया जाए। आगे पढ़‍िए पूरा मामला...


    -यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने आर.एस त्यागी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। याचिका पर अधिवक्ता राजीव शर्मा ने बहस की।

    -याची 10 जनवरी 1986 में अस्थायी रूप से नियुक्त हुआ। दो साल की परिवीक्षा अवधि पूरी करने के बाद वह अस्थायी कर्मी के रूप में कार्यरत रहा और बिना नियमित जांच किए 17 दिसंबर 1992 को बर्खास्त कर दिया गया।

    -याची पर आरोप है कि उसने दो अन्य सहकर्मियों के साथ मिलकर सार्वजनिक लकड़ी बेच दिया। दोनों कर्मी स्थायी थे, इसलिए उन्हें निलम्बित कर जांच का आदेश दिया गया।

    -सीडीओ ने प्रारंभिक जांच में याची व दो अन्य को कदाचार का दोषी माना और जिलाधिकारी ने गोपनीय जांच के बाद याची को अस्थायी कर्मी होने के नाते बर्खास्त कर दिया। जिसे चुनौती दी गई।

    -कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश पर रोक लगा दी और जवाब मांगा। सरकार का कहना था कि अस्थायी कर्मी को बिना जांच के हटाया जा सकता है। उसे पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है।
    -कोर्ट ने नेहरू युवा केन्द्र केस में सुप्रीम कोर्ट के हवाले से कहा कि बिना सुनवाई का मौका दिए बर्खास्तगी नहीं की जा सकती।

    -डीएम ने पीठ पीछे गोपनीय जांच कर बर्खास्तगी की संस्तुति की। जिस पर याची को बिना पक्ष सुने बर्खास्त कर दिया गया।

    -याची का कहना था कि शासनादेश से सभी अस्थायी कर्मियों को स्थायी कर दिया गया था, लेक‍िन याची के संबंध में याचिका के चलते औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया।

    आगे की स्लाइड्स में पढ़‍िए तबादले में 5 साल से कम सेवा की महिला टीचरों की अर्जी नहीं हो रही स्वीकार...

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    स‍िम्बोल‍िक।

    मह‍िला टीचरों के तबादले पर 6 फरवरी को होगी अगली सुनवाई

    इलाहाबाद. हाईकोर्ट ने संयुक्त सचिव बेसिक शिक्षा लखनऊ को नियम 8(2)(डी) के तहत महिला अध्यापिकाओं को अंतर्जनपदीय तबादलों के ऑनलाइन आवेदन दाखिल करने के संबंध में तत्काल आदेश जारी करने का निर्देश दिया है। अभी तक तैयार साफ्टवेयर में पांच साल की सेवा वाले अध्यापकों के अंतर्जनपदीय तबादले के आवेदन आनलाइन स्वीकार किये जा रहे हैं। पांच साल की कम सेवा वाली महिला अध्यापिकाओं के आवेदन तकनीकी खामी के चलते नहीं भरे जा रहे हैं। सरकार ने 16 जनवरी से 29 जनवरी तक ऑनलाइन आवेदन दाखिल करने की अवधि नियत की है। सरकार ने माना कि नियम 8(2)(डी) के तहत पति-पत्नी व सास-ससुर के नजदीकी जिले में तबादले की अर्जी स्वीकार की जाएगी। कोर्ट ने सरकार से इस संबंध में बेहतर सुझाव मांगा है और सभी याचिकाओं को सुनवाई के ल‍िए 6 फरवरी को पेश करने का निर्देश दिया है।


    -यह आदेश न्यायमूर्ति एम.सी त्रिपाठी ने विभा सिंह कुशवाहा व 21 अन्य की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है। याचियों का कहना है कि वे सहायक अध्यापिका हैं। याचिका में सचिव बेसिक शिक्षा परिषद के आदेश 12 जनवरी 18 की वैधता को चुनौती दी गयी है।

    -याची का कहना है कि ये आदेश नियम 8(2)डी के विपरीत है। याची विभा ने कुशीनगर से बलिया अपने पति की तैनाती जिले में तबादले की मांग की है। किन्तु आवेदन स्वीकार न होने के कारण आवेदन स्वीकार नहीं हो पा रहा है।

    -नियम 8(2)डी के तहत पति-पत्नी या सास-ससुर के पास तबादले की मांग की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि सामान्य नियम पर विशेष नियम प्रभावी होंगे। सरकार ने 5 साल सेवा पूरी करने वालों को 25 फीसदी खाली पदों पर तबादले की अनुमति दी है। किन्तु इस सामान्य नियम पर विशेष नियम प्रभावी है।

    -5 साल से कम की अध्यापिकाओं को तबादले की अर्जी देने की छूट दी गई है। जिनके पति पैरा मिलिट्री फोर्स में है। उन्हें सास-ससुर के नजदीक तबादले की मांग में अर्जी देने की छूट दी गई है। अर्जी स्वीकार न होने से छूट अर्थहीन हो रही है।

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Web Title: High Court Says Unlawful Dismissal Of Temporary Worker Without Regular Checks
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